जून 2026

दस्तावेज़बहुविध रंगों की लघुकथाएँ     Posted: December 1, 2020

        ‘साँस लेते लम्हें’  विभा रश्मि का पहला लघुकथा संग्रह है, यद्यपि उनकी सृजन यात्रा काफी लंबी है। इन लघुकथाओं में बाल मन की संवेदनाओं ने जितना क्षेत्रफल बटोरा है और पुरानी पीढ़ियों को भी जितनी प्रफुल्लता दी है, उसी से इस संग्रह की धड़कनों का, साँसों की सार्थकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अपने समय की सारी विषमताओं, जड़ताओं, संवेदनहीनताओं में  भी वे उस ओजोन परत का विन्यास करती हैं, जो इन छिद्रों को नए रंगों से पाट सकें। और ये रंग जीवट के हैं। नजरियों को समझने की सहृदयता के हैं। बाल मन की प्रफुल्लताओं  के साथ विवशताओं के उदास रंगों के हैं।  कमजोर वर्ग की व्यथा- विवशताओं के बीच उभरते उनके निर्मल मन के शुक्ल पक्ष के हैं। वृद्धजनों की मजबूरियों में भी बाल रंगों में खो जाने की हार्दिकता के हैं। पक्षी हों या वनस्पतिक संसार; अंडों-कोपलों में जीवन के उल्लास की धड़कनों और रिश्तों के संवेदनीय सहचार लुभाते हैं। पीली सरसों के खेतों को लीलती मल्टी कंक्रीट- सभ्यता, दांपत्य के आधुनिक रंगों में तिड़कते रिश्ते,  पुरुष वर्चस्व की जबानों पर नारी संवेदन की चिरमयी मुस्कान, नेताओं, पुलिसिया चरित्रों का यथार्थ। भाषा की तत्समता में, लोकजीवन और बोलियों का आत्मीय परस। इन लघुकथाओं में लम्हों की अनुभूतियाँ जीवन के बहुविध रंगों को सँजोती हैं।

इन लघु कथाओं में वह  सहृदय आँख  हर खोखल, हर दरार, हर किरची के साथ मौजूद है ,जो भावसाध्य रसायनों से इन्हें भर देती है। विच्छेद को संधि में बदलने की मूल्यपरकता हर कहीं सकारक है। “पहली बारिश” में अम्मा की फटकार का अतिक्रमण करती गुड़िया बारिश में तीन पीढ़ियों को  मुस्कान के नर्तन के साथ कठोर अनुशासन वाली अम्मा को पकौड़ियाँ तलने  को विवश कर देती है।   ‘संस्कार’ में इसके ठीक उलट कार्टून में खोए बच्चे, पढ़ने खेलने के संस्कार की ही छुट्टी कर देते हैं। लेकिन ‘हथेली पर उगता सूरज’ में बाल सहजता ही मलबे में तब्दील घर को नया संकल्प देती है। चौखट पर ईंट थमाती नन्हीं बेटी को देखकर वह बालप्रज्ञा माँ को यह कहने के लिए विवश कर देती है,”फिर बाँधूँगी घर .. मैं ।”संग्रह में ऐसी अनेक लघुकथाएँ, बाल मन, बाल मन की चहल-पहल, बाल मनोविज्ञान, बालमन की संवेदनाओं में उभरे नैतिक पवित्र भाव और कायदों से अनजान रिश्तों की सहजता को संजो लेते हैं।’संपणो री छतरी’,’खोज’, ‘तिरंगा किसका’,’ जीत’, नई माँ, बंधुआ, शिशुवत्, पुरस्कार, नैसर्गिकता, चाबी का खिलौना आदि लघुकथाएँ अलग-अलग कोनों से इस भाव तरलता के नए रंग भरती हैं।

इन दिनों साहित्य में विमर्श रचनात्मकता पर हावी है। विमर्श   लेखकीय बोध का सचेतन हिस्सा बनते हैं। और उससे संवेदनीय बोध परिपक्व होता है। पर विमर्श के जरिए जब रचना आती है, तो उसे उतनी सहज नहीं होतीः बल्कि लेखकीय प्रवेश से बाधित भी।  विमर्श को गलाकर ही रचनाएँ अधिक संप्रेषणीय होती हैं। जब वे यथार्थ और संवेदन को खुद से प्रेषणीय बनाती हैं।

अच्छी रचनाएँ इसी तरह विमर्श के  केंचुल को हटाकर संदेश को अधिक सहज और मुखर बना देती हैं। अमीरी के” कंगाल मन “को कार के ड्राइवर का संवेदन इस कदर छोटा कर देता है कि अमीरी को दुत्कारता हुआ, छोटे आदमी के साथ चुंबक की तरह चिपक जाता है।  ‘कलई’ का दूधवाला, ‘दूध’ का चौकीदार,’नमक हलाल’ का अश्कु, ‘तंदूरी मुर्गा’ का गच्चू  ऐसे ही पात्र हैं, जिनमें निम्नतम वर्ग का पात्र आदमियत का संवेदनशील पाठ पढ़ा जाता है। इन गरीब पात्रों का मूल संवेदन किसी शास्त्र- पाठ की उपेक्षा नहीं करता, बल्कि अमीरी को पाठ पढ़ा देता है।
यो कई अक्स हैं इन लघु कथाओं के। दांपत्य राग का रोमांटिक अंदाज, विवाह के बाद वेतन के अर्थशास्त्र के बँटवारे और एक दूजे के बजट की कतरब्योंत में पूर्वराग को “तू तू मैं मैं” के तिनकों में बिखेर देता है। एक बेहतरीन कंट्रास्ट और संवादी बुनावट सामयिक दांपत्य जीवन की झलक दे जाते हैं। ‘चाय की प्याली’ में ठहरे हुए दांपत्य की उदासियाँ हैं, तो ‘छुटकारा’ में शराबी पति से विद्रोह। ‘क्रेजी’ के फेसबुकिया प्रेमिल रंग किस तरह बदरंग हो जाते हैं, यह तो आभासी दुनिया का नशा ही बतलाता है। चैटिंग के मायाजाल से असल दुनिया में आने पर अनफिट हो जाते हैं।
संग्रह की कुछ लघुकथाएँ यदि भूख के मर्मान्तक परिदृश्य को बुनती हैं, तो ‘फर्क’ जैसी लघुकथा व्रत उपवास उनकी असल प्रज्ञा के बजाय उनके उत्सवी रंगों की मुखरता पर गहरी मार करती हैं। ‘व्रत उपवासो’ में भूख को सजाने वाले परिदृश्य पर गाँव के लड़के का जवाब यथार्थ की वक्रोक्ति है -“हमारे यहाँ भूख को नहीं सजाते..  भूख से मर जाते हैं बस्स।”  ऐसे ही कुपोषण, नक्सलवाद, पूर्वग्रही अंधविश्वासों, गोरे- काले की रंगवादी मानसिकताओं, आदिवासी नारियों के देह शोषण, छपासवादी प्रलोभनों पर व्यंगात्मक प्रहार करने वाली लघुकथाएँ लेखिका की व्यापक दृष्टि और वैविध्य को दर्शाती है।       

       विभा रश्मि की लघुकथाएँ न तो कथाकथन की शिकार हैं, न अमूर्तन की। ये लघुकथाएँ कथाविन्यास में सारे पेंच ले आती हैं, जिससे नाटकीयता के साथ संवाद शैली जीवंत हो जाती है। पंच लाइनों के फेर की अपेक्षा यह लघुकथाएँ परिदृश्य की विसंगतियों, विरोधी रंगो की योजना, कठोर से कोमल की टकराहट, यथार्थ परिदृश्य में संवेदना के कोमल एहसासों को इस तरह बुनती है कि उनका चरमान्त चौंकाता नहीं है ,बल्कि बदलाव की जमीन पर ला देता है।  कई बार तो बच्चों का कोमल संवेदन काले -गोरे जैसे सवालों पर भी पुरानी पीढ़ी के  लोगों पर असरदार हो जाता है। ‘कलाकार’ में लेखिका की कला-दृष्टि इतनी भावसंवेदी हो जाती है कि संगमरमर की नारी की मूर्ति का सौंदर्य माँ की सजल प्राणवत्ता में अप्रतिम बन जाता है।
‘साँस लेते लम्हे’ सभ्यता के संस्कारी अकाल में वृद्धों की उपेक्षा का चित्र है, जो हिंदी लघुकथाओं में आम है। पर वृद्धजनों के बीच बच्चों को पाकर वृद्ध आश्रम की हवा जितनी बदलती है , वहीं बच्चों का यह सवाल सामाजिक व्यवस्थाओं पर कितना भोला -सा तर्क रच जाता है। और उसका उत्तर भी,” दीदी यहाँ के सारे दादू हमारे साथ क्यों नहीं रह सकते, उनका आश्रम हमारे घर के पास बना लो न।”  व्यवस्था की खाइयों को पाटती यह संवेदना बालमन को ही व्यंजित नहीं करती, पीढ़ियों के तादाम्य और स्नेहिल रंगों की दिशा भी दिखलाती है। ये लघुकथाएँ प्रेरक भाव बोध, आदर्शवाद की भावत्मकता, संदेश देने की मानसिकता की अपेक्षा अपने कथा विन्यास और पात्रों के संवादीपन से मूल्यपरक संकेत देती हैं ,जो सामंजस्य और बेहतर रिश्तों के हैं।
यों यथार्थ के क्रूर परिदृश्यों में भाषा के तेवर जितने तीखे हैं, उतने ही सौहार्द के प्रसंगों में तरलता के साथ समावेशी ।बोलियों के रंग इन्हें लोकजीवन तक ले जाते हैं। इस दृष्टि से जितने आंचलिक रंग हैं , उतने ही फेसबुकिया संस्कृति के अँग्रेजी ढ़ले भी।
इन लघुकथाओं की विशिष्टता जितनी क्षण को साधने की है, उतनी ही परिदृश्य को रचने की। ये जितनी आदिवासी छोर से जुड़ी हैं, उतनी ही आज की तकनीक के प्रभावों से भी।  इन लघुकथाओं के विमर्श में जितनी पारंपरिक नारी है, उतनी ही आधुनिका भी।  और ये आधुनिकाएँ अपनी कामकाजी संस्कृति में उन सारे वायरसों को ठीक से समझती हैं और उनके तोड़ भी। ‘एंटीवायरस’ बेहद नुकीली, आधुनिक प्रेमिक रंगों से छुपे यौन-वायरस हो को करीने से ताड़ती हुई सजग युवती का कौशल है। पर लेखिका ने आज की कंप्यूटर तकनीक से मारक बना दिया है – “हमउम्र मेम की आँखों में लाल डोरे खिंच आए थे, पर साथ ही उन्होंने एंटीवायरस प्रोग्राम ऑन कर दिया था।  जिसने उनकी आँखों के स्क्रीन पर अपना काम करना शुरू कर दिया था। .. उन्होंने बड़ी कुशलता से अपनी फाइलें और डाटा बचा लिया था।” विन्यास का यह कौशल लघुकथा को आधुनिक तकनीक तक ही नहीं लाता ,बल्कि उस तकनीक को रिश्तों की चौकसी में भी बदल लेता है देता है। निश्चय ही पारंपरिक विषयों की रेंज से आधुनिक तकनीक के धरातल तक विस्तार इन लघुकथाओं में नये रंग भरता है।

-0-बी. एल .आच्छा, 36,क्लीमेंट्स रोड,पुरुषवाकम्,चेन्नई, (तमिलनाडु)-पिन: 600007
मोबाइल नम्बर: 942508335

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine