“है …लो…”
गले से जो निकला, वह शब्द, महज़ फुसफुसाहट में बदलकर उनके कानों से जा टकराया। घबराकर उन्होंने गले पर दायाँ हाथ रखा और आईने में झाँककर अपनी बूढ़ी आँखों से अपने
चेहरे को निहारा।
“है…लो…”
दुबारा ज़रा ज़ोर से बोला पर आवाज़ मिमियाहट के रूप में निकली। उनकी आँखें छलक आईं। इस घर में दोपहर तक वे अकेले ही होते हैं।
उस घर में बतियाने का मानों ठेका ले रखा था उसने। उसके पास हर विषय पर कहने को बहुत कुछ होता था। कितना बोलती थी वह। पास-पड़ोस से लेकर, गाँव, शहर, संसार की। वे तो बस सुन लेते थे और मुस्कुराते रहते थे। दिन भर कॉलेज के लेक्चर ही काफ़ी थे उनके खाते में। तब उनको, उसका आसपास होना ही सुहाता था। उसके जाने के बाद इकलौता बेटा अपने साथ लिवा लाया। कोई कमी नहीं है। पूरा खयाल रखते हैं दोनों मतलब, बेटा-बहू।
घर में 6 बजे से ही खटर-पटर, रसोई से बर्तनों की आवाज़, बाथरूम से गिरते पानी की आवाज़, कुछ पीने, कुछ खाने की आवाज़ें, कुछ फुसफुसाहटें। इन आवाज़ों के बीच अक्सर ठंडी हो गई चाय को एक घूँट में सुड़क लेते हैं वे।
मुश्किल से डेढ़ साल हुआ है इस शहर में आए हुए उन्हें। घर में उन्हें मिलाकर कुल चार प्राणी। बेटा-बहू कामकाजी, सुबह के गए रात ही लौट पाते हैं। पोता स्कूल से आकर, कभी ट्यूशन कभी हॉबी क्लास, कभी पढ़ाई। उन्हें याद नहीं, इन सबके बीच उनकी पोते से कब बात हुई। समय ही कहाँ है बेचारे के पास। उनकी ख़ामोश मुस्कान और पोते की थकी-सी मुस्कान बस इतना-सा ही रिश्ता है।
एक बार सुबह पार्क में घूमते हुए माली से बतियाने लगे। बेटे ने बालकनी से देखा। लौटने पर धीमे से इतना ही बोला-अपने स्टेटस का ध्यान रखिए। इस तरह सबसे बोलना अच्छा नहीं है।
तीसरी बार कोशिश की-
“है …लो…”
इस बार आवाज़ थोड़ी ऊँची निकली।
इस सोसायटी में ज़ोर से नहीं बोलते हैं। यह नहीं करते हैं, वह नहीं करते हैं। कॉन्क्रीट की सोसायटी न हुई, बंदिशों का छत्ता हो मानों।
गाँव का घर, नीम का पेड़, चौपाल की बहसें, रामशरण की गैया का रँभाना, पड़ोस के बच्चों की चें-चें पें पें… बचपन के यार और उनके बुढौती के उलाहने…
“उफ्फ …” कितना याद आते हैं।
सारी ज़िन्दगी रिटायरमेंट के बाद गाँव में रहकर यह करेंगे, वह करेंगे में निकल गई। घर के पास की ज़मीन में एक बगीचा बनाएँगे, जहाँ पेड़ों पर पंछी चहचहाएँगे। जब रिटायर हुए, तो पहले वह चली गई अपने साथ ज़िन्दगी की सारी खुशियाँ और प्लांनिग लेकर। अब वे ज़िंदा तो हैं, पर किसी …अक्सर इस मोड़ पर वे निःशब्द हो जाते हैं।
आवाज़ पूरी तरह गुम हो जाए, उससे पहले ही वापसी की डगर पकड़ लेनी चाहिए। वहीं जहाँ आवाज़ों पर कोई बंदिश नहीं है। …
“हैलो …”
इस बार आवाज़ साफ़ और बुलंद थी।
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