जून 2026

देशबाहर–भीतर     Posted: July 1, 2023

विद्यार्थी मंदिर जा रहा था। उसके भीतर बैठा विद्यार्थी उसके साथ हो लिया, पूछा, ‘‘कहाँ जा रहे हो?’’

‘‘तुम जानते ही हो, मैं पिछले वर्ष परीक्षा में नकल करता पकड़ा गया था और फेल हो गया था।’’

‘‘इस बार परिश्रम, करो, पास हो जाओगे।’’

‘‘नहीं ?, इस बार मैं मंदिर में प्रसाद चढ़ाऊँगा ताकि इस वर्ष नकल का केस न बने।’’

मंदिर जाते दुकानदार ने मन में कहा, ‘‘मैं भगवान् से अरदास करूँगा कि मिलावट के अपराध में चल रहे मुकदमे में मेरी जीत हो।’’

उसके भीतर का आदमी बाहर आ गया, कहा, ‘‘अच्छा हो तुम भविष्य में मिलावट न करने का प्रण करो।’’

‘‘नहीं, इसकी जरूरत नहीं है। भगवान् बड़े दयालु हैं…।’’

मंदिर की ओर कदम बढ़ाता कर्मचारी सोच रहा था, ‘‘भले ही पुलिस ने मुझे रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ लिया है, मैं भगवान् से बाइज्जत बरी होने के लिए विनती करूँगा।’’ उसकी बात सुनकर भीतर के इंसान का दम घुटने लगा। बाहर आकर कहा, ‘‘तुम अपना अपराध स्वीकार क्यों नहीं कर लेते?’’

‘‘तुम बहुत भोले हो। भगवान् पतित पावन हैं। जरूरत पड़ने पर वह अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।’’

वे तीनों मंदिर जा रहे थे।

‘वे तीनों’ भी जो उनसे अभी–अभी जुदा हुए थे, छाया की तरह उनके पीछे चल पड़े।

वे तीनों मंदिर में चले गए।

‘वे तीनों’ मंदिर के बाहर खड़े रहे।

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