आज उसका मन बहुत भारी था जैसे कोई बेशकीमती चीज खो गई हो ।
इन दिनों मीना ने माँ को घर से निकालने की मुहिम चला रखी थी। रात भर खांसती रहती है खाँहू-खाँहू। और दिन में म्हारे माथो दुखे, म्हारे डील दुखे, म्हारे यो दुखे, म्हारे वो दुखे। मुझे देख-देख टेंके करती रहती है, नाटकबाज। ऑफिस से थके-पचे घर आओ तो घर पर भी दो पल का सुकून नहीं। अगर कल की तारीख में डोकरी को वृद्धाश्रम में नहीं डाला , तो मैं बंटी को लेकर मायके चली जाऊँगी। इस बात को पत्थर की लकीर समझना।
मीना को देखकर अक्सर उसे लगता कि स्त्री के भीतर एक पुरुष दबा हुआ है जो गाहे-बगाहे अपना सिर उठा लेता है। वह स्वयं अपने भीतर छिपी नारी से लगातार हारता रहा है।
“बेटा, तू अब मुझे वृद्धाश्रम में भर्ती करा ही दे। मन ही मन घुटता रहता है।” माँ ने ही पहल की।
“पर माँ…।”
“तू मेरी फिकर मत कर। मन को समझा लूँगी। वहाँ कम से कम खाँसने की आजादी तो होगी।” उसे यह जानकर हैरानी हुई कि माँ आजकल रातों को मुँह में कपड़ा ठूँसने लगी है। वह सिहर उठा। दूसरे दिन वही हुआ जो मीना चाहती थी।
अब मीना बहुत खुश है। चहकती रहती है मानो सिर से टनों वजन उतर गया हो। गले लगी है, बहुत दिनों बाद। रमेश को लगता है कि उसकी बाँहों में कैक्टस उग आये हैं। वह हौले से उसके हाथ छिटक देता है।
दो दिन बाद ही मीना कहती है, “रमेश, एक खुशखबरी सुनाती हूँ।”
“सुनाओ।” वह बोला, बुझा-बुझा-सा।
“माँ आने वाली है।”
“क्या?” वह खुशी से उछल पड़ा।
“हाँ, आज ही माँ का फोन आया था। कह रही थी, इन दिनों तबीयत बहुत खराब रहती है। जँवाई राजा को भेज दो। अच्छे-से डाक्टर को दिखा देंगे। कुछ दिन तेरे पास भी रह लूँगी।”
वह गुमसुम हो गया। उसे अपनी माँ याद आ गई। ओल्डहोम की दीवार पर टँगी उदास तस्वीर-सी।
“कहाँ खो गए? जा रहे हो ना?”
“हाँ, हाँ।” वह मानो नींद से जागा।
दूसरे दिन वह बैरंग वापस आया ।
“क्या हुआ माँ नहीं आई?”
“आयी थी। मैंने उन्हें भर्ती करा दिया है।”
“अच्छा? कौनसे अस्पताल में?”
“अस्पताल में नहीं, वृद्धाश्रम में।”
“क्या कह रहे हो?” वह चिल्लाई, “तुमने मेरी माँ को वृद्धाश्रम में डाल दिया?”
“ठीक कह रहा हूँ। बहुत खाँस रही थी। तुम्हें रात भर नींद नहीं आती।”
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