जून 2026

भाषान्तरबकी बातौ सुख     Posted: October 1, 2021

गढ़वाली में अनुवाद:डॉ. कविता भट्ट

फोनै घंटी बजि!!! खुखली माँ खेल्दी छुट्टी नौनी तैं घौरवळी की तर्फां बढै़ कि तिवारी जि न रिसीवर थामी- हळकी सि खुसी वळी बाच माँ- अरे प्रभाकर-हैलो-नमस्ते-नमस्ते, कन्न छै। मि ठीक छौं अपड़ु बतौ, सब कुसल-मंगल च ना?

हाँ-हाँ सब ठिक च, त फीर आजै गोष्ठी माँ किलै नि ऐं?

-अरे क्य बताँण यार बस औंदि-औंदि रै ग्यों, असल माँ आज अजीत ब्वारी अर नौनी तैं ली क अचाणचक ऐ गे, त फीर क्य कन्न छौ। त्वी तैं त सब यादी होलु, कि कन्न ब्यो का द्वी मैना बादी ब्वारी का बुल्याँ माँ ऐकि जुदी घौर बसैयालि छौ साब न। हमरा बारा माँ एक बगत बि नि सोचि छौ ईं इकुली संतान न। याद च न, त्यारी बौजी क्य स्थिति ह्वे गे छै, द्वी बर्स तक खटुला पकड़ी रै वा।

-त फीर आज कनमाँ इतगा प्यार उरळि गे वे तैं, लग्णु च कि कुछ खास काम पोड़ी गे ह्वालु-नितर अचकाल संतान!

ठिक ब्वालि तिन प्रभाकर, भोळ बटि ब्वारी कि छुट्टी जु खतम हूणी छन अर आज लाटसाब तैं ब्वे-बाब याद ऐ गिन। अब नौनि तैं रखणै आफत जु होलि आँणि, बुन्नु च कि बालबाड़ी नि रखण चाँदु। संस्कारु कि बात च अब कन्नु। वे दिन त कुछ नि बोलि छौ, जब ब्वारिन ये का ब्वे-बाबू तैं फुंड धोळया बोली छौ। सब्बी संस्कार चुल्ला उंद झोंकि क चली गे छौ वीं कि खुसी का वास्ता। बुन्न त भौत कुछ चाणूँ छौ पर बोलि नि साकि। बर्सू बाद तेरि बौजी मुखड़ी माँ पाणी देखि कि सब्बि धाँणि भितरी पियालि। ममता जु ऐ गे छै बिच म।

-ठिक छैं बुन्नि तिवारी, आज सब्बि स्वार्थी ह्वेगिन, फीर चा अपड़ु खूनी किलै न ह्वाउ।

-बात त सै छै बुन्नि प्रभाकर, पर मि फीर बि सुचणु छौं- सुक्कर च आजै दुन्या माँ स्वारथ त बच्यूँ च, अर अगर स्वारथ बि नि हूँदु बच्यूँ त बर्सु बाद नौनै कि मुखड़ी दिखणाँ दगड़ा-दगड़ी अपड़ी नातणी तैं देखणौं सुख कन माँ मिल्दु।

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