जून 2026

भाषान्तरबदलू     Posted: March 1, 2024

गढ़वाली अनुवादः डॉ. कविता भट्ट

‘‘देख! तू हर बात परैं ज़िद नि किया कर। जु काम कन्न कु होन्दु, वे तू करदि नि छैं।’’ उमा न रचना थैं खिजे कि बोलि।

‘‘करदु त छौं सैरू काम। सब्जी बणाण खुंणि टमाटर नि ल्है छौ। आपै दगड़ झुल्ला बि त ध्वाई छा।’’ रचना न माँ थैं तर्क द्याई।

‘‘यु काम त नि कन्न हूंदन। पौढी बि लिया कर।’’ उमा थैं हौर गुस्सा ऐ गे।

‘‘करि त यालि स्कूलौ काम।’’ रचना न अपणी बात बतै।

‘‘अच्छा जादा बत्थ नि कैर अर एक तरफाँ ह्वेकि बैठ।’’ रचना मसीन बिटि झुल्ला पकड़ण लगी गे। उमा थैं गुस्सा आई अर वींन थप्पड़ जमै दे।

‘‘अब अगर जु हाथ ऐ जांदु मसीन म।’’

रचना रूण लगी गे।

‘‘अब रूंण ऐ ग्याई चुप हो, नितर त हौर एक लगण त्वै पर। अच्छी बत्थ नि सिखणन, क्वी बुल्यूँ नी मण।’’

थोड़ी देर म दरवाजु खगटाई कैन। उमा न रचना थैं बोलि , ‘‘अच्छा ज देख, को च भैर।’’

पैलि त बैठिं रै अर गुस्सा ह्वे कि माँ कि तरफाँ  देखणी रै अर गुस्सा म माँ कि तरफाँ  देखणी रै, पर फिर दुबरा बुन्न पर उठी अर द्वार खोलिन। रचना का पिताजी कु क्वी दगड्या छौ।

रचना द्वार खोलिक क लौटि गे।

‘‘कु छौ?’’ उमा न पूछी।

‘‘चचा।’’ रचना न रूखु सि जवाब द्याई अर दगड़ इ इन बि बोली, ‘‘मिन अंकल खुणि सेवा बि नि लगै।’’

  

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine