समकालीन लघुकथा और बालकों की दुनिया
-बलराम अग्रवाल
बचपन जीवन की वह खिड़की है जिससे बड़ों की दुनिया में झाँकते-किलकते हुए हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब कूदकर उसके पार इधर आ पहुँचते हैं। परेशानी यह है कि खिड़की से पार कूद आने की इस अनजानी क्रिया के अधिकतर मामलों में बचपन का अधिकांश उधर ही छूट गया होता है और काफी प्रयत्नों के बाद ही उसका कोई एक सिरा कभी हाथ आ पाता है। बाइत्तफाक़ कोई अगर बचपन को समूचा साथ लेकर उस खिड़की के इस पार आ सके, बचपन का पूरा आनन्द वह तभी इधर ले सकता है। यहाँ यह बता देना अत्यन्त आवश्यक है कि ‘बचपन’ और ‘बचकानापन’के बीच वैसा ही अन्तर है जैसा कि लहरों और भँवरों, वायु के शीतल झोंकों और धूलभरी आँधियों के बीच है। ‘बचकानी’ हरकतें बचपन की खिड़की से कूदकर इधर आ चुके लोगों द्वारा ही सम्भव हैं, खिड़की के उधर खेल-कूद रहे बच्चों के द्वारा नहीं। साहित्य के क्षेत्र में जिस प्रकार विधाएँ एकाएक नहीं जन्मतीं, बल्कि समाजार्थिक व राजनीतिक दबाव से कुछेक वर्षों में शनै:-शनै: आकार ग्रहण करती हैं; उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी पिछली अवस्था के अनुभवों, शिक्षाओं, मान्यताओं और स्थापनाओं के साथ अगली अवस्था में सुबह की धूप की तरह प्रविष्टि पाता है, एकाएक नहीं।

माधव नागदा की लघुकथा ‘असर’ देखकर सीखने के बाल-मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अतिरिक्त बच्चों के चरित्र-निर्माण में आड़े आ रही अनेक समकालीन समस्याओं की ओर भी इंगित करती है। जैसा कि इन दिनों अनेक टीवी चैनलों के कार्यक्रमों में बच्चों से प्रौढ़ संवाद बुलवाए जा रहे हैं, उनकी आयु को नजरअन्दाज करके उनसे कामुक अंग-संचालन व नृत्य कराए जा रहे हैं, उसे देखते हुए यह अति आवश्यक महसूस होता है कि बच्चों से ऐसा नृत्य और अभिनय कराने तथा उनसे वैसे संवाद बुलवाने वालों के खिलाफ कड़ा कानून बनाया जाना चाहिए ताकि कुछेक कला-पिशाचों व धन-पिशाचों द्वारा मात्र कुछ धनराशि अथवा किंचित प्रशंसापरक प्रचार देने का लालच परोसकर बच्चों से उनका बचपन छीन लेने की साजिश पर रोक लगाई जा सके।
आजकल बच्चों के चरित्र में आते जा रहे नकारात्मक बदलाव के लिए वे अकेले ही दोषी हों, ऐसा नहीं है। उनको लेकर माता-पिता की अंधाकांक्षाएँ तथा विलास के क्षणों में बच्चों द्वारा उत्पन्न किए जा सकने वाले अवरोधों से मुक्त रहने के उनके प्रयत्न भी इसके लिए दोषी हैं। बच्चों को अनुशासित ढंग से घर में ही टिकाए रखने के लिए अति आवश्यक है कि घर के माहौल को खुशनुमा रखा जाए; हवादार घर के आँगन को बनाया जाना चाहिए न कि बच्चों को हवाखोरी के लिए खुला छोड़कर विलासिता में डूबे रहना चाहिए। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि बच्चों को घर में बाँधकर रखा जाय। ऐसा करना लगभग असम्भव है। नवीनतम मनोविश्लेषणों के आधार पर मनोविश्लेषकों का मत है कि स्वाभिमानी व्यक्तित्व का स्वामी बनने हेतु बच्चों को वस्तुत: आदेश नहीं, सहानुभूतिपूर्ण सलाह और समयानुकूल दिशा-निर्देश चाहिएँ। सिर्फ इतना देकर माता-पिता उन्हें उन्नति के उचित रास्ते पर डाल सकते हैं। बालक के व्यक्तित्व-निर्माण की चाबी ऐसे ही माता-पिता, अभिभावक तथा शिक्षक के अपने हाथों में होती है, सबके नहीं। अभिभावक के तौर पर अगर आप बहानेबाजी करते हैं, झूठ बोलते हैं, तो आपके बच्चे भी यह सब करेंगे ही। अगर आप अपनी रकम का छोटा-सा भी हिस्सा किसी धार्मिक संस्था, शिक्षा संस्था, स्वयंसेवी संस्था या समाजोपयोगी किसी सद्कार्य हेतु दान किए बिना, उसे पूरी तरह अपने ही ऊपर खर्च कर डालते हैं तो आपके बच्चे भी वैसा ही करेंगे। अभिभावक के तौर पर अगर आप जातिभेद, रंगभेद और लिंगभेद के किस्सों को दर्प के साथ गढ़ते, सुनाते और उन पर ठहाके लगाते हैं तो विश्वास मानिए कि आपके बच्चे उस ज़हर को अगली पीढ़ी तक अवश्य पहुँचा देंगे और तब उस जहर से समाज को बचाने का साहस आप लेशमात्र भी नहीं कर पायेंगे। सूर्यकांत नागर की लघुकथा ‘विष-बीज’ कुछ ऐसी ही स्थितियों के प्रति हमें सचेत रहने का मंत्र देती है। बच्चों का उचित पालन-पोषण करना और गलत कार्यों के खिलाफ उनमें संघर्ष की भावना पैदा करना किसी भी प्रकार की तकनीकी सिद्धहस्तता पा लेने, यहाँ तक कि आणविक अस्त्र डिजाइन करने से भी अधिक उपयोगी कार्य है। जो व्यक्ति अपने बच्चे की प्रकृति को नहीं समझता हो, उसे स्वयं को उसका पिता अथवा माता कहने का अधिकार नहीं है। दुनिया के सबसे बुद्धिमान माता-पिता वे हैं,जो अपने बच्चे की प्रकृति को जानते हैं। उस पर अपने विचार लादने की कोशिश नहीं करते। दुनियाभर के माता-पिता चिन्तित रहते हैं कि उनका बच्चा कल को क्या बनेगा? दरअसल वे यह भूल जाते हैं कि बच्चा आज भी कुछ है। समकालीन हिन्दी लघुकथा ने इस तथ्य को भी विभिन्न कोणों से प्रस्तुत किया है। श्यामसुन्दर ‘दीप्ति ‘की लघुकथा ‘बदला’ की नन्हीं बच्ची रचना अपनी माँ को अपने अस्तित्व का भास बालसुलभ अंदाज़ में ही नाराजगी व्यक्त करके कराती है। बच्चों में स्वाभिमान की भावना उच्च स्तर तक भरी होती है तथा अपनों से बड़ों की बातें वे मानें या न मानें, इतना जरूर है कि उन्हें चीखने-चिल्लाने का मौका देने से वे कभी बाज नहीं आते। इस मनोवैज्ञानिक सत्य से बलराम की लघुकथा ‘गंदी बात’ भी पाठक का परिचय कराती है।
आज की दुनिया में बच्चों के लिए सबसे कठिन काम यह है कि अच्छा आचरण दिखाए बिना उनसे अच्छा बनने को कहा जाता है। अधिकतर आचार-व्यवहार बच्चे पढ़ाने से नहीं, देखकर सीखते हैं। कालीचरण ‘प्रेमी’ की लघुकथा ‘चोर’ तथा विजय बजाज की लघुकथा ‘संस्कार’ में इस सत्य का सटीक चित्रण हुआ है। हमारी बच्चियों के चरित्र में आदर्श गृहिणी अथवा आदर्श माँ बनने का बीजारोपण बिना सिखाए ही कैसे हो जाता है, इसे समझने के लिए प्रबोध कुमार गोविल की ‘माँ’ एक आदर्श लघुकथा है तो यह समझने के लिए कि आदर्श नागरिक बनने का गुण बच्चे में कैसे पनपता है, डॉ सतीश दुबे की ‘विनियोग’ अत्यन्त प्रभावशाली लघुकथा है।
माता-पिता का दायित्व सिर्फ यहीं समाप्त नहीं हो जाता कि उन्होंने अपने बच्चे को नाक पोंछना और सू-सू करने के लिए टॉयलेट तक जाना सिखा दिया है। बच्चों को दूसरों के साथ अच्छा बर्ताव करना और देश व धरती से प्यार करना सिखाना भी उन्हीं का दायित्व है। दिनेश पाठक ‘शशि’ की लघुकथा ‘लक्ष्य’ इस दायित्व का पूर्ण निर्वाह करती है। प्रत्येक अभिभावक बच्चों को कुछ ऐसे बातें जरूर बताता है जो उन्हें याद रखनी चाहिएँ। ऐसा अवसर कि बच्चे स्वयं ऐसे अनुभवों के सम्पर्क में आएँ और स्वाभाविक रूप से उन्हें याद रखे, अभिभावक उन्हें नहीं देते। बच्चे का इस विश्वास से भरा होना कि वह भी एक इन्सान है और उसकी बात का भी कोई मूल्य है, अति आवश्यक है।
बच्चे को अभिभावक अगर कुछ सिखाना चाहते हैं तो अपने आपको उसके आगे आदर्शरूप में प्रस्तुत करने का यत्न करने की बजाय उन्हें जीवन में की हुई अपनी गलतियों से अवगत कराना चाहिए ताकि वह उनसे सावधान होकर चलना सीख सके या फिर नए सिरे से उनसे टकराने का संकल्प ले सके। एक दृष्टिकोण यह भी है कि सीधे-सीधे अपनी राय लादने से बेहतर है कि बच्चे से पहले पूछा जाय कि वह बनना क्या चाहता है। उसके बाद जैसा वह चाहता है, वैसा बनने के लिए उसे प्रोत्साहित किया जाय। लेकिन अधिकतर माता-पिता इस मनोवैज्ञानिक सत्य से या तो अनभिज्ञ होते हैं या फिर अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं। वे यह सोच ही नहीं पाते हैं कि बच्चे अपना पथ आप तय करने तथा गैर-सामाजिक तत्वों को पहचानने में सक्षम होते हैं। अभिभावकों को अगर कभी लगे कि बच्चे में किसी बदलाव-विशेष की जरूरत है तो उस पर ठीक से ध्यान दिया जाना और यह सोचा जाना बेहद जरूरी है कि स्वयं उन्हीं को ही तो बदलाव-विशेष की जरूरत नहीं है। रामकुमार आत्रेय की लघुकथा ‘समझ’ में चौहान साहब का बेटा इसका सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। कुछ विशेष अवसरों पर बच्चे अगर बड़ों को उनकी औकात समझा देते हैं तो इसमें गलत क्या है?
जीवन में सबसे बड़ा उपहार जो एक पिता बच्चे को दे सकता है, यह है कि वह उसकी माँ को आदर व सम्मान दे। रामकुमार आत्रेय की ही लघुकथा ‘जन्मदिन का तोहफा’ में कूड़े-कचरे के ढेर से काम की चीजें ढूँढने का काम करने वाले बच्चे कालिया को उसका बापू यही नायाब तोहफा देता है।
पारस्परिक-बंधन वस्तुत: एक ऐसा अनुभव है जिसे समझने में व्यक्ति को घंटे, दिन, सप्ताह, महीने या साल भी लग सकते हैं। कमलेश भट्ट ‘कमल’ की लघुकथा ‘प्यास’ में मालिक के बच्चे नौकर-बालिका गुड्डी के साथ ऐसे ही बंधन में बँधे हैं जिसे उनकी मम्मी नहीं समझ पाती।
नीलम कुलश्रेष्ठ की लघुकथा ‘आरोपण’ का बोनी अपनी टीचर द्वारा अंग्रेजी मे पूछे गए सवालों के तात्पर्य को न समझकर जवाब में ‘यस’, ‘यस’ ही बोलता रहता है और चोर ठहरा दिया जाता है। माता-पिता के ऐसे ही पूर्वाग्रह की मार प्रेम भटनागर की लघुकथा ‘शिक्षाकाल’ के छात्र रवि वर्मा को भी झेलनी पड़ती है।
समकालीन लघुकथाकारों ने अस्पृश्यता एवं जातिगत भेदभाव की दुर्भावना के विरुद्ध भी प्रभावपूर्ण रचनाएँ कथा-साहित्य को दी हैं। भूपिंदर सिंह की लघुकथा ‘रोटी का टुकड़ा’ में बच्चा अपनी माँ की हिदायत से असहमति प्रकट करता हुआ उससे पूछता है—“और जो काकू जमादार हमारे घर पर पिछले कई सालों से रोटी खा रहा है, तो वह क्यों नहीं ‘बामन’ हो गया?” बच्चे को पीटने के लिए उठा हुआ किस माँ का हाथ ऐसे तर्कयुक्त सवाल को सुनकर वापस नीचे नहीं आ जाएगा? एकदम ऐसे ही तर्क के साथ प्रस्तुत होती है नीलिमा टिक्कू की लघुकथा ‘नासमझ’। दलित छात्रों के प्रति सवर्ण अध्यापकों के दुर्व्यवहार और दुर्भावना को चित्रित करती लघुकथा है रंगनाथ दिवाकर की ‘गुरु दक्षिणा’ तथा बच्चों के मनोमस्तिष्क में उच्च और निम्न जाति के जहर को भरने के प्रयासों का पर्दाफाश करने वाली लघुकथा है—मीरा चन्द्रा की ‘बच्चा’। कमल चोपड़ा की लघुकथा ‘खेलने दो’ का दलितजातीय बच्चा चरणू अपने सामाजिक आस्तित्व की लड़ाई लड़ता और उसे जीतता प्रतीत होता है।
सुकेश साहनी, श्यामसुन्दर अग्रवाल, अरुण कुमार और सुरेश अवस्थी—‘स्कूल’ शीर्षक से इन चार कथाकारों की लघुकथाएँ मेरे सामने हैं, अन्य भी अवश्य होंगी। आजकल के स्कूल बच्चों को शिक्षा और स्नेह देने वाला केन्द्र बनने के अपने दायित्व का निर्वाह करने की बजाय उनको आतंकित करने वाले केन्द्र बन चुके हैं। श्यामसु्न्दर अग्रवाल की ‘स्कूल’ का बंटी इसी से आतंकित होकर अँधेरी कोठरी में जा छिपता है। सुरेश अवस्थी भी ‘स्कूल’ को बालमन को आतंकित करने वाले केन्द्र के रूप में चित्रित करते हैं—‘उसे लगता—स्कूल वह स्थान है जहाँ गमला तोड़ने, फूल तोड़ने, जोर-से बोलने, देर-से सोकर उठने आदि सभी बातों की सज़ा मिलती है।’ स्कूल, वहाँ की शिक्षा और शिक्षक—सभी के प्रति यही स्थापना भगीरथ की लघुकथा ‘शिक्षा’ में भी देखने को मिलती है।
लड़कियाँ अब नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें गुड़िया की तरह इस्तेमाल करे। वे बेटों की तरह रहना तो पहले भी चाहती रही होंगी, लेकिन अब अपने इस अधिकार को पाने के लिए वे मुखर भी हो उठी हैं। डॉ तारा निगम की लघुकथा ‘माँ, मैं गुड़िया नहीं लूँगी’ को इस विषय की श्रेष्ठ लघुकथा चिह्नित किया जा सकता है।
देवांशु वत्स की लघुकथा ‘सपने’ भट्टा-मजदूर पिता के काले और खुरदुरे हाथों वाले बच्चे के सपनों के बनने और बिगड़ने को व्यक्त करती है। अनिंदिता की लघुकथा ‘सपने’ में गुब्बारे बेचकर परिवार का पोषण करने वाले गरीब आदमी की व्यथा का चित्रण है। अशोक भाटिया की ‘सपना’ का होमवर्क और पेपरों की तैयारी में उलझा बच्चा अपने लिए चिड़िया-जैसे स्वतंत्र जीवन का सपना देखता है; ऐसा सपना, जो यूनिवर्सिटी तक पढ़ लेने के बाद ही पूरा हो पाएगा। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा ‘सपने और सपने’ इस मनोवैज्ञानिक तथ्य पर आधारित है कि सपनों का सम्बन्ध व्यक्ति के अचेतन मन की गहराइयों में जा छिपी उसकी अपूर्ण इच्छाओं से होता है। सेठ गणेशीलाल का बेटा पहाड़ों और नदियों के पार सैर करने का सपना देखता है और नारायण बाबू का बेटा इतना तेज स्कूटर चलाने का कि उसने सबको पीछे छोड़ दिया। इन सम्पन्नों से अलग, जोखू रिक्शेवाले का बेटा डटकर खाना खाने का सपना देखता है, लेकिन अपने इस सपने को सुनाकर वह रो पड़ता है और इस यथार्थ का उद्घाटन करता है कि सपने सिर्फ सपने होते हैं, उनमें खाए भोजन से पेट नहीं भरा करता। गरीब परिवारों में सेब, अनार और आम जैसे महँगे फलों की सहज-प्राप्ति बच्चों के लिए नि:सन्देह सपना ही है। इन परिवारों में सेब-सरीखा फल तो केवल बीमार व्यक्ति को देने-भर के लिए डॉक्टर की सलाह पर ही घर में आ पाता है। घर की तीन वर्षीय बच्ची इस यथार्थ से परिचित है और सेब खाने की अभिलाषा में ए फॉर एप्पिल पढ़ाते अपने पापा से पूछती है—“मैं कब बीमाल होऊँगी पापा?”
कुमार नरेंद्र की लघुकथा ‘अवमूल्यन’, अवधेश कुमार की लघुकथा ‘मेरे बच्चे’, विनायक की लघुकथा ‘नाव’, शैलेन्द्र सागर की लघुकथा ‘हिदायत’, पूरन मुद्गल की लथुकथा ‘जीत’ और हरीश करमचंदाणी की लघुकथा ‘लूट’ को श्रेष्ठ प्रतीक लघुकथा तथा राजेन्द्र यादव की ‘अपने पार’ व हरदर्शन सहगल की ‘गंदी बातें’ को श्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक लघुकथा कहा जा सकता है। हरिमोहन शर्मा की लघुकथा ‘सिद्धार्थ’ तथा हीरालाल नागर की लघुकथा ‘बौना आदमी’ सकारात्मक मानवीय मूल्यों को स्थापित करने वाली लघुकथाएँ हैं।
भारत यायावर की लघुकथा ‘काम’ का भिखारी-बच्चा भीख माँगने को ही काम की संज्ञा देता है तो मुकीत खान की ‘भीख’ का बच्चा ड्यूटी पर तैनात पुलिस वालों द्वारा भिक्षा-व्यवसाय कराने के निकृष्ट सत्य का सामना करने को विवश होता है।
निर्मला सिंह की ‘आक्रोश’ में घर के बाल-नौकर कालू द्वारा पालतू कुत्ते स्रोई को दिया गया ट्रीटमेंट माननीया मेनका गाँधी को शायद नागवार गुजरे, लेकिन सचाई तो यही है कि बच्चे किसी अन्य पर नहीं, बल्कि उसी पर अपना गुस्सा उतारते हैं जो उनके अपमान का कारण बनता है। आयु-विशेष में पहुँचकर बालकों में निजता की भावना पनपने लगती है। वे वैयक्तिक अनुशंसा-प्रशंसा को प्राप्त कर लेने की ओर अग्रसर हो जाते हैं। डॉ राजेन्द्र कुमार कनौजिया की लघुकथा ‘घरौंदा’ इस मनोवैज्ञानिक सत्य से पाठक का साक्षात्कार कराती है। बच्चों को स्थूल प्यार और सहानुभूति ही नहीं चाहिएँ, बल्कि इन्हें वे अपने अन्तस्थल में महसूस करना चाहते हैं। अनूप श्रीवास्तव की लघुकथा ‘मातृत्व’ कमजोर शिल्प के बावजूद इस तथ्य को प्रस्तुत करने में सफल है। रमेश गौतम की लघुकथा ‘बारात’ सभ्यता का लबादा ओढ़कर मेहनतकश ग़रीबों के गाल पर तमाचा मारने जैसी असभ्यता का पर्दाफाश करती है तो पारस दासोत की ‘भूख’ गरीबी के एक यथार्थरूप को हमारे सामने रखती है। सुरेश शर्मा की ‘दीया तले’ बाल-मजदूरों के बारे में राजनैतिक नेताओं की कथनी और करनी के अन्तर को सफलतापूर्वक चित्रित करती है।
गरीबों के पास अपने जीवन-यापन हेतु अत्यल्प संसाधन होते हैं और वे लगातार इस भय से त्रस्त रहते हैं कि उक्त सीमित संसाधनों का उपयोग करके वे पुन: उनसे विहीन न हो जायँ। दीपक घोष की लघुकथा ‘रोटी’ इस सत्य का उद्घाटन करती है। कुलदीप चेतनपुरी की ‘भूख’ इस सत्य का उद्घाटन करती है कि जिनके पास भूख को मिटाने के समुचित संसाधन मौजूद हैं, वे नहीं जानते कि भूख क्या है? नीता सिंह की लघुकथा ‘टिप’ की कथानायिका एक छोटे-से ढाबे में वेटर का काम करने वाले दस-ग्यारह वर्षीय लड़के को टिप में एक रुपया दे देती है। लड़का तुरंत उस रुपए के बदले कुछ बिस्कुट खरीदकर खाने बैठ जाता है। स्पष्ट है कि भूखे व्यक्ति से यदि रुपया और रोटी में से किसी एक को चुनने को कहा जाय तो वह रोटी के चुनाव को ही वरीयता देगा।
महेन्द्र रश्मि की लघुकथा ‘कॉन्वेंट स्कूल’ के शीर्षक को पढ़कर आभास होता है कि शरनजीत के बेटे लवली की असभ्य हरकतों की जिम्मेदारी कॉन्वेंट शिक्षा पर डाली गई है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बच्चे की पहली पाठशाला उसका घर तथा पहले शिक्षक उसके माता-पिता होते हैं। लवली अगर अपने पक्षाघात-पीड़ित बाबा की भद्दी नकलें कर रहा है तो उसका दोष पिता शरनजीत द्वारा इस भद्दे काम को करने के लिए उसको प्रोत्साहित करना है। संसार के समस्त प्राणियों में सिर्फ मनुष्यों के बच्चे ही हैं, घर से निकलना सीखने के बाद, जिनका वापिस घर को लौट आना माता-पिता को अच्छा लगता है। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘स्कूल’ इस सत्य के साथ-साथ इस सत्य को भी पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करती है कि व्यक्ति-जीवन में सबसे बड़ी पाठशाला यह संसार है। सिर्फ स्कूल में पढ़े बच्चे को अनपढ़ सिद्ध हो सकते हैं, संसार की पाठशाला में पढ़े नहीं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि समकालीन लघुकथाकारों ने बालकों की दुनिया के शारीरिक और मानसिक प्रत्येक क्षेत्र में साधिकार प्रवेश किया है, उस पर सकारात्मक दृष्टि डाली है। उन्होंने न तो बालकों को दब्बू बनाए रखने की पैरवी की है और न ही अनुशासनहीन व उच्छृंखल बना डालने की। समकालीन लघुकथा में बालकों की दुनिया अपनी सम्पूर्णता के मौजूद है और नि:सन्देह आगे भी रहेगी।
-0-सम्पर्क:एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32 (मोबाइल:09968094431: ई-मेल:2611ableram@gmail.com )
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लघुकथा के आईने में बालमन
भगीरथ
जीवनयात्रा में व्यक्ति सुख की साँस लेने के लिए बार – बार बचपन की ओर लौटता है। बचपन के अनमोल रतन ,जैसे -वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी , कंकड़ पत्थर , घरौंदे छिपने – छिपाने के खेल, पानी में किलोल करते क्षणों को कौन याद नहीं करता ! उर्मिकृष्ण की कथा ‘अमानत’ में मकान बदलते समय बच्ची अपने कंकड़ पत्थर समेटने लगती है तो मम्मी झल्लाकर पत्थर फेंक देती है गुडि़या फूट – फूटकर रो पड़ती है । हम बच्चों के भाव -जगत के प्रति संवेदनशील क्यों नहीं है?
क्रीड़ा बचपन की स्वाभाविक वृति है बालमन क्रीडा में रमा रहता है। क्रीड़ा में वह तन्मय हो जाता है ।बचपन से खेल को हटा दो तो बचपन समाप्त हो जाता है। अशोक भाटिया की कथा ‘सपना’ में बालक के जीवन में पढ़ाई ही पढ़ाई है , लेकिन खेल नहीं । खेल तो सपना है ;जो यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के बाद शायद पूरा हो ।
बच्चों के भावजगत में प्रेम प्रमुखता से है , बच्चे प्रेम की भाषा समझते है , कमलेश भट्ट कमल की लघुकथा ‘प्यास’ में मालिक के बच्चे , नौकरानी बालिका गुड्डी के साथ मैत्री भाव से ही जुड़े हैं ;जिसे उसकी मम्मी नहीं समझ पाती । घरौदें के लड़के – लड़की प्रेम डोर से ही बँधे हैं । उनके भाव-जगत में वस्तुएँ भी सजीव हो उठती है। बच्चा और गैंद (विष्णु नागर) में बच्चा ही गेंद से नहीं खेलता , बल्कि गेंद भी बच्चे से खेलने लगती है , बच्चों का लगाव सहज ही व्यक्तियों व वस्तुओं से हो जाता है।
बच्चे अति संवेदनशील होते हैं , दूसरों के दर्द को हृदय तक महसूस करते हैं। च्वीपूड़’ की ‘आँखें’ ऐसी ही एक कथा है जिसकी एक पात्र कहती है कि अगर उसके पास जादुई कूँची होती और उसका सिर्फ़ एक बार ही इस्तेमाल कर सकती तो वह बहुत सी आँखो के सजीव चित्र बनाकर उन सजीव आँखों को मॉं –बाप के दृष्टिहीन सहकर्मियों को भेंट करती ,ताकि उनकी अंधी दुनिया रोशन हो जाए।
‘कैथरीन के लिए’ (रैना एल्स बर्ग) लाई गुडि़या पर हाथ फेरते हुए वह कहती है– इसके बाल मेरी तरह घुँघराले हैं , नाक मुँह भी मेरी तरह है, फिर उसके हाथ गुडि़या की आँखो पर पहुँच जाते हैं ‘भगवान इसे मेरी तरह ‘अधी मत बनाना’ कह कर अँधेरी दुनिया के सच को पाठक तक संवेदित कर देती है।
अक्सर परिवार में माता –पिता के बीच झगड़े होते है। और उनका दंश बच्चों को भुगतना पड़ता है । वे चाहते हैं कि उनके माता –पिता शांति और प्रेम से रहे । उनके झगड़े निपटाने के लिए बच्चे कुछ भी करने को तैयार होते हैं । चाहे इन्हें नदी के पाट पर ‘पत्थर के फूल’(ली छयाओया) ही क्यों न ढूँढने पड़े । अक्सर माँ कहती है कि जब पत्थरों के फूल निकल आएँगे। तब उन दोनों के बीच का झगड़ा समाप्त हो जायगा । इनोसेंट बच्ची क्या जाने कि पत्थरों में फूल नहीं खिलते , लेकिन वह अपने माता –पिता के लिए असंभव को भी संभव कर लेना चाहती है।
बच्चें की संवेदनशीलता मॉं मैं भी ‘मातृत्व’ (अनूप कुमार) जगा देती है। स्कूल के मित्र अपना टिफिन शेयर करते ही हैं लेकिन रोहित की माँ को यह ठीक नहीं लगा ‘मैं इतनी मेहनत करके नाश्ता बनाकर देती हूँ और तू इस आकाश को खिला देता है। रोहित करुणासिक्त स्वर में कहता है ‘इसके मम्मी नहीं है न , उसके घर में खाना नौकर बनाता है ,पर इसका मन मम्मी के हाथ का खाना खाने का होता है।” रोहित के कथन से माँ का ममत्व जाग जाता है , माँ तो थी वह पहले भी, लेकिन मातृत्व उसे आज मिला।
बच्चा अपने ‘जन्मदिन का तोहफे’ (रामकुमार घोटड़) में अपने पिता से सिर्फ़ इतना चाहता है कि आज की रात उसे व माँ को नहीं पीटें। बच्चे की बात सुन पिता का पुत्र के प्रति प्रेम उमड़ आता है और वह बच्चे को गले से लगा लेता है , बच्चे के सहज सम्बोधन में प्रेम की कहीं आहट है ;जो पिता के हृदय को छू लेती है।
समुद्र के किनारे लड़का बार – बार रेत का ‘घरौंदा’ (राजेन्द्र कुमार कनौजिया) बनाता है और घरौंदे पर अपना नाम लिखता है, साथ खेल रही लड़की से पूछता है – क्यों अच्छा बना है न मेरा घर । लड़की प्रत्युत्तर में घरौंदा तोड़ देती है । बार – बार ऐसा करने पर वह पूछता है -“क्यों तोड़ती है मेरा घर? “लड़की ने निर्दोष भाव से उसे देखा , उसकी आँखों में आँसू भर आए । ‘तू इस पर मेरा नाम भी क्यों नहीं लिखता । लड़की के प्रेम संवेदन आपके मन को छू जायेंगे ।
हरिमोहन शर्मा की सिद्धार्थ ’ कथा में बालक घायल पिल्ले को गोद में लेकर पानी पिलाने का प्रयास करता है। बच्चे का स्पर्श पाकर और गले में दो बूँद पानी उतरते ही पिल्ले ने आँखे खोल ली। अब शायद वह मरेगा भी नहीं ।पशु पक्षियों और पेड़ पौधों से भी बच्चों का स्वाभाविक लगाव रहता है । उनके भाव जगत में वयस्क शायद ही पहुँच पाएँ , लेकिन वयस्क होने की प्रक्रिया में उनका भाव जगत कहीं खो जाता है।
बच्चे बचपन में ही वयस्क होने लगते हैं जब उन्हें गरीबी के कारण कमाई करनी पड़ती है। उनका बचपन खो जाता है लेकिन एक आत्मविश्वास भी उनके चेहरे पर झलकने लगता है । सुकेश साहनी की ‘स्कूल’ का ट्रेन में चने बेचने गया बालक तीन दिन बाद लौटा तो उसमें आत्मविश्वास की चमक देखकर माँ हैरान रह गई , कि इन तीन दिनों में उसका बेटा इतना बड़ा कैसे हो गया ? वह रात – दिन उसकी चिंता करती थी। लेकिन अब बेटा उसकी चिंता करता है माँ तुम्हें इतनी रात गये यहॉं नहीं आना चाहिए था ।
बाल श्रमिक (वेटर) एक रुपये की ‘टिप’ (नीता सिंह) पाते ही बिस्कुट खरीद कर खाने लगता है , जो वह लोगों को खाते देख, ललचाई नजरो से देखता था , गरीबी बच्चों का बचपन ही नहीं छीनती , उनकी छोटी – छोटी खुशियाँ भी छीन लेती है।
‘बारात’(रमेश गौतम) में पेट्रोमैक्स का बोझ उठाए दस वर्ष के बालक को बाराती जोर से चाँटा मार देता है – साले सबसे पीछे चल रहा है , मरियल कुत्ते की तरह , देखता नहीं हम यहॉं डांस कर रहे हैंं बालश्रमिक को पग –पग पर अपमानित किया जाता है।
बँधुआ मजूदरी व बालश्रम विरोधी कानून होने के बावजूद कुछ हलकों में यह बदस्तूर कायम है । दस वर्ष के नेतराम को अपने बाप की चिता में अग्नि देने से पूर्व ही उसे उसके बाप का जूता पहनने को कहा जाता है । यानि कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी हलवाही करनी पड़ेगी और तब तक करना पड़ेगा जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते , बँधुआ मजदूरों के बच्चों का बचपन तो काम करते–करते ही होम हो जाता है । (अंतहीन सिलसिला –विक्रम सोनी)
अधिकतर बाल श्रमिक चाय की दुकानों , ढाबों, रिपेयर की दुकानों , छोटे – छोटे उद्योगों में काम करते है। इनके काम के घंटे निश्चित नहीं होते, पैसे भी पूरे नहीं मिलते, जब चाहे काम से भगा दिया जाता है। उनके पास बचपन नहीं, बचपन के ‘सपने’(देवांशु वत्स) होते हैं ईंट- भट्टे पर काम करने वाला बालश्रमिक सपने में बादल , कलरव करते हुए पक्षी , रंगबिरंगे फूलों के इर्द – गिर्द इतराती तितलियाँ , क्रिकेट और करीब से गुजरती रेलगाड़ी को प्रसन्नता से देखता है लेकिन उसका सौन्दर्य- बोध तब आहत होता है जब उसके पिता उसे काम करने के लिए पुकारते हैं।
रामेश्वर काम्बोज की कथा ‘सपने और सपने ‘में बच्चे अपनी अधूरी आकांक्षाओं को पूरा होते देखते हैं रिक्शेवाले का बच्चा कहता है – सपने में मैने खूब डटकर खाया , लेकिन मुझे अभी तक भूख लगी है।
भीख माँगने वाले बालक को लेखिका चित्रा मुद्गल ‘नसीहत’ देती है कि काम करके कमाओ लेकिन बच्चा जब उससे ही काम माँगता है तो पहले तो राजी हो जाती है लेकिन उसके अतीत को जानकर वह टाल जाती है कि कैसे भरोसा करे। लेखिका ने उसे पांच रूपये देकर नसीहत दी कि बूट –पालिश करना
‘’भीख दो दस पैसा’ सीख क्यों देता है , तुम खुदीच हमारा विश्वास नई कर सकता , रखो अपना पैसा -वह मेरी नसीहत का खोखलापन जब मुझपर ही पटककर सर्र के भीड़ में गायब हो गया। ऐसे बच्चों को अच्छा बनने के लिए कोई अवसर ही नहीं है
भूख और गरीबी बच्चों को भीख माँगने पर विवश कर देती है। ‘रोटी’ (दीपक घोष) मिलने पर वह उसे खा नहीं पाता क्योंकि अगर खा लेगा तो खतम हो जायेगी । भूख के भय से ग्रसित बालक रोटी होते हुए भी उसके खाने का आनन्द नहीं उठा सकता ।
गरीब माँ बच्चे के दौड़ने –कूदने पर एतराज करती है ,तो उसकी सहेली कहती है ‘अरी बहन, बच्चा है दौड़ने कूदने से ‘भूख’ (पारस दासोत) अच्छी लगती है । चिंतित मॉं बोली- दौड़ने कूदने से भूख अच्छी नहीं ,अधिक लगती है
ट्रेन में गाना गाकर भीख माँगने वाले से यात्री ने कहा – मॉं को भीख माँगकर खिलाते हो ?
‘मॉं को उसका बेटा कमाकर नहीं खिलाएगा तो फिर कौन खिलाएगा ? बालक का उत्तर सुनकर लेखक हीरालाल नागर अपने आपको ‘बौना’ समझने लगता है ।
गरीबी बच्चों की छोटी – छोटी इच्छाओं को भी पूरा नहीं होने होती , बच्चों में परिवार की आर्थिक स्थितियों को समझने का सहज बोध होता है , फिर भी बच्चों की इच्छाएँ अपनी जगह है ही ‘बीमार’(सुभाष नीरव) कथा की बच्ची ‘ए’ फोर एप्पल पढ़ रही है , पिता बीमार माँ के लिए एक सेब लाए है। बच्ची अपने पापा से कहती है ‘पापा सेब बीमार लोग खाते है , फिर तुंरत ही कह उठती है -‘मैं कब बीमार होऊँगी पापा’ ,यानी सेब खाने के लिए उसे बीमार होने की चाह है।
बच्चे सरल होते है वे भेदभाव , ऊँच –नीच , गरीब – अमीर नहीं जानते । वे जल्दी ही मित्र बना लेते है। धीरे –धीरे उनकी मित्रता गहरी हो जाती है अभिमन्यु अनत की कथा ‘पाठ’ का पात्र हैनरी स्कूल से आते ही माँ से बोला – मम्मी , कल मैंने एक दोस्त को खाने पर बुलाया है ,।मॉं उसे प्रोत्साहित करते हुए कहती है कि वह बहुत सोशल होता जा रहा है । लेकिन मॉं अचानक ही पूछ लेती है -क्या रंग है उस विलियम का । ‘हमारी तरह गोरा या काला ’ हेनरी निराश हो पूछता है ‘रंग का प्रश्न जरूरी है क्या मॉं?
हाँ हेनरी तभी तो पूछ रही हूँ कह कर उसकी माँ उसमें रंगभेद का नस्ली बीज बोने की कोशिश करती है।
सूर्यकांत नागर की लघुकथा ‘विषबीज’ में पिता बच्चे से कहते हैं कि इस दुकान का पानी नहीं पीते क्योंकि यह मुसलमान की दुकान है , हिन्दू – मुस्लिम में भेदभाव का बीज पिता रोप ही देता है।
रोटी का टुकड़ा (भूपिंदर सिंह)’ का बच्चा भोलेपन से कहता है ‘माँ उनके घर का एक टुकड़ा खाकर क्या मैं जमादार हो गया ?
‘और नहीं तो क्या’ माँ ने तपाक से उत्तर दिया। बच्चे के प्रतिप्रश्न ने माँ को निरुत्तर कर दिया। काकू जमादार हमारे घर कई सालों से रोटी खा रहा है तो वह क्यों नहीं बामन हो गया। अछूत और अस्पृश्यता के संस्कार देने की कोशिश व्यर्थ हो जाती है क्योंकि बालक ज्यादा विवेकपूर्ण है।
‘गुरुदक्षिणा (रंगनाथ दिवाकर) के शिक्षक जाति भेद व दलित के प्रति घृणा- भाव से भरे है ।वे हरिजन बच्चों को ही दंडित करते हैं ताकि मिडिल पास न कर सके । इस तरह का भेदभाव बच्चों में घृणा व हिंसा के बीज बो देता है।
‘खेलने दो (कमल चौपड़ा) में सवर्ण बच्चे दलित बच्चे को नीच -सूअर सम्बोधन कर उसका मखौल उडाकर अपने पारावारिक संस्कारों को ही प्रदर्शित करते है।
रामकुमार आत्रेय की ‘समझ’ में भी पिता जाति भेद के बीज बो रहे हैं बेटे बड़े होकर अफसर बनना चाहते हो कि स्वीपर ? ‘अफसर बनूँगा’तो फिर स्वीपर के बेटे के साथ खेलना छोड़?
बच्चों के ,खेल मे वयस्कों की दुनिया परिलक्षित होती है , क्योंकि वे सीखते तो अनुकरण से ही है। बलराम अग्रवाल की कथा ‘जहर की जड़े’ परिवार/समाज में ही फैली है बेटी डोली सुबकते हुए कहती है ‘डैडी हमें स्कूटर चाहिए । पिंकी ने पहले तो अपने गुड्डे के साथ हमारी गुडि़या की शादी करके हमसे गुडि़या छीन ली , और अब कहती है दहेज में स्कूटर दो वरना आग लगा दूँगी गूडि़या को।
‘माँ मैं गूडि़या नहीं लूँगी(डॉ. तारानिगम) क्योंकि यह वही करेगी जो मैं करूँगी। , सुलाऊँगी तो सो जाएगी , कपड़े पहनाऊँगी तो पहन लेगी । , डाँटूँगी , मारूँगी तो चुपचाप सह लेगी । ये कोई विरोध नहीं करेगी। माँ मैं ऐसी गुडि़या नहीं लूँगी ; क्योंकि उसे ऐसी गुडि़या नहीं बनना है।
घर –घर खेल रहे थे बच्चे । कपड़े धोए खाना बनाया , अरे भात तो खत्म हो गया इतने सारे लोग आ गए चलो तुम लोग खाओ में बाद में खा लूँगी। तू माँ (प्रबोध कुमार गोविल ) बनी है क्या । घर में माँ सबसे बाद में खाती है। वही बच्चे खेल में भी करते है। ।
बालक का स्कूल से रिश्ता
मै स्कूल जाऊँगा , रिक्शा में बैठके ’ कहने वाला बंटी स्कूल में जाने से बचने के लिए अँघेरी कोठरी में छुप जाता है , ऐसी जगह जहॉं उसे जाने से भी डर लगता है ‘स्कूल’(श्याम सुन्दर अग्रवाल) क्या कीमिया करता है कि स्कूल उसे डरावनी कोठरी से भी ज्यादा डरावना लगने लगता था।
माता पिता भी स्कूल (सुरेश अवस्थी )को शैतान बच्चो को ठीक करने की जगह समझते है । तभी तो जब बालक शैतानी करता है उसे स्कूल में भरती कराने की धमकी दी जाती है। उसका नन्हा मन सोचता है कि स्कूल वह स्थान है जहॉं हर शैतानी की सजा मिलती है जब उसे स्कूल में प्रवेश दिलवाया जाता है तब वह बच्चों को उठक – बैठक करते देख सहम जाता है और चुपके से भाग जाता है।
‘शिक्षा’ (भगीरथ ) कथा में छात्रों के साथ कठोर व्यवहार चिह्नित करती है शिक्षक के व्यंग्य बाणों से छात्र आहत है। छात्र को स्कूल जहन्नुम- सा लगता है जहॉं उसे पल – पल अपमानित या दंडित किया जाता है। ऐसी स्थिति में एक छात्र स्कूल से भागने की सोचना है , तो दूसरा शिक्षक की अकड़ सीधी करने की बात कहता है। तीसरा , जरा ज्यादा संजीदगी से सोचता है – जहॉं इतनी जलालत हो वहॉं क्या भविष्य बनेगा ? पाँचवा प्रतिक्रियाहीन छात्र कुंठित और ठस्स हो जाता है।
शिक्षा में यह जाना पहचाना सिद्धांत है कि बच्चे खेल – खेल में सीखते है, जिज्ञासा जागृत करने पर भी सीखना आसान है लेकिन हमारे विद्यालयों में ऊँघते अध्यापक शिक्षण- विधि के नये प्रयोग कर रहे है इसकी झाँकी हम ‘हिदायत’ (शैलेन्द्र सागर) में देख सकते है। ‘चल निकाल किताब ,पाठ पढ़’ बालक पाठ पढ़ने लगता है और शिक्षक आँखें बंद किये नींद निकाल रहा है। छात्र पढ़ते –पढ़ते चुप हो जाता है तो शिक्षक ऊँघ से जागते हुए कहता है ‘अरे चुप क्यों हो गया’ बच्चे ने प्रत्युत्तर दिया -सर पाठ समाप्त हो गया।
तो पहाड़ा याद करा । शिक्षक ने कहा । पाठशाला (चन्द्रधर शर्मा गुलेरी) में आठ वर्ष का बालक रटे रटाये प्रश्नों के उत्तर देता है तो प्रधानाध्यापक –पिता का सीना चौड़ा हो जाता है । अतिथि ने उसे आर्शिवाद देते हुए पूछा कि तू इनाम क्या लेगा तो उसने धीरे से कहा लड्डू। पिता निराश हो गये लेकिन अतिथि प्रसन्नता हो गए कि बच्चे का बचपन बच गया उसने मेडल न माँगकर लड्डू माँगा। स्कूल व्यवस्था बच्चो में शिक्षक के प्रति सम्मान का भाव तो पैदा नहीं कर पाती बल्कि प्रतिहिंसा का भाव पैदा कर देती है तभी तो शिक्षा कथा का छात्र शिक्षक की अकड़ सीधी करने की सोचता है और यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ की कथा ‘जिज्ञासा’ का बालक मैं भी अपनी काली मेड़म को उछाल दूँगा वह मुझे डाँटती है।
सभी शिक्षाशास्त्री व मनौवैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि बच्चो को दण्ड नहीं देना चाहिए । अब तो दण्ड के विरूद्ध कानून भी बन गया है। फिर भी स्थितियों में कोई खास परिवर्तन नहीं है। बच्चों के साथ घर या स्कूल में ज्यादा मानवीय तरीके से सलूक किया जाना चाहिए ।
हम बच्चों के साथ प्रेम की भाषा नहीं बोलते , भय और लालच की भाषा बोलने लगे हैं जो व्यक्तित्व के विकास में बाधा उत्पन्न करती है । उसकी सुप्त शक्तियों को खिलने का अवसर नहीं देती । भयभीत व्यक्ति (एक्स्ट्रीम केस) आत्महत्या या हत्या कर सकता है । भयभीत बालक घर छोड़कर भाग जाता है, भयभीत प्रेमी युगल एक साथ आत्महत्या कर लेते हैं हम बच्चों के साथ प्रेमपूर्ण क्यों नहीं है ;क्योंकि हमारी आकांक्षाए , हमारा मान –सम्मान हमें अंधा बना देता है।
शिक्षा व्यवस्था के केन्द्र में शिक्षा है , बच्चे नहीं , और जब तक ये प्राथमिकता बदलेगी नहीं , कोई बड़ा परिवर्तन होने वाला नहीं है। हमें समझना होगा कि शिक्षा व्यवस्था बच्चे के लिए है। बच्चा शिक्षा व्यवस्था के लिए नहीं । अत: उसे ही केन्द्र में रखकर सारे निर्णय लिए जाने चाहिए।
इन कथाओं में ऐसे कई प्रश्न उभरते हैं । जिनपर विचार करना बहुत ही जरूरी है। बच्चों को हम सरल सहज , भेदभाव रहित क्यों नहीं रहने देते ? क्यों इनका जीवन खेल से वंचित हो गया है। क्यों नहीं वे अपने शिक्षकों का प्रेम पाते ? क्यों नहीं हम अनुकरणीय आचरण पेश करते ? क्यों नहीं उनके जिज्ञासा पूर्ण प्रश्नों के उत्तर देते ? क्यों नहीं स्कूल आनन्ददायी शिक्षा का स्थान हो जाते ? भय और लालच के सिद्धांत की जगह कोई अन्य प्रेरणादायक अच्छा सिद्धांत क्यों नहीं खोज पाते ? खेल –खेल में हम शिक्षा कब दे पायेंगे? बालश्रमिकों के प्रति हमारा दृष्टिकोण ज्यादा मानवीय व शोषण रहित कब हो पायेगा ? गरीबी के हालात कब बदलेंगे कि बच्चे का बचपन उन्हें मिल सके । हम बच्चों के भाव जगत को कब समझेंगे ? इन्हीं सब प्रश्नों पर विचार करती है ये कथाएँ।
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बाल मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ : बालमन का अवलोकन
-डॉ0 हृदय नारायण उपाध्याय
हिन्दी लघुकथा- साहित्य में सुकेश साहनी एवं रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ का नाम प्रतिष्ठित रचनाकारों में लिया जाता है।लघुकथा को हिन्दी कथा साहित्य की महत्वपूर्ण विधा के रूप में स्थापित करने का श्रेय इन दोनों रचनाकारों को जाता है।लघुकथाकार होने के साथ- साथ लगभग आधे दर्जन लघुकथा संग्रहों का संकलन एवं सम्पादन कर इन साहित्यकारों ने देश एवं देशान्तर के लघुकथा साहित्य से पाठकों को जोड़ने का महनीय प्रयास भी किया है।अन्तरजाल की दुनिया में आज लघुकथा डॉट कॉम एक मात्र ऐसी वेवसाइट है; जिस पर लघुकथा की वर्तमान दशा एवं दिशा पर महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है।यह इन्हीं साहित्यकारों के प्रयासों का प्रतिफल है।
इन्हीं रचनाकारों द्वारा सम्पादित एवं संकलित ‘बालमनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ’ नामक नवीनतम लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुआ है जो बच्चों को केन्द्र में रखकर उनकी मासूम एवं जटिल जिन्दगी की पड़ताल करता है।
बच्चे मार्तापिता के ही नहीं वरन देश के भविष्य हैं अत देश के हर बुद्धिजीवी को इस भविष्य (बच्चे) के विषय में गंभीर चिन्तन एवं मनन करना आवश्यक है।
इसी कारण शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली को बालकेन्द्रित कर उनमें निरन्तर बदलाव लाये जा रहे हैं।मनोवैज्ञानिक एवं शिक्षाशास्त्री इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ताकि बच्चे तनावरहित जीवन जी सकें।
प्रश्न उठता है -बच्चों में तनाव के कारण क्या हैं ? हम इसके लिए किसी एक वर्ग को दोषी नहीं मान सकते।भौतिकता की अन्धी दौड़ अभिभावकों की बढ़ती अपेक्षाएँ पारिवारिक विघटन एवं एकल परिवार व्यवस्था़ छात्रों एवं शिक्षकों में बढ़ती दूरी, फल फूल रहे कोचिंग सेंटर्स एवं कारगर सरकारी नीति का अभाव आदि वे तमाम घटक हैं ;जो बच्चों के सहज जीवन को जटिल एवं तनावग्रस्त बना रहे हैं।अभिभावकों के पास बेकार के काम करने का तो समय है लेकिन अपने बच्चों के साथ बैठने का समय नहीं है।अपनी सन्तानों को नौकरानियों के भरोसे सौंपकर अथवा स्कूलों में दाखिला दिलाकर वे अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होना समझते हैं।ऐसे में बच्चे करें तो क्या करें ?
प्रस्तुत संकलन में बालमन की पवित्रता एवं कोमलता तथा उन पर विभिन्न कारणों एवं कोणों से पड़ने वाली कालिमा एवं खरोचों को रेखांकित करती लघुकथाओं का संचयन किया गया है।लघुकथाओं की विषयवस्तु एवं उनका फलक काफी विस्तृत है।इस संकलन में कुल 79 लघुकथाएँ संकलित हैं जिन्हें दो शीर्षकों में बॉंटा गया है: – 1- देशान्तर 2- देश । देशान्तर के अन्तर्गतकुल 9 लघुकथाएँ हैं जो विदेशी और अप्रवासी भारतीय साहित्यकारों द्वारा लिखी गई हैं।इन लघुकथाओं की कथाभूमि तो विदेशी है लेकिन बालमन का चित्रण सार्वदेशिक एवं सार्वजनीन है।इस दृष्टि से मनस्थति़ पत्थर के फूल़ पाठ एवं असंवाद ममस्पर्शी लघुकथाएँ हैं। देश शीर्षक के अन्तर्गत कुल 70 लघुकथाएँ हैं ;जो भारतीय साहित्यकारों द्वारा लिखी गयी हैं।अध्ययन की सुविधा के लिए इन लघुकथाओं को चार भागों में बॉंटा गया है :
1-बच्चे और शिक्षा
2-बच्चे और परिवार
3-बच्चे और समाज
4-बालमन की गहराइयाँ।
अर्थात् इस संग्रह की सभी लघुकथाओं के केन्द्र में बच्चे ही हैं।
घर एवं पड़ोस के बाद बच्चों का पहला परिचय विद्यालय से होता है।माता- पिता की पहली सोच बच्चे को शिक्षित करने की होती है।जाहिर है विद्यालय,शिक्षा,शिक्षक,अभिभावक एवं छात्र लघुकथाओं के लिए उत्तम विषय हैं।विद्यालय ही वह संस्था है जहॉं बच्चों के भविष्य को सॅंवारने का कार्य होता है लेकिन कहीं-कहीं अनुशासन के नाम पर बच्चों के मन में विद्यालयों के प्रति दहशत भी घर कर जाती है।इस दृष्टि से शिक्षा, सपना ,स्कूल -2 शिक्षाकाल ,कान्वेंट स्कूल एवं आरोपण जैसी लघुकथाएँ पठनीय हैं।सवाल उठता है कि क्या सभी विद्यालय एक ही जैसे हैं ? कुछ एक उदाहरणों के द्वारा हम सभी विद्यालयों के बारे में एक जैसी राय नहीं बना सकते।ज्ञान विज्ञान एवं सूचना के साधन कितने ही विकसित क्यों न हो जाएँ ,विद्यालयों की उपयोगिता हमेशा बनी रहेगी।ऐसी लघुकथाओं का भी संकलन होना चाहिए जिसमें विद्यालयों की सराहनीय भूमिकाओं को दर्शाया गया हो।
बच्चों में तनाव का मुख्य कारण पारिवारिक विघटन एवं पति-पत्नी के सम्बन्धों में आई दूरी भी है।इनका दुष्प्रभाव बच्चों पर सबसे अधिक पड़ता है।इस दृष्टि से अमानत, दुख़ जन्मदिन का तोहफा़, अपने पार, असर आदि लघुकथाएँ पढ़ी जा सकती हैं।धन, सम्मान एवं अहंकार के वशीभूत होकर आज शहरी मध्यवर्गीय दाम्पत्य जीवन ज्यादा सुखी नहीं है।पति-पत्नी के सम्बन्धों में तनाव और टूटन आ रही है जिसका गलत प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है।पति- पत्नी की आपसी लड़ाई उनकी सन्तानों को आघात पहॅंचा रही है।ऐसे दम्पतियों के बच्चे न घर पर खुश हैं और न ही विद्यालयों में। बल्कि वे अन्दर ही अन्दर टूट रहे हैं।
इन सबसे अतिरिक्त गरीबी सबसे बड़ी समस्या है जहॉं बच्चा अभाव की चक्की में पिस रहा है।ऐसे परिवारों के तमाम बच्चे शिक्षा प्राप्ति के बुनियादी हकों से महरूम होकर मजदूरी करने को विवश हैं और असमय ही बचपन की दहलीज को लॉंघ कर सयाने हो जाने को अभिशप्त हैं।बचपन की खुशरंग दुनिया की जगह उनके मन एवं मस्तिष्क में दुनिया का बदरंग क्रिया व्यापार समाता जा रहा है दुख अन्तहीन सिलसिला़ बीमार सपने और सपने स्कूल-1, दीया तले, रोटी, जड़ , सपने-2 भीख आदि लघुकथाओं में गरीबी की इसी त्रासदी का चित्रण है।
छुआछूत एवं साम्प्रदायिक सोच समाज को कमजोर करती है।इस विषय पर जो लघुकथाएँ इस संग्रह में संकलित हैं वे इन समस्याओं के घिनौनेपन को बखूबी उजागर करती हैं।जब माता और पिता ऐसी सोच को खुद बच्चों पर थोपते हैं तो बच्चों की सहज प्रतिक्रिया के समक्ष वे निरूत्तर एवं अपमानित महसूस करते हैं।इस विषय पर संकलित लघुकथाएँ वास्तव में सराहनीय हैं क्योंकि वे बच्चों की स्वस्थ मानसिकता को दर्शाती हैं- पाठ ,विषबीज, विनियोग, जिन्दा बाइस्कोप, समझ, लक्ष्य, मातृत्व, नासमझ आदि लघुकथाएँ इस दृष्टि से उत्तम लघुकथाएँ हैं।
इसके अतिरिक्त दहेज प्रथा़ लिंगीय भेद आदि अन्य सामाजिक समस्याओं पर तल्ख टिप्पणी करती लघुकथाएँ भी हैं सबको एक साथ समेटना बड़ा ही दुष्कर कार्य है।इस संग्रह की लघुकथाएँ भाव, विचार एवं शिल्प की दृष्टि से उत्तम हैं।भाषा सहज एवं सर्वग्राह्य है।जिस विषय को केन्द्र में रखकर ये लघुकथाएँ संकलित की गईं हैं वह विषय आज का प्रासंगिक विषय है।सम्पादक द्वय इस मराहनीय कार्य के लिए साधुवाद के पात्र हैं।सुन्दर प्रकाशन एवं आकर्षक कवर डिजाइन के लिए किताबघर को भी धन्यवाद।
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