गढ़वाली अनुवाद : डॉ. कविता भट्ट
गरम-गरम गुजिया एक सुंदर प्लेट म सजै क मेज़ माँ धारीं छैं । वा अपड़ा मुबैल न अलग – अलग एंगल बिटिक वीं गुजियन सजीं प्लेट कि फ़ोटू खैंचणी छै , पर वीं का मनौ कु फ़ोटू नि छौ आणु। वा भौत जल्दी म छै लगणी अर याँ इ लै खिझेणी छै। मेज़ क दूसरा कोणा पर वीं कु लैपटॉप रख्यूँ छौ, जै माँ वा बीच-बीच म झळ – झळ देखिक क आणि छै अर वीं की बेचैनी हौर बि बढणी छै। माना वा कै ”दौड़” म भाग लेणि हो। इतगा म वीं कु नौनु चिंटू, खेलिक आई अर इतगा अच्छी गुजिया देखिक वे सि रये नी गे अर ”अहा! गुजिया! माँ ! भौत ज़ोर कि भूख लगीं च!” बोलिक प्लेट पर हथ मारि।
”चटाक् ”… की आवाज़ आई अर एक हौर आवाज़ गूँजी…
”द्वी मिनटौ कु सब्र नि च ! क्वी मैनर्स नौं की चीज़ छ कि नि सीखी? भुक्क्ड़ की तरौं झपटणू छैं बस!”
फिर सन्नाटू ह्वेगे। चिंटू प्लेट तक पौंछि बि नी सकि। वे थैं अपडु क़सूर भी न समझ नि आई। बस अपडु गलोडु मलासिक, डरिक रुकि गे।
वा बड़बड़ करिक दुबरा गुजिया कि प्लेट की फ़ोटो लेण लगी गे।
इतगा म एक झिज्कीं सि धै आई,”ब्वारी! अगर तुम खाली छाँ त गुजिया लेकि आन, भगवान जि थैं भोग लगै द्योला?”
“आणू छौं!… सब्बु थैं अपड़ी इ पोड़ी च! हुँह !”
बोलि क वा लैपटॉप पर बैठिक कुछ कन्न लगी गे। थोड़ी देर म वीं ”गुजिया की प्लेट” की फ़ोटू फ़ेसबुक म लगीं छै , अर वाँकु शीर्षक छौ- ‘बिसेस आप सब्बु का वास्ता!’
वाँ पर भौत सारा ‘लाइक्स’ अर ”वाह! वाह! गृहिणी ह्वा त आप जनि !” – कमेंट्स आण लगी गे छा अर वा अफ्फु पर गर्व करिक खुस हूणी छै!
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