जून 2026

अध्ययन -कक्षबरेली सम्मेलन(11-11-2000) में पढ़ी गई लघुकथाओं पर विमर्श     Posted: November 1, 2020

सच झूठ लघुकथा में डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति मौलिक कथानक के चुनाव और चुस्त संवाद द्वारा निर्धनता का यथार्थ चित्रण करता है। कहानी रस से ओत-प्रोत यह लघुकथा सोचने  कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करती है। एक दृष्टि से जब लघुकधा में बेटा पात्र वास्तविकता बता देता है तो लघुकथा अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेती है। सच झूठ के इन्द्र को दर्शाती लघुकथा का शीर्षक उचित है। साहित्य की कल्याणकारी की भूमिका अनुरूप प्रस्तुत अमानवीय व्यवस्था के विरुद्ध प्रणा के भाव जाग्रत करती है।

रूप देवगुण की लघुकथा जगमगाहट डरी हुई मानसिकता का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती है।बहुत ही सूक्ष्म रूप में यह लघुकथा इस वैज्ञानिक तथ्य को दर्शाती है कि परिस्थितियाँ बदल जाने से मानसिकता में कितना परिवर्तन आ जाता है। भयमुक्त होने से ‘जगमगाहट होती है। खतरे से बाहर निकलने से भ्राप्त हुई राहत और सन्तुष्टि का वृतान्तक वर्णन है। इस लघुकथा से एक और सकारात्मक संकेत यह मिलता है कि प्रतिरोध बनाने से और मानसिक दृढ़ता से स्थिति का सामना किया जा सकता है। लघुकथा में निहित नारी पात्र विरोध करने का मन बनाता है। यह शुभ संकेत साहित्य की कल्याणकारी  दृष्टि के अनुरूप है। लघुकथा के अन्त तक ‘आगे क्या हुआ’ की उत्सुकता बनी रहती है। इस तरह यह उत्तम लघुकथा है, जो अप्रत्यक्ष रूप में अफसरशाही व्यवहार पर भी एक दृष्टिपात करवाती है। लघुकथा में मौजूद अफसर पात्र का व्यवहार अपवाद है; परन्तु लघुकथा के दूसरे पक्ष इस को काफी सीमा तक समाहित कर लेते हैं।

सुरेश शर्मा की लघुकथा रुकावट वार्तालाप और वृत्तान्तात्मक शैली के सम्मिश्रण द्वारा बेटियों /बहिनों / औरतों से जन्म होते ही भेदभाव की भावना को प्रकट करती हैं। बाकी कारणों से हटकर औरत की हीन स्थिति के लिए सदियों पुराने संस्कार उत्तरदायी हैं। इन संस्कारों के लिए हमारी आर्थिक,राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियाँ निर्णायक रूप में भूमिका निभाती हैं। इनके बदल जाने से हमारे संस्कार टूट / बदल सकते हैं। चाहे विचाराधीन कहानी ऐसा कोई संकेत नहीं देती। इस संकेत की आवश्यकता भी नहीं और लघुकथा में यह संभव भी नहीं। परन्तु लड़की पैदा होने द के ख्याल से उत्पन्न हुई रुकावट सबको समझने के लिए प्रेरित करती है। लघुकथा में शायद कोई भी शब्द अनावश्यक नहीं है।

स्कूटर में सुकेश साहनी दहेज की लानत से पीड़ित माँ-बाप और लड़की की मनोदशा को प्रधान घटना के माध्यम से प्रस्तुत करने में पूर्ण रूप में सफल रहा है। स्वप्न के वृत्तान्त और पति-पत्नी के वार्तलाप को बड़े ही युक्तिपूर्वक ढंग से जोड़े जाने के कारण कथानक मौलिक प्रतीत होता है। लघुकथा में मौजूद सभी चारों पात्रों का व्यवहार और बोलचाल उनके स्तर और स्थिति के अनुरूप हैं। वे सारे हाड़-मांस के बने हुए जीते -जागते पात्र हैं। वे साहनी के हाथ की कठपुतलियाँ नहीं हैं। इस तरह उनका व्यवहार पूर्ण रूप में यथार्थ है। ये चारों फ्लैट पात्र हैं। ये पात्र ही यथार्थ चित्रण कर सकते हैं। लघुकथा अनावश्यक शब्दों / वाक्‍यों से बची हुई अन्त तक उत्सुकता बनाये रखती है। औरतों की दयनीय स्थिति और दहेज की लानत के बारे में पाठकों को सोचने के लिए व्याकुल करती है। साहित्य की कल्याणकारी दृष्टि यही माँग करती है।

विक्रमजीत नूर मूल्य नामक लघुकथा में दो घटनाओं को क्षितिज अवस्था में रखकर प्रस्तुत करता है। लगभग साथ-साथ घटित दो घटनाओं की प्रस्तुति के लिए उसने वृत्तान्तात्मक और संवाद शैली को उपयुक्त मात्रा में प्रस्तुत किया हैं। उसने अमीरी और गरीबी के बीच के अन्तर को दर्शाने के लिए दो घटनाओं का चुनाव किया है; परन्तु ये दोनों प्रतिनिधि घटनाएँ नहीं हैं। ये दोनों स्वाभाविक प्रतीत होती हैं। दुकानदार को सेठ पैसे देने आया है। उनके पास पैसों का ढेर है। दुकानदार उसको एक रुपये के गिर जाने के बारे में सूचित करता है। निश्चित रूप में सेठ नाम का सेठ नहीं है। उसका कथन उसकी अमीरी की पुष्टि करता है। अब प्रश्न उठता है कि सेठ दुकानदार को कुछ रुपये देने क्यों आया? उसके पास तो नौकर-चाकर रहते हैं, जो ऐसे भुगतान आदि करने का उत्तरदायित्व निभाते हैं। यह घटना इसलिए भी अस्वाभाविक है; क्योंकि लघुकथा में रुपयों का ढेर का वर्णन है। ढेर सामान्यतः जमीन या किसी स्थूल सतह पर ही हो सकता है। दूसरा, क्या एक अति निर्धन लड़की अपनी कमाई का तीन चौथाई हिस्सा जिह्वा के रसास्वाद के लिए खर्च कर सकती है? दरअसल ऐसे अभागे बच्चे अपने गरीब माता पिता या किसी समाज विरोधी तत्त्व के आदेश में ऐसे बुरे धन्थे में लगे होते हैं। वह किसी के कहने पर ही कूड़ा बीनकर छुटपुट इकट्ठा कर रही है। इस लघुकथा में एक शब्द स्वभाव (सेठ के जाने के उपरान्त स्वभाव से…) वस्तुतः अनावश्यक है। यह कहानीकार का स्वभाव तो हो सकता है कि उसको एक प्लाट / कथानक मिल रहा है। लेखक दरअसल अमीरी गरीबी के जमीन-आसमान दरम्यान विभिन्‍नताओं को दशनिे के लिए व्याकुल है। उसकी इच्छा की प्रशंसा करनी है;  परन्तु उसको इस उद्देश्य के लिए उचित कथानकों के चुनाव की आवश्यकता है।

राकेश प्रवीर की लघुकथा सपनों का सौदागर नाटकीय अंश से भरपूर वृत्तान्तात्मक शैली द्वारा बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को दीर्घ दर्शित रूप में प्रस्तुत करती है। प्रस्तुत व्यवस्था में योग्यता का अपमान एक असाध्य रोग बन गया है। नवयुवकों के सपने मिट्टी में मिल रहे हैं। यथार्थ स्थिति उनको कई मानसिक रोग लगा देती है। इन सबको विचाराधीन लघुकथा सफलतापूर्वक पेश करती है। परन्तु पहले साक्षात्कार में ही उच्चाधिकारी का कथन बहुत मुँहफट है। हमारे राजनीतिज्ञ और उच्चाधिकारी अन्धी और फजूल लूट मचा रहे हैं ,परन्तु भद्र, न्यायप्रिय, ईमानदार और गरीबों के हितैषी होने का मुखौटा सदा पहने रहते हैं। इस तरह यह कथन अस्वाभाविक है। इसको थोड़ा बदल लेना चाहिए।

            बड़ा होने पर लघुकधा में गम्भीर सिंह पालनी बहुत ही सहज ढंग से अति गरीबी और ‘घासकाटने वाले के पुत्र घास काटने वाले’ ही रहने के व्यवहार को प्रस्तुत कर जाता है। एक मासूम बालक की मानसिकता और व्यवहार और दूसरी ओर उसके बाप धनुआ की दीनता पर कथन उस सत्य को रूपमान करते हैं। जिसकी आँच भारत की 40 करोड़ जनसंख्या सह रही है। बँधुआ और बाल मजदूरी हमारे गणतंत्र के माथे पर एक कलंक है। हम इस बारे में कब सचेत होंगे? यह लघुकथा एक चुनौती जरूर देती है। इसको स्वीकार या अस्वीकार करना हम पर है। इस तरह यह लघुकथा ठीक है, परन्तु अन्तिम दो वाक्य अनावश्यक हैं। इनके बिना भी लघुकथा अपना उद्देश्य पूरा कर जाती है। दूसरे जमींदार की सोच उसकी श्रेणी और हितों के अनुरूप नहीं। यह सोच तो मध्यम श्रेणी के पात्र की ही हो सकती है। सम्भवतः यह हमारा लेखक ही हो। वह लघुकथा के अर्थ करने के मोह में फँस गया प्रतीत होता है।

पूँजीवादी शहरी सभ्याचार में खून के रिश्ते पानी से भी हलके पड़ जाते हैं। यहाँ तक कि जन्म  देने और लालन-पालन करके पैरों पर खड़े करने वाले माता-पिता फुटबाल बन जाते हैं। एक बहू-बेटा एक तरफ और दूसरा बहू-बेटा दूसरी तरफ लात मारते हैं। अनेक विषयों में वे बेचारे मैदान से ही बाहर कर दिए जाते हैं। निजी स्वार्थों की पूर्ति सुख सुविधाओं की प्राप्ति के लिए अन्धी दौड़ लगती है। यह दौड़ इतनी बेरहम होती है कि बायाँ हाथ, दायाँ हाथ (या इसके विपरीत) का भी ध्यान नहीं करता। इस बर्ताव सहित शहरी मध्यम श्रेणी के दब्बूपन व्यवहार को बलराम अग्रवाल की लघुकथा फुटबाल बहुत ही खूबसूरती के साथ कहती है। वार्तालाप के सहारे लघुकथा आगे चलती हुई अन्त तक उत्सुकता बनाए  रखती है। लघुकधा ठीक है। पात्रों का व्यवहार उनके जीवन स्तर और मनोस्थिति के अनुरूप है। उनकी भाषा-शैली में कहीं भी अस्वाभाविकता नहीं है।

विषयवस्तु पक्ष से रामेश्वर काम्बोज की लघुकथा ऊँचाई भी उपयुक्त लघुकथा से मिलती जुलती है। वृत्तान्त शैली में संवाद के मध्यम श्रेणी के सोचने के ढंग और गलती के एहसास को सहज स्वाभाविक रूप में चित्रित करते हैं। यह प्रस्तुति यथार्थ, है और यह प्रस्तुति वास्तविकता को समझने में सहायता करती है। माता-पिता ही अपने बच्चों के सबसे अच्छे शुभचिन्तक होते हैं। उनका अपनी सन्तति में अथाह मोह होता है। वे अन्तिम साँस तक उनकी आवश्यकताओं के बारे में चिन्ताग्रस्त होते हैं। बहुत ही बढ़िया यह लघुकथा ध्वनि रूप में प्रश्न खड़ा करती है कि शहरी मध्यम श्रेणी के इन निजी हितों को और अपनी ही सुविधाओं का ध्यान रखने वाली प्रवृत्ति के लिए कौन उत्तरदायी है? विशेषतः हमारा ध्यान प्रस्तुत व्यवस्था की अमानवीय कार्यशीलता की तरफ जाता है। प्रदूषित व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है।

सुभाष नीरव की लघुकथा धूप उच्च मध्यम श्रेणी के दर्प और अफसरशाही मानसिकता के प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत करती है। सपने की सहायता से बुने एक नवीन कथानक द्वारा सामान्य लोगों में विचरने से प्राप्त होती गरिमा का वर्णन इस लघुकथा में हुआ है। कहानीकार अन्त तक लघुकथा में उत्सुकता बनाए रखता है। उच्च मध्यम श्रेणी का दर्प जीर्ण-शीर्ण हो जाता है और ऊँचे होने का गुब्बारा फूट जाता है। इससे पात्र निराश नहीं होता बल्कि उसकी सन्तुष्टि अनुभव करता है। यह सन्तुष्ट मानसिकता और दर्जा तीन और चार कर्मचारियों की अपने अधिकारी के प्रति दिखाई जाने वाली नीरस अस्वाभाविकता के अंश समेटे बैठी है; परन्तु लघुकथा के बाकी गुण इस कमी को कुछ सीमा तक समाहित कर लेते हैं।

श्यामसुंदर अग्रवाल की लघुकथा सन्तू केन्द्रीय पात्र के नाम के ऊपर है। रोजी- रोटी का जरिया  खो जाने से वह अन्दर से कमजोर पड़ जाता हैं। संवाद मुक्त वृत्तान्त शैली द्वारा अग्रवाल अति गरीबी  / जरूरतों-वरूरतों और वास्तविक अस्थायी रोजगार खो जाने के दर्द का प्रामाणिक चित्रण करता है। लघुकथा की गति बहुत ही सहज-स्वाभाविक है। कहीं भी विशेषतः या बनावट नहीं है। लघुकथा के अन्त तक उत्सुकता बनी रहती है। लघुकथा का अन्त पाठक/श्रोता के मन मस्तिष्क पर झनझनाहट छेड़ देता है। सन्‍तू के प्रति सहानुभूति के भावों को उत्तेजित करता है। प्रस्तुत व्यवस्था जो गरीबों की इस दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार है, विरुद्ध घृणा के भाव जाग्रत होते हैं। भारत के करोड़ों सन्तु इन सब कुछ के बारे में कब जागरूक और संगठित होंगे? हमारे साहित्यकारों को उनका नेतृत्व करना चाहिए।

            नरेन्द्र प्रसाद नवीन की लघुकथा साम्राज्यवाद शायद दुनिया के गरीबों के शत्रु इस महाखलनायक  के विरुद्ध घ्रणा पैदा करने के भावों के अन्तर्गत लिखी गई है; परन्तु कुत्ते के साथ घटित घटना और  लघुकथा के अन्त में घोषित समाचार के बीच तर्कसंगत संबंध स्थापित नहीं हो सका। सभी तुलनाएँ अपूर्ण प्रतीत होती हैं। ( All comparisions are incomplete)नवीनतम लड़ाकू साधनों से साम्राज्यवादी शक्तियाँ तो घायल होती ही नहीं हैं। ईऱाक, कोसोवो, लीबिया और सूडान के  उदाहरण हमारे सामाने हैं। साम्राज्यवादी देशों सहित विकासशील देशों को कुत्तों’ के प्रतीकों द्वारा दर्शाना शायद उचित नहीं। दूसरे, साम्राज्य के विरुद्ध इच्छित नफरत की भावना पैदा नहीं हुई। इस तरह एक तरफ दोनों घटनाओं में कोई तर्कसंगत संबंध नहीं होता और दूसरे सन्देश स्पष्ट नहीं होता। तीसरा सामान्यतः हाकरों के लिए ऐसा समाचार महत्त्वपूर्ण नहीं होता। इस तरह लेखक की सकारात्मक भावना के बावजूद लघुकथा नहीं बन पाई ।

वर्दी नामक लघुकथा में हरभजन सिंह खेमकरनी उच्च जातीय दर्प और जाति-पात के भेदभाव की जकड़न को संवादयुक्त वृतान्त शैली में प्रकट करता है। अनावश्यक शब्द जाल से बची हुई यह लघुकथा जमींदारी प्रबन्ध के उस बचे-खुचे की ओर संकेत करती है, जिसने सदियों तक भारतीय समाज के विकास में अनवरत रुकावट डाली है। जाति-पाति भेदभाव और अलगाववाद का विरोध / खण्डन प्रगतिवादी साहित्य के आशयों / उद्देश्यों के अनुरूप है। इस तरह साहित्य की कल्याणकारी दृष्टि के अनुसार सामाजिक यथार्थ को लोकहित दृष्टि से कलात्मक ढंग द्वारा प्रस्तुत करती यह बढ़िया लघुकथा है।

युगल की लघुकथा मुर्दे साम्प्रदायिक मानसिकता की गहरी जड़ों को संवादात्मक शैली द्वारा टटोलती है। कथाकार की विशेषता इस लोक-दृश्य सोच को नए कथानक के बढ़िया चुनाव से बखूबी उभारती है। लघुकथा के अन्त तक आगे जानने की जिज्ञासा बनी रहती है। यह लघुकथा एक वाद-विवादी संकल्प बारे में चर्चा छोड़ सकती है। धार्मिक सम्प्रदाय के लिए कौम शब्द का प्रयोग उचित नहीं है। हिन्दू, सिक्ख, मुसलमान और ईसाई आदि विभिन्‍न धार्मिक सम्प्रदाय हैं। ये  कौमें नहीं हैं । यह ठीक है कि भारतीय इतिहास में इनके साथ कौम शब्द का प्रयोग अलग संदर्भ में होता रहा है। सिक्ख एक अलग क़ौम है की धारणा ही बुनियादपरस्त सिक्‍खों को पाकिस्तान की तरफ खींच कर ले गई थी। अब भी ऐसेअलगाववादी सुर सुनने को मिलते हैं। कौम का अंग्रेजी अनुवाद (नेशन) बड़े विवादों को जन्म दे सकता है। कौम के आधार पर चार-पाँच तत्त्व कार्यशील होते हैं। (क) जुड़वा इलाका (ख) बोली और सभ्याचार की समानता (ग) एकसार आर्थिक और सामाजिक सभ्याचारिक विकास (घ) सांझी एक सत्ता / सरकार  (ङ) ऐतिहासिक घटनाएँ। इनसे स्पष्ट हो सकता है कि धार्मिक सम्प्रदाय कौम का आधार नहीं बन सकते। इस चर्चा को एक तरफ रखते हुए हम कह सकते हैं कि विचाराधीन लघुकथा साम्प्रदायिक सोच, धार्मिक  विभाजन, संकीर्णता और धार्मिक पहचान को केवल बाहरी दिखावे तक सीमित कर देने की रुचि को  ऋणात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करती है। भारत में चल रहे साम्प्रदायिक तनाव और टकराव के वातावरण में धार्मिक सहिष्णुता और आपसी भाईचारे पर बल देना आवश्यक है। इस दृष्टि से भी यह कथा ठीक है।

सूर्यकान्‍त नागर की कथा  प्रदूषण फिल्‍मी संस्कृति और मरणासन्न साम्राज्यवादी संस्कृति द्वारा पैदा हो रहे प्रदूषण को प्रमुख रूप से चुस्त संवाद शैली द्वारा दर्शाती है। प्रायौगिक (खप्त) संस्कृति ‘खाओ  पियो,  मौज करो ‘की रुचि इतनी शीघ्रता से बढ़ रही है कि हमारी जवान हो रही पीढ़ी अपने संस्कृति और कार्य’ सभ्याचार से तेजी के साथ टूट रही है। वह दिशाहीन हो रही है। लघुकधा में प्रस्तुत पात्र ‘मैं’ उन माँ-बाप का प्रतिनिधित्व करता है, जो बेबसी की हालत में भटक रहे हैं। माँ -बाप अपने बच्चे को भविष्य के लिए  तैयार करना चाहते हैं;  परन्तु बच्चे तेजी के साथ भविष्य से बेपरवाह हो रहे हैं। लघुकथा की शुरूआत तो इतनी तेजी के साथ नहीं होती,  परन्तु शीघ्र ही तेज गति पकड़ लेती है। तीक्ष्ण अन्त के लिए मैं पात्र को निराश, बेबसी और गुस्से के भावों में कहना चाहिए, इन लड़कियों में मेरी भी एक बेटी जा रही है। वैसे एक प्रश्न है कि अगर उसकी बेटी बीच में न जा रही होती, तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होती? यह जानकारी रुचिपूर्ण हो सकती है।

पुरुष लघुकथा में सतीशराज पृष्करणा वृत्तान्त शैली में पुरुष मानसिकता का प्रामाणिक बिंब सृजित करता है। पुरुष के सोचने का ढंग एक तरफ विरोधी लिंग के प्रति सहज स्वाभाविक- सा कुदरती खिंचाव है और दूसरी तरफ उसको अपनी आयु और पद की चिन्ता / अहसास है। संस्कार उसको अपराध बोध का अहसास करवाते हैं और विरोधी लिंग के प्रति प्राकृतिक खिंचाव उसको एकाग्रचित्त नहीं होने देता। इस तरह दोनों ओर से द्वन्द्व का शिकार है। वास्तविकता का अहसास करवाए जाने पर वह भटकाव से मुक्त हो जाता है और वह शान्त हो जाता है। तनाव का विसर्जन हो जाता है। मार्कण्डेय जी किसी संभावित अपराध से बच जाते हैं। क्‍या पुरुष इस सोचने की प्रक्रिया के लिए दोषी है? औरत ऐसी  परिस्थितियों के बारे में कैसे सोचती है? अप्रत्यक्ष रूप में सैक्स के मामले में पाप-पुण्य की समस्या को उभारती है? जरूर यह लघुकथा कुछ प्रश्न पैदा करती है। कलात्मक पक्ष से पूरी तरह सफल इस लघुकथा की यही महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

दामोदर दत्त दीक्षित की जनता गुफाएँ भ्रष्ट भारतीय राजकीय व्यवस्था की कार्यशीलता का विशाल परन्तु प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत करती है। इसमें सत्ता राजनीतिज्ञ और उच्च अधिकारियों के पास है। ये दोनों एक दूसरे के पूरक की तरह कार्य करते हैं। राजनीतिज्न उच्च अधिकारियों के ऊपर निर्भर हैं। उच्च अधिकारी इस स्थिति को लोगों का खून चूसने और उनकी समस्याओं, दुःखों-तकलीफों में और वृद्धि करने के लिए प्रयोग करते हैं। अधिकारियों का अपना व्यवहार लूटने, दमनकारी, दब्बू और चापलूसों वाला है। राजनीतिज्ञ सत्ता में रहने की सोचते हैं। उच्च अधिकारियों की मदद से वे शक्ति प्राप्त करते हैं और इसके ऊपर अपना अधिकार जमाए रखते हैं। कुछ हजारों का मर जाना, उनको चिन्तित नहीं करता। उनकी आवश्यकताओं की तरफ से वे पूरी तरह असंबंधित होते हैं। यह सारा कुछ इस लघुकथा में कलात्मक ढंग से प्रस्तुत है। भ्रष्ट राजकीय व्यवस्था के विरुद्ध घ्रणा के भाव भी पैदा होते हैं। ऐसी प्रस्तुति लोगों को चेतन और संगठित करती है। ये तथ्य तो विकास में चालक / निर्णयकारी कर भूमिका निभाते हैं; परन्तु ऐसा लगता है कि यह कथानक पूरी लघुकथा का है। निर्वाह तो ठीक है ;  परन्तु एक पल की प्रस्तुति वाली बात नहीं रही।

सुगन चन्द मुक्तेश की शीर्षहीन कथनी और करनी के बीच के अन्तर को दर्शाती है। मनुष्य कहता क्या है? यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि मनुष्य करता क्या है? महत्त्वपूर्ण है। अमल करना ही वास्तविकता में परखने की कसौटी है। यह लघुकथा पुजारी या ईश्वर के कथित उपासक के दो तरफा व्यवहार को तो दर्शाती है ; परन्तु यह रचना कथानक रहित है। यह एक कथन है और एक कर्म है। इस  लघुकथा में एक बहुत ही आवश्यक तत्त्व ‘कथा- रस’ कहाँ है? ‘शीर्षहीन’ शीर्षक के अन्तर्गत मिश्रित वाक्य भारतीय समाज में ईश्वर के नाम पर बलि देने के व्यवहार संबंधी भी हो सकता है। परन्तु यह आवश्यक ‘कथा- रस’  से वंचित है। लघुकथा का आरम्भ, मध्यांतर और अन्त एक ही वाक्य में है। अगर एक वाक्य ही कहानी बन सकता है, तो फिर एक ही शब्द क्यों नहीं?

अशोक भाटिया की लघुकथा रिश्ते! हाड़- मांस के बने अर्थात्‌ जीते जागते एक मनुष्य की मन:स्थिति और भावुक क्षणों के व्यवहार को दर्शाती है। इस लघुकधा में आगे क्या हुआ? जानने की रुचि बनी रहती है। ऐसी रुचि का बने रहना लघुकथा की रूपगत उत्तमता का प्रभाव है। सेवानिवृत्ति वाले दिन उसकी मनोस्थिति समझ आती है। परन्तु इसमें उस दिन यात्रा करने वाले लोगों का क्या दोष  है? एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या उसकी सोच पर व्यवहार अपनाने योग्य है? लघुकथा में ध्वनि रूप में समाहित सन्देश क्या है? हमने उसकी मानसिकता का प्रामाणिक बिंब रख लिया है; परन्तु हमने क्या सीखा? क्या ग्रहण करें? हमारी उसके साथ औपचारिक हमदर्दी हो सकती है; परन्तु हम उस दिन के यात्रियों का क्या करें? चालक निम्न मध्यश्रेणी में तो है, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है जैसे लेखक अपनी मानसिकता को भी प्रकट कर रहा है।

भगीरथ की दाल-रोटी चुस्त संवाद में आकार ग्रहण करती है। वार्तलाप में एक पक्ष तो मैनेजर है,परन्तु वह किस विभाग का मैनेजर है, स्पष्ट नहीं होता। दूसरा व्यक्ति कौन है? यह भी स्पष्ट नहीं होता। प्रस्तुत वार्तालाप से भी लघुकथा की विषयिवस्तु का पता नहीं लगता। अर्थ और भाव संचार में रुकावट पैदा होती है। बड़ा जोर लगाकर अर्थ सृजन करना पड़ता है। लोकहित/प्रगतिशील साहित्य की एक परख की कसौटी यह है कि सामान्य लोगों की समझ में आए। हमारे लोग बड़े स्तर पर अनपढ़ और चेतना संकट का शिकार हैं। पढ़े-लिखों का बौद्धिक स्तर औसत रूप में नीचा है और वैज्ञानिक पहुँच दृष्टि का बड़े स्तर पर अभाव है। इस स्थिति में लोक-हित साहित्य सरल और स्पष्ट होना चाहिए। इसमें कुछ भी छुपा होना नहीं चाहिए। सामाजिक विकास को समर्पित लोग लुका-छुप्पी से घ्रणा करते हैं।

            मृगजल लघुकथा में बलराम ने दिशाहीन नौजवान और उसके मां-बाप और बहिन-भाइयों द्वारा की जा रही कुर्बानी के चित्र प्रस्तुत किए हैं। हमारी गरीब आबादी का एक हिस्सा सोचता है कि अगर  बाकी सदस्य कुर्बानी करके एक पुत्र को उच्च शिक्षा दिला दें, तो वह बड़ा आदमी बनकर घर की गरीबी को समाप्त कर देगा। परन्तु लघुकथा प्रस्तुत किशन के परिवार की इच्छाएँ: आशाएँ और कुर्बानियों का  घोर अपमान कर रही है। वह साम्राज्यीय प्रयोग कल्चर का अनुयायी बनकर दिशाहीन हो गया है। लघुकथा का अन्तिम गद्यांश मुख्य कहानी से अलग-थलग दिखाई दे रहा है। लेखक घटना और संभावी वार्त्तालाप से स्पष्ट नहीं होने देता, बल्कि स्वयं व्याख्या के मोह में फँस गया प्रतीत होता है। सहज स्वाभाविकता कायम रहनी चाहिए। अगर “मै’ पात्रत् की सास किशन के मां-बाप की इच्छाओं और बहिन-भाइयों की मेहनत के बारे में बताती और “मैं? पात्र हैरान-परेशान होकर रह जाता, तो इच्छित परिणाम निकल सकते थे।

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