कृष्णानंद कृष्ण
आज लघुकथा साहित्य में जिस स्थान पर पहुँच चुकी है, उस पर निश्चित रूप से गर्व किया जा सकता है। लगभग एक सौ पचास वर्ष की संघर्षपूर्ण यात्र के दौरान लघुकथा ने अनेक-अनेक उतार-चढ़ाव देखे और समय-समय पर अपने रूप-स्वरूप में स्वाभाविक रूप से परिवर्तन भी किये । इस दौरान इस विधा के विकास में अनेक लेखकों ने अपना-अपना सृजनात्मक योगदान दिया । सृजनात्मक स्तर पर लघुकथा ने अपने स्तर को न मात्र बनाये रखा, अपितु अन्य विधाओं के समक्ष ससम्मान खड़ी भी हो सके इस योग्य भी बनाया । ऐसे रचनाकारों में भारतेन्दु, जयशंकर ‘प्रसाद’, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, भवभूति मिश्र, उपेन्द्र नाथ ‘अश्क’, विष्णु प्रभाकर इत्यादि थे बाद में इस विधा के पुनरुत्थान में जिन लोगों ने अपनी पूरी ऊर्जा के साथ इसे शक्ति प्रदान की उनमें सतीश दुबे, सतीश राठी, विक्रम सोनी, कमल चोपड़ा, सतीशराज पुष्करणा, सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, श्याम सुन्दर अग्रवाल, बलराम अग्रवाल इत्यादि अनेक ऐसे लघुकथा-लेखक हैं जिन्होंने अपने उत्कृष्ट लघुकथा-लेखन से लघुकथा को साहित्यिक गरिमा प्रदान की है। इनकी अनेक-अनेक रचनाएँ ऐसी हैं जिन्होंने मेरे हृदय में स्थायी स्थान बनाया है।
बड़ी मुश्किल तब सामने आ खड़ी होती है जब मात्र अपनी पसंद की दो ही रचनाकारों की एक-एक लघुकथा का ही चुनाव करना हो, कारण एक-से-एक श्रेष्ठ एवं मेरी पसंद की लघुकथाएँ मेरे हृदय में अपना-अपना स्थायी प्रभाव जमाए बैठी हैं। ऐसे में जो दो लघुकथाएँ सर्वाधिक अपना नाम देने हेतु मुझे विवश कर रही हैं, उनमें एक है हम सबके प्रिय लघुकथाकार डॉ. सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘आग’ और दूसरे हैं हम सबके प्रिय लघुकथाकार मधुकांत की लघुकथा ‘मन का आतंक’ ।
सर्वप्रथम मैं यहाँ लघुकथाकार डॉ. सतीशराज पुष्करणा की लघुकथा ‘आग’ की चर्चा करता हूँ । डॉ.पुष्करणा एक ऐसे लघुकथा-लेखक हैं जिन्होंने लघुकथा में सृजनात्मक स्तर पर अनेक-अनेक नये प्रयोग किये, जिनमें अधिकांशतः वे सफल रहे हैं। विषय के स्तर पर उनमें पर्याप्त वैविध्य देखने को मिलता है और प्रत्येक प्रकार की उनकी लघुकथाओं में संवेदना के दर्शन भीतर की पूरी गहराई तक होते हैं। मुझे उनकी अपेक्षाकृत वे लघुकथाएँ अधिक पसंद हैं जो मनोवैज्ञानिक हैं और ऐसी लधाुकथाओं में उन्होंने अपने पात्रें का जो मनोविश्लेषण किया है वह अद्भुत है। उनकी इस प्रकार की लघुकथाओं में ‘मन के साँप’, ‘पुरुष’, ‘मन के अक्स’, ‘विवशता के बावजूद’, ‘कुमुदिनी के फूल’, ‘आग’ आदि काफी चर्चित रही हैं। किन्तु यहाँ चूँकि किसी एक लघुकथा की ही चर्चा करनी है तो मैं ‘आग’ पर ही बात करना पसंद करूँगा ।
‘आग’ एक यौन मनोविज्ञान की लघुकथा है, जिसमें नायिका, जो कि एक युवती है की यौन-आकांक्षा पर बहुत ही गंभीरता से इतने स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुति दी है कि उनके रचना-कौशल की दाद देनी पड़ती है। नायिका का मनोविश्लेषण देखें-फ्नौकर को उसकी कोठरी में सोते हुए देखकर उसे लगा, कि वह उससे जा चिपके — और कहे—- उठ रे पगले, उठ ! उठकर मुझे अपनी बाँहों में भर ले । मेरा जीवन प्यार से भर दे। मेरा जीवन तो सदैव रीता ही रहा है —- तू इस रीतेपन को अपने प्यार एवं यौवन की सम्पत्ति से समृद्ध कर दे । अब सहन नहीं होता —– नहीं होता ।य् इस लघुकथा में नायिका का मनोविश्लेषण करते अन्य भी अनेक वाक्य हैं, किन्तु स्थानाभाव के कारण—– खैर, ।
इस लघुकथा का शीर्षक ‘आग’ भी लघुकथा की आत्मा से पूरी गहराई से जाकर जुड़ा हुआ है, जिसे किसी भी दशा में इस लघुकथा से अलग नहीं किया जा सकता । यह शीर्षक इस लघुकथा को अपेक्षाकृत ऊँचाइयों के शीर्ष तक ले जाता है और अपनी उपस्थिति का सार्थक और समुचित एहसास कराता है।
इसका कथ्य भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यौन मनोविज्ञान पर आधारित होने के बावजूद यह लघुकथा अपने सकारात्मक उद्देश्य से कहीं भी न बहकती है, और न ही भटकती है और अपने उत्कृष्ट समापन के साथ, अपनी पूर्णता को प्राप्त होती है । अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण यह लघुकथा मुझे सर्वाधिक प्रिय रही है और आज भी है।
दूसरी लघुकथा के रूप में मधुकांत की ‘मन का आतंक’ है । यों तो मधुकांत ने मनोविज्ञान के सिद्धान्तों पर आधारित बहुत ही कम लघुकथाएँ लिखी हैं, उनकी अधिकतर लघुकथाएँ घटना प्रधान और विवरणात्मक शिल्प से सजी हुई ही हैं, किन्तु मुझे मनोविज्ञान पर आधारित लघुकथाएँ अपेक्षाकृत अधिक आकर्षित करती हैं। इनकी यों तो चार-पाँच और लघुकथाएँ हैं जो मुझे पसंद हैं, परन्तु यहाँ मैं पुष्करणा जी की ‘आग’ लघुकथा के साथ इसे प्रस्तुत करना पसंद करता हूँ । कारण विषय के स्तर पर दोनों में पर्याप्त साम्यता भी है। तो ‘मन का आतंक’ के विषय में कहना यह चाहता हूँ कि यह लघुकथा भी मनोविज्ञान के सिद्धान्त पर ही आधारित है। अक्सर क्या होता है कि हम जो कार्य कर रहे हैं वह सामाजिक दृष्टिकोण से शायद ठीक नहीं है तो स्वयं अपने मन में स्वयं से ही आतंकित हो जाते हैं। इस कथा-नायिका की भी यही स्थिति है। उसे कॉलेज से आने में देर हो गयी है। घर आने पर उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसका पति ऑफिस से आज जल्दी ही घर लौट आया है — उसे लगता है इसका पति उसके देर से आने पर रुष्ठ है और वह पूछती है, आप बोलते क्यों नहीं —- नाराज हो क्या ? उसके मन का अपराधबोध जो मन का आतंक बनकर उसे भयभीत किये हुए है। ऐसी स्थिति में वह यह सोचकर कि पति उपस्थित है उसका उत्तर देती है- उसका यह उत्तर ही वस्तुतः नायिका का मनोविश्लेषण है – इस संदर्भ में कतिपय पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं – वह कॉलेज में मेरे साथ पढ़ता था —- नहीं — नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ —- सच तुम्हारी कसम—- अचानक सड़क पर मिल गया — औपचारिकतावश चाय के लिए रोक लिया था —- हाँ ! हाँ ! कॉलेज की कुछ बातें हुई थीं —- बस और कुछ नहीं, बिलकुल भी नहीं — फिर कभी मिला तो कन्नी काट जाऊँगी —- बोलो अब तो खुश हो न —- आप।य् वस्तुतः वहाँ घर का पर्दा हिल रहा था वहाँ उसका पति या अन्य कोई भी नहीं था—- था तो बस अपराधबोध के कारण उसके ‘मन का आतंक’ । अपने शीर्षक के महत्त्व को पूरी गंभीरता से सिद्ध करती यह लघुकथा अपने शीर्षक के माध्यम से ही पूरी लघुकथा एवं उसके मनोविज्ञान को बहुत ही सुन्दर शिल्प में प्रतिपादित कर जाती है। अपने इन्हीं गुणों के कारण यह लघुकथा मुझे पसंद है।
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1- आग
– डॉ.सतीशराज पुष्करणा
नौकर को उसकी कोठरी में सोते हुए देखकर उसे लगा, कि वह उससे जा चिपके — और कहे—- उठ रे पगले, उठ ! उठकर मुझे अपनी बाहों में भर ले । मेरा जीवन प्यार से भर दे । मेरा जीवन तो सदैव रीता ही रहा है— तू इस रीतेपन को अपने प्यार एवं यौवन की सम्पत्ति से समृद्ध कर दे। अब सहन नहीं होता —— नहीं होता ।
सोचते-सोचते वह चौंक उठी और नौकर की कोठरी का दरवाज़ा धीरे-से बन्द करके पुनः अपनी बीमार माँ के कमरे में आकर अपने पलंग पर लेट गई। उसका मन कहने लगा—- यह तुम क्या सोचने लगी ? तुम्हें कुछ होश भी है ? वह एक नौकर है— तुम मालकिन हो, तुम्हारा-उसका क्या मुकाबला ! वह सत्रह-अठारह वर्ष का, और तुम पैंतीस पार करके छत्तीसवें में कदम रख रही हो—– वह तुम्हारे लिए पुत्रवत् है। तुमने यदि अठारह वर्ष में शादी कर ली होती, तो आज इतनी बड़ी तुम्हारी सन्तान होती । —- होती ! मगर कैसे? — जब मैं शादी करती । मगर कैसे करती ? माँ ने तो बहुत चाहा कि मैं शादी कर लूँ । पर यह कैसे हो सकता है? पिता बचपन में चल बसे । माँ ने सिलाई-कढ़ाई करके मुझे पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया । आज मैं बैंक में ऑफिसर हूँ। कई युवक चाहते थे, कि उनसे शादी कर लूँ । किन्तु माँ ! माँ क्या होगा? बीमार आदमी किसी के लिए भी बोझ हो जाता है। जिस व्यक्ति या वस्तु की कोई उपयोगिता न हो, वह कूड़ेदान के सुपुर्द कर दी जाती है। जैसे मुर्दा कोई भी घर में नहीं रखता, चाहे वह कितना ही प्रिय क्यों न हो —– जितनी जल्दी हो—- उसकी अन्तिम क्रिया करके उससे मुक्ति लेना चाहते हैं। —– वह परेशान हो उठी ।
माँ ! माँ की उपयोगिता उसके लिए—- वह उसके जीवन का सहारा है —– उसकी रक्षक है, शरीर से रक्षा करने में समर्थ भले ही न हो, किन्तु नैतिक एवं सामाजिक रूप से तो वह उसकी रक्षक ही है। शादी के पश्चात् पति के प्रति भी उसका दायित्व बढ़ जाएगा । वह स्वयं युवती है। पति के प्रेम में भावना एवं शरीर के स्तर पर वह बह सकती है— माँ उपेक्षित हो जाएगी । यदि माँ उपेक्षित न हुई तो पति उपेक्षित हो जाएगा—- और तब घर बिखरने लगेगा— तब वह किसी के प्रति न्याय नहीं कर पाएगी । मगर उसकी उम्र—— उसके शरीर की आवश्यकता —- वह झँुझला उठी—– वह क्या करे और क्या न करे— वह नहीं समझ पा रही थी।
उसे लगा उसका शरीर भीतर की आग से जल रहा है। पास पड़ी माँ गहरी नींद में सो रही है। नौकर भी दुनिया से बेख़बर दिनभर का थका-माँदा सोया हुआ है। और एक वह है कि नींद उससे कोसों दूर है। उसका सिर भारी-सा होने लगा । उसका मन हुआ कि वह अपनी माँ से लिपट जाए और उसे जोर से अपनी बाँहों में भींच ले। मगर—— यह कैसे हो सकता है। माँ बीमार है। फिर—- यह सब —– नहीं ! नहीं !! उसने तकिया उठाया । उसे ही अपने सीने से लगाकर पूरी शक्ति से भींच लिया। उसे कुछ राहत महसूस हुई—- मगर कुछ देर में उसने महसूस किया भीतर की आग और ज़ोर से लहकने लगी है।
उसे रह-रहकर अपने नौकर का ख़्याल आता—– मगर यह समाज—-यह दुनिया क्या जाने उसकी आवश्यकता ! उसके तो अपने नियम हैं । माँ के प्रति दायित्व, जिससे वह मुक्त नहीं होना चाहती। उसे अपनी माँ से बहुत प्यार है मगर—- वह क्या करे! उसे रह-रहकर अपने पर ही झुँझलाहट हो आती । उसका मन होता कि वह अपने बाल नोंचे या—–वह अपने को बहुत ही बेबस पाने लगी ।
वह उठी और आँगन में आकर चहलकदमी करने लगी । उसने सोचा, कल प्रातः ही वह नौकर का हिसाब-किताब करके उसे निकाल देगी। हालाँकि उसका कोई दोष नहीं है, मगर उसके रहने से शायद कभी उसका पैर फिसल ही न जाए—- फिर वह अपनी नज़रों में भी —– गिर जाएगी । वह चहलकदमी करती रही और सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगी। धीरे-धीरे उसकी भीतरी आग भी अब मन्द होती जा रही थी ।
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2- मन का आतंक
मधुकांत
अचानक उसकी नजर द्वार पर चली गयी। आप इस समय ? क्या ऑफिस जल्दी छूट गया? आप कुछ बोलते क्यों नहीं ? नाराज हो क्या ——-?
वह कॉलेज में मेरे साथ पढ़ता था—- नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ—-सच तुम्हारी कसम—- अचानक सड़क पर मिल गया—– औपचारिकतावश चाय के लिए रोक लिया था—– हाँ-हाँ कॉलेज की कुछ बातें हुई थीं—बस और कुछ नहीं, बिलकुल भी नहीं— फिर कभी मिला तो कन्नी काट जाऊँगी—-बोलो ! अब तो खुश हो ना आप—–! तेज़ हवा से द्वार का पर्दा हिल रहा था । अरे यहाँ तो कोई नहीं आया—फिर मैं किससे बात कर रही थी । उसने अपने माथे को छुआ तो चौंक गई, सचमुच माथा पसीने से गीला था ।
कृष्णानंद कृष्ण,संपादक: पुनः (अनि-),मार्ग सं–आठ (ब), दक्षिणी अशोक नगर,कंकड़बाग, पटना-800 020 (बिहार)