“दादी, सब कहते हैं कि हम मनुष्यों ने पर्यावरण का बहुत नुकसान किया है। पर मुझे तो ऐसा कुछ नहीं दिखता, आपको दिखता है क्या? ”, रेस्तरां में बैठे दस वर्षीय पीयूष ने बर्गर खाते हुए सवाल किया।
“बिल्कुल दिखता है पीयूष, मैं तो अभी ही गिना सकती हूँ कि बर्गर खाते हुए हमने कितना नुकसान कर दिया” ,दादी ने थोड़ी गंभीरता से कहा।
“हमने अभी नुकसान कर दिया, ये क्या कह रहे हो दादी! यहाँ बैठ कर खा लिया, इसमें नुकसान कैसा,” पलकें झपकाते हुए पीयूष ने कहा।
“देखो बेटा, बर्गर खाने से कोई नुकसान न हुआ; किन्तु बर्गर गत्ते के बड़े से डब्बे में पैक होकर मिला, जो सीधे प्लेट में भी आ सकता था। हम जो चम्मच प्रयोग में लाते हैं, वह लकड़ी की है और सॉस प्लास्टिक कवर को काटकर निकाला हमने। डिस्पोज़ेबल ग्लास में हमने कॉफी पी। हमने खाया-पिया कम और कचरा ज्यादा इकट्ठा किया। ये कचरा हमने कहाँ से लेकर फैलाया यह बताओ? ”, दादी ने पीयूष की ओर देखते हुए कहा।
“दादी , ये डब्बे,ये ग्लास, ये चम्मच सभी पेड़ के पार्ट्स से बनाए गए हैं। मतलब हमने पेड़ों का नुकसान किया”, माथे पर हाथ रखकर सोचने की मुद्रा में पीयूष बैठ गया।
सबके बर्गर खत्म हो चुके थे।
“मम्मा, पापा, आप लोग टिशू पेपर रख दीजिए,”पीयूष अचानक बोल पड़ा।
“क्यों बेटा, हाथ साफ करने हैं न तो…”, पापा ने कहा।
“तो नल में हाथ धोकर रुमाल से हाथ पोंछिए, टिशू का प्रयोग करके हम फिर से पेड़ों को ही नुकसान पहुँचाएँगे,”कहकर पीयूष वाश बेसिन की ओर बढ़ गया।
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लघुकथा.com
जून 2026
देशमहँगा कचरा Posted: August 1, 2020
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