मिर्ज़ा हफ़ीज़
बिट्टू ने ऑटो निकाला और सड़क पर आकर सवारी का इंतेज़ार करने लगा । आज ढंग की बोहनी हो जाये ; वह मन ही मन भगवान से मनाने लगा । किसी अच्छी माल से बोहनी हो जाये तो आज का दिन टनाटन गुज़रे –वह सोंचने लगा ।
“यह नहीं , यह नहीं … बूढ़ा है , किच किच करेगा , बोहनी बिगाड़ देगा” एक बूढ़े को सड़क की दूसरी ओर से आते देख वह बड़बड़ाया और अपने ऑटो को पीछे रिवर्स मे डालकर पीछे लेगया । धीरे धीरे वह बूढ़ा सड़क पार कर अपनी राह चला गया । तभी उसी तरफ़ से दो लड़कियां आती दिखाई दीं । तुरंत ऑटो को आगे लेजाकर बोला- “बैठिये मेडम … कहां जाना है …?” लेकिन वे कतराकर आगे निकल गईं ।
“धत् … बोहनी ही खराब हो गई ।“ कहकर उसने ज़मीन पर थूक दिया ।
इंजन बंद कर वह सवारी का इंतेज़ार करने लगा ।
“चल पावरहाऊस चौक चल ।“ सुनकर वह चौंका । पलटकर देखा , ट्राफ़िक पुलिस का सिपाही उसके ऑटो मे आ बैठा था ।
‘होगई बोहनी …’ उसने कड़वा सा मुँह बनाया ।
“चल जल्दी कर ड्यूटी के लिये देर होरही है ।“ सिपाही ने कहा ।
“बोहनी नहीं हुई है साहब ।“ बिट्टू बोला ।
“कोई बात नहीं रास्ते मे सवारी बैठा लेना । बोहनी हो जाएगी ।“
“नहीं साहब ! बोहनी करना पड़ेगा ।“
“अबे चल । नखरे मत दिखा ।“
मजबूरी मे उसे जाना पड़ा । इस धन्धे मे ट्राफ़िक वालों को नाराज़ नहीं कर सकते । पानी मे रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं लिया जा सकता ।
चौक पर पहुँचकर सिपाही ने ऑटो रुकवा दिया । ‘चलो अभी कोई नहीं पहुँचा है । मै टाइम पर पहुँच गया ।‘ सोंचते हुये उसने चैन की साँस ली ।
“साहब बोहनी …” बिट्टू ने टोका ।
“अबे मेरी बोहनी तो नहीं हुई है ।“
“मै नहीं जानता साहब ! बोहनी तो करना पड़ेगी ।“ बिट्टू अड़ गया ।
“पेपर दिखा …” सिपाही ने नहले पे दहला मारा ।
“क्या बोल रहे साहब ? मै तो आपको लेकर आया हूँ …”
“चल चल टाइम खराब मत कर , पेपर निकाल । आर सी , लाइसेन्स , इन्श्योरेन्स । चल जल्दी कर । और तेरे ऑटो को किनारे लगा ।“
“अरे नहीं देना तो मत दो न साहब … “
“किनारे … किनारे लगा । चल टाइम खराब मत कर “
“अच्छा रहने दो साहब । मत दो । जाने दो ।“
“अबे कैसे जाने दूं … ? मेरी बोहनी कर ।“ सिपाही बोला ।
“जाने दो न साहब । गल्ती हो गई , माफ़ कर दो ।“ अब बिट्टू रक्षात्मक रणनीति अपना ली ।
“अच्छा चल दो सौ रुपये निकाल ।“ सिपाही मुद्दे पे आगया ।
“बोहनी नहीं हुई है साहब । कहाँ से दूँ ।“ बिट्टू गिड़गिड़ाया ।
“चल सौ रुपये निकाल । जल्दी कर और लोग आगये तो बुरा फँसेगा ।“
“कहाँ से दूँ साहब । … नहीं है ।“
“जेब दिखा … “
“बीस रुपये रखा था … चाय पानी के लिए ।“
“ला दे । देख सौ में से अस्सी बचे ? तेरा भाड़ा अस्सी रुपये देरहा हूँ । तू भी क्या याद रखेगा किसी दिलदार से पाला पड़ा था ।“ सिपाही ने समझाते हुए कहा “देख तेरी भी बोहनी हो गई मेरी भी बोहनी हो गई । जा ऐश कर ।“
दोनो की बोहनी हो गई ।
दोनो अपने अपने काम पर लग गए ।
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