जून 2026

दस्तावेज़महानगर की लघुकथाएँ     Posted: January 1, 2020


एक मुद्दत से सोच रहा था कि कभी अवसर हाथ लगा तो संपादक कौशल विषय पर लिखने में हाथ आजमाना चाहूँगा। दरअसल इसलिए भी कि संपादक के कौशल पर जितना भी काम नजर आया है, उस काम को मात्र डाक टिकिट के पीछे वह भी अधूरा-सा ही लिखा जा सकता है।
मधुदीप के दिशा प्रकाशन की ‘पढ़ाव और पड़ताल’ शृंखला में प्रकाशित सुकेश साहनी की छियासठ लघुकथाओं पर शाब्दिक ढंग से समीक्षात्मक चित्र खिचने का मौका मुझको क्या मिला, मैं सुकेश साहनी की लघुकथा लेखन का कायल हो गया हूँ। और यही से सुकेश साहनी से मेरा बजरिये मोबाइल वार्तालाप का रिश्ता बना। सुकेश जी का संवादीय संप्रेषण जिस करीने से मेरे कानों तक पहुँचता रहा है, गोया उनका बातचीत का लहजा आत्मा को सुकून देने वाला, मस्तिष्क को पौष्टिक आहार देने वाला जान पड़ा। फिर क्या था, सुकेशजी से मोबाइल पर बातों के कई-कई दौर चले। निष्कर्ष यह मिला की सुकेश साहनी की अद्यतन प्रकाशित कृतियाँ उनकी सदाशयता के चलते मुझको प्राप्त हुई, जिनमें उनके द्वारा सम्पादित ‘महानगर की लघुकथाएँ’ भी एक पुस्तक है। पुस्तक क्या मेरे ध्येय को सिलसिला देकर मेरी चेतना को स्फूर्त करने वाली पुस्तक!
लिहाजा एक अरसे से सम्पादक कौशल पर लिखने का जो मेरा मंसूबा रहा है, मानो इस पुस्तक ‘महानगर की लघुकथाएँ’ में मेरी उम्मीद, मेरी आस को इतनी बेकरारी दी कि मैं बतौर सुकेश साहनी के ‘महानगर की लघुकथाएँ’ पुस्तक में संगृहीत लघुकथाओं की शक्ति को पढ़कर बजरिये सुकेश साहनी के सम्पादकीय कौशल से अभिभूत होकर सम्पादक के दायित्व पर बरसों से सोचा आज लिखने बैठ गया हूँ।
इधर लघुकथाओं के सम्पादन का दौर अचूक रूप से अनवरत् दिखाई पड़ रहा है। पाँच-दस लघुकथाकार इकट्ठे क्या हुए, उनका मिला-जुला लघुकथा संग्रह, उन्हीं में से किसी एक के कांधे संपादक का भार देकर, त्वरित सामने आने लग गया। इस सिलसिले में मेरा मानना यह है कि यदि शहर के, प्रांत के, देश के लघुकथाकार यह चाहते है कि उनकी लघुकथा संदर्भित मिले-जुले संग्रह सामने आये तो पहला कदम यह होना चाहिए कि ऐसे मिले जुले संकलनों का दायित्व लघुकथा  क्षेत्र में प्रतिष्ठित और बहुचर्चित होकर स्थापित लघुकथाकार के जिम्मे किये जाना चाहिए। ताकि ऐसा कुशल संपादक अपनी तमाम योग्यताओं के सहारे से ऐसे तथाकथित लघुकथाओं के संकलन में जान फूँकने के निमित्त न केवल अपनी प्रतिभा खर्च करेगा वरन् अपने लघुकथा क्षैत्र में स्थापित नाम का भी ईमानदारी के साथ दोहन करेगा।
बरअक्स इसके कोई स्थापित लघुकथाकार, (जो स्वयंभू रूप में स्थापित न हो) बड़े दायित्व सम्पन्न भाव से लघुकथा की दशा, दिशा और संभावनाओं के पक्ष में खुद आगे आकर लघुकथाओ के संपादन का कार्य अपने हाथों में लेकर ऐसे कार्य को चरितार्थ करें। बतौर उदाहरण सुकेश साहनी ने देश के कोने-कोने से ऐसे लघुकथाकारों की ‘टीम’ को इकट्ठा किया है, जिनकी लघुकथाएँ दमदार होकर पाठको के बीच सहस्रमुख से चर्चित रही है। इस ढंग की लघुकथाएँ दर्पण हुआ करती हैं, बल्कि लघुकथाकारों की भावी पीढ़ी के प्रति रचनात्मक अनुगमन का मार्ग प्रशस्त करती है।
एक श्रेष्ठी सम्पादक का तमगा उसे ही पाने का हक है, जो खुद लघुकथाकार होकर लघुकथा सृजन विषयक दायीं-बायीं दिशाओं के ज्ञान से भलीभांति परिचित हो। यह बात सुकेश साहनी द्वारा सम्पादित ‘महानगर की लघुकथाएँ’ विषयक संपादन कार्य से पूर्णरूपेण सच होकर सामने आयी है। सुकेश साहनी के सृजनात्मक व्यक्तित्व में लेखन विषय पारदर्शिता का सौ. प्रतिशत है। जिसका प्रमाण साहनी जी द्वारा सम्पादित ‘महानगर की लघुकथाएँ’ में समाहित विभिन्न लघुकथाकारों की लघुकथाओं का अवगाहन करने से भलीभाँति मिलता है। महानगरों के परिदृश्यों पर लिखी गई लघुकथाओं की पड़ताल करना अपने आप में एक दुष्कर कार्य है। प्रस्तुत संकलन के सम्पादन में जिस महत कठिनाइयों का साहनी जी के सामने बोल बाला रहा है, जिन्हें साहनी जी ने पुस्तक के अग्रभाग में ‘अपनी बात’ के जरिए व्यक्त किया है ‘‘हमारे देश के महानगरों में रहने वाले आदमियों का कितना प्रतिशत कम्प्यूटर में बदल गया है? कहाँ-कहाँ उसकी आत्मा का लोप हो चुका है? किसी भी समाज को जीवित रखने के लिऐ अनिवार्य सम्वेदना एवं सहानुभूति की भावना में कितनी कमी हुई है? इन बातों की पड़ताल कर ही प्रस्तुत ‘महानगर की लघुकथाएँ’ की शाब्दिक तस्वीर सामने आ सकी है।
विविध लघुकथाकारों की भिन्न-भिन्न कथानकों पर केन्द्रित लघुकथाओं के संकलन को पढ़ने/देखने की क्रियाएँ वैचारिक धरातल पर मस्तिष्क में नानाविध प्रतिक्रियाओं का मानों एक ज़ख़ीरा खड़ा कर देती है। पाठकों की पठन-प्रवाह-क्षमता का सांगोपांग रूप तब निखर कर आता है, जब पाठकों के सामने एक ही विषय पर आधारित नानाविद् लघुकथाकारों की लघुकथाएँ उपस्थित होती हैं। तब इस ढंग का संग्रह पढ़कर पाठकों के विचारों में भी एक ऐसी ऐतिहासिक दृष्टि का निर्माण होता है, जिसके  बूते पर पाठक स्वयं भी अपने नीर-क्षीर विवेक के परिणाम स्वरूप समान विषय पर पठित लघुकथाओं के अलग-अलग कालखण्ड को भी कथ्य की दृष्टि से एक सूत्र में पिरोकर इस तरह से पाट देता है कि मानों सब-की-सब लघुकथाएँ एक ही समय सीमा में लिखी गयीं हों।
विषयगत एक ही अनुशासन को लेकर लिखी गई लघुकथाओं के जो संग्रह आए है, वे पाठकीय और ऐतिहासिक दृष्टि से कामयाब सिद्ध हुई हैं। मसलन, लघुकथाकार सुरेश शर्मा द्वारा सम्पादित ‘बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएँ’ और लघुकथाकार प्रतापसिंह सोढ़ी द्वारा संपादित ‘लघुकथा संसार: माँ के आसपास’ प्रभृत्ति ऐसे संकलन हैं, जिनके संपादन में संपादक की ऐतिहासिक दृष्टि संलग्न हुई मिलती है। एक ही विषय पर केन्द्रित बहुतेरी लघुकथाओं की मीमांसा भी एक तरह से लघुकथा का औचित्य प्रतिपादन करने में सहायक बनती है।
सुकेश साहनी जी का संपादन पक्ष इतना उजला इसलिए भी बन सका है कि प्रस्तुत संग्रह में समाहित लघुकथाओं का अवलोकन महानगर की जिंदगानियों का चश्मा चढ़ाकर ही किया गया है। साहनी जी का संपादन विषयक कार्य हर उन संपादकों के सामने एक स्पष्ट नजीर बनकर आया है, जो संपादन कार्य की भूख रखते हैं। बीरबल की खिचड़ी की तरह संपादन कार्य न तो पकता है और न ही रचनात्मक विरोधाभासों से विरक्त रहकर निखरता है।
तात्पर्य यह कि वर्तमान में चारों ओर से लघुकथाओं के लेखन की जोर आजमाइश हो रही है। व्यक्तिगत संकलनों के अलावे लघुकथाकारों के मिले-जुले संकलन भी बहुतायात में प्रकाशित हो रहे हैं। अतएवं अब यह मानकर चलना होगा कि लघुकथा के संग्रह यदि प्रकाशित होकर सामने आयें, तो उनके प्रकाशन के साथ भी उनके चर्चित होने का ठप्पा भी पाठकों की त्वरित प्रतिक्रिया के साथ लगा मिले।
-0-डॉ.पुरुषोत्तम दुबे,शशीपुष्प,74 जे/ए स्कीम नंबर 71,इंदौर 452 009
मो. 93295 81414

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine