अशोक जी फाइलें समेट।कर कार्यालय से घर के लिए निकले ही थे कि शहर के प्रमुख कान्ट्रक्टरो में से एक खुराना साहब मिल गए- “अरे अशोकजी आप तो साकेत मे रहते है ना ! मै भी उधर ही जा रहा था, चलिए आप को भी ड्राप कर दूँ।” इच्छा न होते हुये भी अशोकजी उनके साथ चल पड़े।
खुरानाजी की कार साकेत की ओर दौड़ पड़ी, आपसी वार्तालाप कुशलक्षेम से होता हुआ उस ‘टेन्डर’ तक पहुँच गया ,जो आजकल अशोकजी की फाइलो में बन्द था।
खुरानाजी कुछ मुस्कराकर बोले- “अशोकजी ये समाज एक दूसरे के सहयोग से ही चलता है, अब आप हमारे काम आएँगे तो हम तो आप के काम आएँ ही।” अशोकजी खामोश रहे ।वे खुरानाजी की उनको ‘लिफ्ट’ देने की कृपा को पूरी तरह समझ गये थे।
घर के पास पहुँचने पर उन्होने खुरानाजी को कार रोकने का इशारा किया। कार एक ओर रोकने के बाद खुरानाजी अशोकजी के साधारण और पुराने घर की ओर नज़र मारते हुए अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ बोले- “बड़े बाबू ,आपके मकान की बुनियाद तो बहुत ही कमजोर है, हमारा साथ दो ,तो घर का कायाकल्प कर देंगे।।”
अशोक जी कार से नीचे उतरे और मुस्करा पड़े- “खुराना साहब, घर छोड़ने के लिए धन्यवाद ! एक बात मै आपको कहना चाहूँगा -इस घर की बुनियाद कमजोर हो सकती है ; लेकिन इस घर में रहने वालो की बुनियाद बहुत मजबूत है, उसे हिलाने की कोशिश करना व्यर्थ है।”
अपनी बात पूरी करते हुए अशोक जी घर की ओर मुड़ चुके थे।
-0-