कोइली धान लगाकर घर पहुँची तो दुवारे ही मटुकी लिपट गई। भूख से उसका चेहरा निस्तेज हो रहा था। कल संध्या से चूल्हा न जला था। पीला कार्ड तो बन गया था मगर इस महीने उसे राशन न मिला था। कई दिन बेगारी पर भी किर्री जमीदार ने अनाज देने से मना कर दिया था।
‘समझती काहे नहीं तू ऊपर से ऑडर आया है जिसका कार्ड लिंक नहीं होगा उसे कुछ न दिया जाय। करासिन भी नहीं।’
उधारी-व्यवहारी काफी दिनों से चल ही रहा था। कोई कब तक दया- धरम निभाता और जब पूरे कटइला गाँव की यही दशा हो तो…! जबरिया जयकारा और उत्तरदायित्वहीन व्यवस्था को होंठ पटकने थे, पटक दिया। कोइली का जाने हो, का लिंक कइसा लिंक ? कीर्तनिए सुर साध रहे थे..भांटगिरी कर रहे थे। पहिले की चोरबजारी अइसेहे न रुकेगी। नए-नए मठ-मठाधीश उमक रहे थे विधि-विधानों के लेटेस्ट फार्म में। कीर्तिमान रचने की रेसें अलग से। बहसें इस पर ज्यादा कि कौन कम बेईमान-कौन ज्यादा बनिस्बत इसके कि किसने कितना काम किया ?
मटुकी को पथरचटा का सगपहिता पिलाकर कोइली फिर चली गयी ब्याढ़ लगाने। आज मालिक से कहे-सुनेगी। मजूरी भला माँगी जा सकती है !
बुतों से मिन्नतें !
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लछुवा वाले चक के बाद लगवहीं का हिसाब किया जाएगा। किर्री के बँधुवा मजदूर ने कल्लनवा को लगा दिया था- कोइली को बता दे, समझा दे– ‘जा धान लगा।’
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दीया-बाती का समय हो गया था। पथरचटा दबाये कोइली घर पहुँची तो….
‘अम्मा रोटी–अम्मा रोटी।’
जैसे माँ का इंतजार था उसे। कोइली के हाथ में मटुकी ने आखिरी साँस ली। रजिस्टर में नाम दर्ज कराने वाले बाख़बर हो गए। यही दस्तूर है। जिंदा में अपनपौ मिला किसे है ?
‘चलो बेटउना तो बचा है न !’ भीड़ से आवाज आयी।
रोना जुल्म के खिलाफ सबसे कमतर प्रतिरोध है।
किर्री के ट्यूबवेल पर सात बीस के प्रादेशिक समाचार रेडियो में चल रहे हैं ‘प्यारे देशवासियों हमें प्रसन्नता है कि हम बाघों को बचाने में लगातार सफल हो रहे हैं।
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