अनुवाद : डॉ. कविता भट्ट
‘ हे ब्वे! यु सवाल समज माँ नि औणूं, जरा समजै द्यावा! घौरौ तैं काम मिल्यु च! ‘
आठ बरसा का अंकित न रीमा माँ बोली।
सोफा म बैठिं रीमा अपडि दगड्या कविता कि गैलि चैट छै कन्नि। ब्याळि कि किटी पार्टी क बारा माँ चर्चा होणी छै। साडी, गौंणा- तगाता, पकवान, कैन क्य बोलि अर हौर धाणी बि। स्मैलि अर तरौं तरौं का मुक्कु कि लेणा देणि होणी छै।
” हूँ! अब्बि उठदु छौं। “
एक बग्त तुम फीर सि कोसिस करा। “
अंकित थोडि देर वीं का दगडि बैठ्यू रै। काँफि परैं सवाल हल कन्नै कि कोसिस करी अर तब कमप्यूटर पर विडियो गेम खेन्न माँ लगी गे।
रीमा कु चैट उन्नि चन्नू रै। लगभग आधा घण्टा बाद वा उठि त अंकित तैं कमप्यूटर परैं खेल्दु देखी तैं चिल्लाण लगि गे, ” जब द्याखा तब विडियो गेम्स ! कुजाणी अचक्याल का छवारा कब सुधल्ला ? “
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