आज नीरू बहुत ही खुश थी। पंख होते तो उड़कर घर पहुँच जाती।
“कैसी हो नीरू?”
नीरू के कदम आवाज़ सुनकर ठिठक गए। जैसी पीछे मुड़कर देखा तो ठगी-सी खड़ी रह गई। बस इतना ही बोल पाई,”ठीक हूँ प्रवेश। तुम यहाँ कैसे?”
“बस ऐसे ही … इसी अस्पताल में आ गया हूँ। दो साल हुए।”
“दो साल!”… नीरू आश्चर्य से बोली, “और तुम मिले तक नहीं मुझसे।” कहकर नीरू भाई से लिपट गई।
“हाँ। दो साल।” प्रवेश निर्विकार भाव से बोला।
नीरू के विचारों को पंख लग गए थे। वो भी क़रीब बीस साल पीछे पहुँच गई। प्रवेश उसी का अपना भाई, नीरू के अपनी पसंद के लड़के से विवाह कर लेने के कारण नाराज़। उसे याद आ रहा था, वह बीता समय, जब हर रक्षा बंधन पर एक साथ राखी बाँधने की प्रक्रिया निभाने के बाद घूमने जाते, मस्ती करते।
अभी राखी को दो दिन बचे थे, नीरू मन ही मन उदास भी हो रही थी, पर आज अचानक भाई को सामने देख अचंभित भी और खुश भी हो गई थी। अन्तरजातीय विवाह कर लेने के कारण नीरू पूरे परिवार से कट चुकी थी। आज जब अस्पताल से बेटे को घर ले जाना था और चिंता यह थी कि बिल कौन देगा?
अचानक यह पता चला कि एक संस्था ने चेरिटी के तहत आपका बिल भर दिया है। यह जानकर नीरू ने राहत की साँस ली; परंतु मन में असंख्य प्रश्न भी कौंध रहे थे, कौन-सी ऐसी संस्था है? मेरे बेटे का ही बिल क्यों भरा, वगैरह- वगैरह … अचानक प्रवेश का इस तरह से मिलना, अब नीरू को अपने से किए गए प्रश्नों के उत्तर मिल चुके थे।
-0-