रणजीत कोमल/ बोहनी
गर्मी पूरे जोरों पर थी। गांव को जाती सड़क पर सिफर् उसी की साइकलों की मुरम्मत की दुकान थी। परछाईयां ढलने पर थी, पर उसने अभी बोहनी ही नहीं की थी। ऊबासियां लेता वह ग्राहक का इंतजार कर रहा था। कभी वह बक्से में पड़े सामान की तरफ देखता और कभी सड़क की तरफ। उसे ग्राहक के आने की कोई आशा नजर नहीं थी आ रही। उसे बार–बार बच्चे का ध्यान आ रहा था, जिन्हें दिहड़ी कमा कर ही रात को खिलाना था।
अचानक ही एक बुजुर्ग रिक्शेवाला फूली सांस उसके पास आया।
‘‘इसे देखना यार! इसकी बस चलते ही हवा निकल गई है…।’’ बुजुर्ग ने पसीना पोंछने पिछले टायर की तरफ इशारा करते कहा।
टायर खोलने में दुकानदार ने एक मिनट भी न लगाया। उसने टियूब चैक करनी शुरू की। एक साथ तीन पंचर देखकर दुकानदार के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई।
तीन पंचर देखकर बुजुर्ग का चेहरा मुरझा गया, आज तो बोहनी ही नहीं की कैसे चलेगा।
अनुवाद:डॉ.श्यामसुंदर दीप्ति
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