घनघोर बादलों से घिरे, घने अंधकार में जब अचानक बिजली कड़कती है, तो कुछ पलों के लिए हम थम -से जाते हैं। यह बिजली कभी हमें डरा जाती है, सहमा जाती है, कभी निःशब्द कर जाती है, तो कभी उस गहन अंधकार में एक धवल उजाला फैलाकर, आशा का संचार कर जाती है। कुछ ऐसी ही अनुभूतियों को स्वयं में समेटे हुए है, आदरणीया सुदर्शन रत्नाकर जी का एक सौ एक लघुकथाओं से युक्त लघुकथा-संग्रह “साँझा दर्द”।
जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है -मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखने में दर्द का जितना हाथ होता है, शायद ही किसी और भावना का होता होगा! यह दर्द ही है, जो हम इंसानों को जोड़े रखता है, वरना ख़ुशियों में आग लगाने वाले तो बहुतेरे मिल जाते हैं। किसी का दर्द यदि बाँट लिया, तो उससे बड़ा कोई सुख, उससे बड़ा कोई पुण्य है ही नहीं!
“साँझा दर्द” की लघुकथाओं की यही विशेषता है। इसमें सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक आदि सभी क्षेत्रों से उपजी हुई लघुकथाएँ हैं, जो हमारी दिनचर्या में, हमारे आसपास हर समय घटती रहती हैं। ग़रीबी एवं उससे उत्पन्न विवशता एवं भुखमरी, बुज़ुर्गों की शोचनीय मनोदशा, घर के कामों में मदद करने वाले लोगों के प्रति हमारा व्यवहार,भ्रष्टाचार, जात-पाँत, ऊँच-नीच, भेदभाव, दोहरा आचरण … इत्यादि कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जिनसे दिनभर हमारा सामना होता रहता है। मगर हम उनपर ध्यान नहीं देते, बल्कि मशीन की तरह अपना दिन बिताकर केवल ख़ानापूर्ति करते हैं। एक क्षण को भी रुककर यदि हम अपनी सोच, अपनी वाणी, अपने कृत्य पर विचार करें, और तब कुछ बोलें या करें तो यह दुनिया बेहद ख़ूबसूरत हो जाएगी।
बच्चों के प्रति लेखिका के मन से सदैव ममता छलकती हुई प्रतीत होती है। ऐसे बच्चे जो बहुत मेहनती हैं, जीवन में कुछ बनना चाहते हैं, कुछ बड़ा करना चाहते हैं, उन बच्चों की मनःस्थिति, उनके आत्मसम्मान के प्रति पूरे संग्रह में उनकी कलम बेहद सजग रही है –आजकल जब हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है, वहाँ एक दस-बारह वर्षीय बच्चा जब ईमानदारी व मेहनत से अपना काम करता है एवं बख़्शीश लेने से साफ़ मना कर देता है, तो भविष्य के प्रति मन बहुत आशावान हो जाता है। यही आशा की किरण “बख़्शीश” दिखाती है।
इसी कड़ी में अपने शीर्षक को सार्थक करती लघुकथा ‘विश्वास’ भी है। तरस खाकर हम ग़रीब बच्चों को कुछ न कुछ देना चाहते हैं, मगर अनजाने में कहीं न कहीं उनके अहं को भी आहत कर देते हैं। दया या तरसभरी दृष्टि से अधिक उन्हें दुनिया से वह विश्वासभरी नज़र चाहिए, जिसके तहत उन्हें काम करने के बदले उनकी मेहनत की क़ीमत मिले, जिससे वे अपना पेट भर सकें।
ग़रीबी से ग्रसित केवल मज़दूर या झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले ही नहीं हैं, वरन् साधारण वेतन पाने वाले मध्यम वर्गीय परिवार की दशा भी शोचनीय है। विशेषकर यदि कमाई के अनुपात में परिवार बड़ा हो जाए। परिवार-नियोजन को ज़बरदस्ती थोपा हुआ सरकारी कानून नहीं मानना चाहिए। वरन् यह प्रत्येक मानव का कर्त्तव्य है कि वह जितने बच्चों का भली-भाँति पालन-पोषण कर सके, पढ़ा सके, अच्छा इंसान बना सके, सिर्फ़ उतनों को ही जन्म दे -यह उसका उत्तरदायित्व हो जाता है। “उत्तरदायित्व” लघुकथा का संदेश भी यही है।
यह सर्वविदित है कि अपनी जी-जान लगाकर, सुबह से लेकर रात तक खटकर, एक मध्यमवर्गीय परिवार अपने वेतन से जितनी बचत नहीं कर पाता, उससे अधिक तो उसका आयकर ही ले जाता है। ऐसे में यदि माह के अंत में अचानक कोई ख़र्च मुँह बाए खड़ा हो जाए, तो क्या ही कीजिए! लघुकथा “इसी माह” के नायक के पिता की मृत्यु जब अचनाक ही हो जाती है, तो वह अत्यंत व्यथित हो उठता है। मगर कुछ ही घंटों बाद जब उसे ध्यान आता है कि दाह संस्कार आदि पर व्यय होना है और महीने का अंत है, जबकि उसका हाथ तंग है, तो अनजाने ही उसके मन में यह विचार आ जाता है कि ‘बाऊजी को भी इसी माह’! यह विवशता भरी सोच कहीं अंदर तक व्यथित कर जाती है कि पैसों और हालात के आगे गहरी भावनाएँ भी किस तरह दम तोड़ देतीं हैं! इस लघुकथा में ग़रीब की विवशता का मनोवैज्ञानिक पक्ष उजागर किया है।
पढ़-लिखकर अच्छा, बड़ा इंसान बनने के लिए आवश्यक नहीं कि प्राइवेट स्कूल में ही शिक्षा प्राप्त की जाए। जिसे शिक्षा ग्रहण करके अच्छा नागरिक बनना है, वह सरकारी स्कूल में पढ़ कर भी अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यह संदेश लेखिका ने “कमल” लघुकथा में कीचड़ में खिले सुंदर लाल कमल के उदाहरण से अति सुंदर ढंग से दिया है।
“उस रात” लघुकथा में बताया गया है कि -जब पुलिस, जिसे रक्षा के लिए रखा गया है, वह ही अपनी दादागिरी दिखाकर भक्षी बन जाए तो ऐसे में सहायता के लिए कोई किसका सहारा देखे!
“तृप्ति” में एक रिक्शाचालक की कई दिनों बाद जब कुछ अच्छी कमाई होती है, तो उसका दिल अपने डिब्बे के ठंडे खाने को छोड़कर, पास ही ढाबे में बन रहे गरमागरम खाना खाने को करता है मगर तभी उसे याद आता है कि उसकी माँ की खाँसी की दवाई ख़त्म हो गई है और वह खाँस-खाँसकर बेहाल हो रही है।वह दवाई की दुकान में जाकर माँ की दवाई लेता है व गर्म खाना खाने की अपनी इच्छा को दबाकर ठंडा खाना खा लेता है। अपने कर्त्तव्य का पालन करने में जो तृप्ति मिलती है, वही एहसास इस लघुकथा का सार है।
भावनाओं के तार आपस में इतने उलझे हुए होते हैं कि कब हम स्वार्थी हो जाते हैं, कब हमारी आत्मा जाग जाती है, कब हम रिश्तों को सहेज लेते हैं, कब उन्हें पल भर में खो देते हैं, अक्सर हम स्वयं भी नहीं समझ पाते। माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे, दोस्त, पड़ोसी या सहयात्री …सभी रिश्तों के उतार-चढ़ाव एवं हर कोण से उनके पीछे का मनोविज्ञान “साँझा दर्द” में बख़ूबी झलकता है।
“क्यों नहीं समझ सका” में नायक को जब ऑफ़िस के काम से तीन दिनों के लिए मुंबई जाने मौका मिलता है, तो वह बहुत ख़ुश होता है कि काम के बहाने बरसों बाद वह अपने चचेरे भाइयों से भी मिल सकेगा। वह उन्हें अपना होटल का पता आदि ईमेल कर देता है। वहाँ पहुँचने के बाद, एक दिन तक जब न उन भाइयों में से कोई मिलने आता है, न ही कोई फ़ोन, तो बारी-बारी वह उन्हें फ़ोन करता है। परंतु वे दोनों ही उसे एक हफ़्ते बाद का समय देकर फ़ोन रख देते हैं, बिना उसकी बात सुने कि वह केवल तीन दिनों के लिए ही वहाँ है। नायक समझ नहीं पाता और स्वयं से सवाल कर बैठता है कि “यह महानगरों की विवशता है अथवा फ़ासलों की विवशता, जो दिलों में इतनी दूरियाँ बढ़ गईं हैं, यह मैं क्यों नहीं समझ सका।“ उसके सवाल में ही आज का कड़वा सच छिपा है। आजकल के भागते-दौड़ते व्यस्त जीवन में (विशेषकर महानगरों में), रिश्तों में बढ़ती दूरियों के दंश को सुंदरता से बयान किया है लेखिका ने।
“दूरियाँ” में छोटे मकानों से बड़े, कई मंज़िलों वाले मकानों में तब्दील होते घरों में किस प्रकार दूरियाँ पनप जाती हैं, उसका चित्रण है बख़ूबी किया गया है।
लघुकथा “गुनहगार कौन” अपने शीर्षक के अनुकूल ही बाल श्रम के प्रति हमें सचेत करती हुई, यह सवाल हमारे समक्ष रखती है कि ऐसे बच्चे यदि लालच में आकर चोरी करें तो इसके पीछे गुनहगार उनके माता-पिता के साथ-साथ हम जैसे लोग भी तो हैं।
किसी के बाहरी रूप से उसके दिल व चरित्र का अनुमान लगाकर, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना, सही नहीं होता है। ऊपरी रहन-सहन और दिखावे पर न जाकर, मन की सुंदरता को देखना अधिक आवश्यक है। लघुकथाएँ “ख़ुशबू” व “शर्मिंदगी” इसी विषय पर आधारित हैं। “दोनों लघुकथाएँ यह संदेश देने में सफल रही हैं कि कठिन समय में हमारी सहायता वही करते हैं, जिनका मन सुंदर है। भले ही हम उनके ऊपरी रूप को देखकर उनसे घृणा करते रहें, बाद में उनके ख़ूबसूरत दिल के आगे शर्मिंदा हमें ही होना पड़ता है।
रिश्तों का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व होता है। हमारे दिलों की ऊर्जा होते हैं रिश्ते! फिर वे चाहे ख़ून के हों या दिल के, कोई फ़र्क नहीं पड़ता! कहीं ऐसे रिश्ते भी होते हैं, जो आवाज़ बहुत करते हैं, मगर कब चुपचाप से टूट जाते हैं, पता नहीं चलता; और कहीं ऐसे भी रिश्ते होते हैं, जिनमें आवाज़ भले न होती हो परंतु बड़ी ख़ामोशी से आपस में जुड़े रहते हैं।
“दर्द का रिश्ता” लघुकथा में तीन देशों भारत, रूस एवं हंगरी से, तीन माएँ एक अस्पताल में, कई महीने अपने बच्चों के इलाज के लिए रहतीं हैं। तीनों एक दूसरे की भाषाओं से अनजान होती हैं, मगर फिर भी, फैमिली किचन में अस्पताल का एक जैसा खाना, साथ में खातीं, आँखों की भाषा से एक दूसरे का दर्द बाँटतीं -कभी उनके चेहरे पर मुस्कुराहट आती, तो कभी आँखें पनीली हो जातीं। धीरे-धीरे जब बच्चे ठीक हो जाते हैं, तो तीनों अपने बच्चों को वक्ष से लगाए, एक दूसरे के गले लगकर रोती हुई विदा होती हैं। कितना सहज-साधारण चित्रण है! ऐसे दृश्य हम अक्सर अस्पतालों में देखते हैं -सच है! दर्द की कोई भाषा नहीं होती! ये आँखों से ही पढ़ा-समझा जा सकता है!
“टूटते रिश्तों की आवाज़” में जब एक पिता, एक अनाथ बालक को गोद लेकर उसे समाज में स्थान दिलाते हैं, तो उस बालक का बंजर जीवन महक उठता है। पिता को जब फ़ाज़िल पड़ता है, तो वह बेटा, असली बेटे की तरह, मन से, अपना कर्त्तव्य समझकर उनकी सेवा करता है। पिताजी मृत्यु से पहले जायदाद का एक हिस्सा उसे दे देते हैं। उस समय बहनों ने कोई ऐतराज़ नहीं किया। परंतु बरसों बाद जब उस जायदाद की क़ीमत बढ़ जाती है, तो लालच में आकर, वे उसपर मुकद्दमा कर देती हैं। मकान उसी के नाम होता है, तो वह मुकद्दमा जीत जाता है। बहनें नाराज़ होकर वापस चली जाती हैं। वह जब घर वापस आता है, तो घर के भीतर जाने का साहस नहीं जुटा पाता, क्योंकि एक बार फिर वह स्वयं को अनाथ पाता है।
“मैं हूँ न” में अपनी माँ की मृत्यु के बाद, सभी रस्मों के पूरा होने के पश्चात, शाम की गाड़ी से, अंजली को वापस अपने घर लौटना था। माता-पिता के बाद मायका पहले जैसा कहाँ रह जाता है! पहले तो वह कभी भी माँ से मिलने आ जाया करती थी। अब तो सबकुछ समाप्त हो गया! लेकिन भाई के आँखों में आँसू भरकर यह कहने पर कि “मैं हूँ न दीदी, माँ के बाद मेरा सहारा भी तो आप हैं।“ भाई- के इन शब्दों से उसके मन का बोझ बहुत हल्का हो जाता है।
जहाँ बड़े एक-दूसरे को नोच-खसोट रहे हों, एक-दूसरे का हिस्सा मारकर आगे बढ़ रहे हों, वहाँ यदि बच्चे, माँ से छिपकर, अपने हिस्से का दूध बिल्ली के बच्चों को पिला रहे हों, तो यह प्रतीक है कि मानवता अभी ज़िंदा है और भविष्य आशावान है। “प्रेम” लघुकथा में बच्चों की इस मासूमियत और पशु-प्रेम को लेखिका ने बहुत ख़ूबसूरती से प्रस्तुत किया है।
संवेदना इंसान की सबसे बड़ी पहचान है और सबसे बड़ा गहना भी! “साँझा दर्द” लघुकथा संग्रह में कई ऐसी लघुकथाएँ हैं, जो हमारे दिलों पर दस्तक देकर हमें चौकन्ना कर जाती हैं कि यह सब कुछ जो रहा है, वह सही नहीं है। “संवेदन शून्यता” व “संवेदना” शीर्षक से तीन लघुकथाएँ दृश्यों के रूप में सामने आती हैं-
“समाधान” में बेटे के जन्मदिन पर काम वाली नहीं आती, तो नायिका को गुस्सा आता है। अगले दिन बाई के आने पर पता चलता है कि उसके बच्चे को बहुत तेज़ बुख़ार था। इसपर नायिका गुस्से में उसे कहती है कि “बुख़ार था तो फिर क्या हुआ? यहाँ ले आती, एक ओर पड़ा रहता, मर तो न जाता।“
इंसानों की बदसूरती एवं हैवानियत को आईना दिखाने वाली उपरोक्त लघुकथाएँ मन को हिलाकर रख देती हैं। ये दर्शाती हैं कि इंसान कितना कठोर-हृदय हो गया है! ऐसा घमंड! इतनी संवेदनहीन और गिरी हुई सोच! यहाँ तक कि बोलने से पहले सोचना भी नहीं! एक ओर ऐसी संवेदन शून्यता है तो दूसरी ओर बंदरों की संवेदनशीलता एवं एकता! -इसी भाव का तुलनात्मक कथन है ये लघुकथाएँ!
“मिड डे मील” लघुकथा में, बालमन की सोच, ग़रीबी एवं विवशता पर प्रहार किया गया है
रिश्तों के दंगल में माता-पिता भी अछूते नहीं रहे हैं। इस संग्रह में बच्चों की सोच कैसे माँ-बाप से प्रभावित होती है, वह भी दर्शाया गया है तथा वृद्धावस्था में असहाय, बीमार माता-पिता की बच्चों पर निर्भरता, उनकी स्थिति को कितनी दयनीय बना देती है, यह भी दिखाया है।
“बुरी बात” में बताया गया है कि बच्चों को शिक्षा देने से पहले स्वयं हमें वैसा आचरण अपनाना होगा। शीर्षक एवं कथन दोनों एकदम सटीक हैं।
ऐसी ही एक लघुकथा “बोलो न पापा” भी है। बच्चे मन के सच्चे होते हैं। उनके सामने बड़े जो कुछ करते हैं, वे उसी को जीवन का सच मान लेते हैं। यदि माँ-बाप का आचरण समझदारी भरा नहीं होगा, तो परिणाम भयानक हो सकते हैं और पश्चाताप का कोई रास्ता फिर समय को वापस नहीं लौटा सकता।
अक्सर हम बड़े-समझदारों के पास बच्चों के मासूम-सच्चे सवालों के जवाब नहीं होते हैं, या एकाएक कोई उत्तर नहीं सूझता। ऐसी ही परिस्थति को “परिवर्तन” लघुकथा में लेखिका ने बख़ूबी प्रस्तुत किया है। वेतन आधा होने पर जब एक परिवार को कोठी छोड़कर छोटे फ्लैट में आना पड़ता है, बच्चों को छोटे स्कूल में दाख़िल करवाकर कार की जगह बस से भेजना पड़ता है, तो बड़े तो इस परिवर्तन को समझ रहे होते हैं, परंतु छोटा बेटा एक दिन पूछ बैठता है, “पापा क्या अब हम ग़रीब हो गए हैं?” देखा जाए तो, बच्चों के लिए, हम अमीरी-ग़रीबी का यही पैमाना सामने रखते हैं -बड़ा घर, बड़ा स्कूल, बड़ी मोटर गाड़ी, महँगे, ब्रांडेड कपड़े, घड़ियाँ व अन्य सामान आदि … फिर मन की अमीरी का एहसास कराना भी तो हम माता-पिता की ही ज़िम्मेदारी है। यह संदेश “परिवर्तन” लघुकथा में लेखिका ने सुंदर ढंग से पहुँचाया है।
‘दूसरी तरफ़ की घास सदैव हरी मालूम पड़ती है!’ “बेहतर” लघुकथा इस कहावत को चरितार्थ करते हुए हमें संतोष की सीख देती है। ईश्वर ने हमें जो कुछ भी दिया है, उसके लिए उसका आभार व्यक्त करना चाहिए, न कि दूसरों को जो मिला, उससे दुखी रहें, क्योंकि बहुत ऐसे लोग भी हैं, जिनके पास उतना सब कुछ भी नहीं, जो हमारे पास है।
“उड़ान”में चिड़िया और चिड़ा के माध्यम से जीवन के दर्शन को दर्शाया गया है। लघुकथा अकेलेपन की कहीं एक कसक सी महसूस करा जाती है, जब नायक यह सोचता है कि ‘वे पक्षी तो उड़ान भरकर गए, मगर वह और उसकी पत्नी अभी भी अपने घर में बैठे हैं। वे पक्षियों की भाँति उड़ान भरकर कहीं भी नहीं जा सकते। वे समय आने पर ही उड़ेंगे और तब तक अपने घोंसले में समय की प्रतीक्षा करनी होगी।‘
“उपहार” लघुकथा में, विदेश में अपने बेटे-बहू और उनके बच्चों के साथ रह रही एक माँ की पीड़ा का बहुत ही मार्मिक चित्रण है।। बच्चों पर निर्भरता, उसपर विदेश में जाकर रहना -यदि प्यार, सम्मान, आपसी समझ एवं समानुभूति न हो, तो जीना दूभर हो जाता है।
बुढ़ापा तो स्वयं में ही एक बीमारी होती है। उसपर आयु यदि लंबी खिंच जाए, तो इंसान बच्चों पर भी बोझ जैसा होने लगता है, क्योंकि एक उम्र के बाद बच्चों की भी शारीरिक शक्ति क्षीण होने लगती है और वे खीझने लगते हैं। ऐसे में अक्सर उनकी झुंझलाहट भरी बातें भी माता-पिता के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। “गहरी नींद” ऐसी ही परिस्थिति से उपजी लघुकथा है -बेटा माँ से खीझते हुए कहता है कि ‘वह सो क्यों नहीं जाती, उसकी खाँसी से वह भी नहीं सो पा रहा है क्योंकि वह अब बुढ़ा रहा है। उसे भी आराम चाहिए।‘
“मुक्ति” में एक ऐसा बेटा है, जिसकी माँ को सात वर्ष से पागलपन के दौरे पड़ते थे और पिछले तीन वर्षों से वह बिस्तर पकड़ चुकी थी। उसका सारा कार्य बेटा बिस्तर पर ही करवाता था। इसी में अक्सर वह खीझकर गुस्सा भी करता था। डॉक्टर जवाब दे चुके थे, पर ऊपरवाले ने जितनी साँसें लिखीं थीं, उन्हें तो पूरा करना ही था। कई महीनों तक माँ के लिए उसने मृत्युंजय जाप भी किया, जिससे उसकी माँ को इस नारकीय जीवन से मुक्ति मिल जाए। अंततः जब माँ को मुक्ति मिलती है, तो वही बेटा नितांत अकेलापन महसूस करता हुआ, माँ की सूनी चारपाई के पाये पर सिर रखकर फफक पड़ता है। यह लघुकथा पाठक को निःशब्द कर जाती है।
वहीं दूसरी तरफ़ “प्रबंध” लघुकथा है, जिसमें लक्ष्मी अपने बेटे से तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए पैसे माँगती है। उसके इन्कार करने पर वह उसे बताती है कि किस तरह कष्ट झेलकर उसने उसे इस योग्य बनाया कि आज वह एक विदेशी कंपनी में अच्छे वेतन पर कार्यरत है। इसपर बेटा उसे लंबा-चौड़ा भाषण दे डालता है कि उसने (बेटे ने) थोड़ी न कहा था उसे, कि वह इतने कष्ट सहकर उसे पाले। उसने जो किया, अपनी मर्ज़ी से किया, माँ के स्नेहपूर्वक किए गए त्याग को बच्चे कितनी आसानी से ‘कोई एहसान नहीं किया’ कहकर नकार देते हैं और उसके दिव्य निःस्वार्थ प्रेम को अपमानित कर जाते हैं, इसका उन्हें एहसास तक नहीं होता।
“भरोसा” लघुकथा भी यही ताक़ीद करती है कि जीते जी अपना सब कुछ अपने बच्चों को नहीं दे देना चाहिए। अपने भविष्य के लिए माता-पिता को अवश्य ही बचत करनी चाहिए अन्यथा यदि बच्चे कहीं नालायक निकल गए तो माता-पिता को भीख माँगने तक की नौबत आ सकती है।
‘चींटियों’लघुकथा में बहुत ही सुंदर व उपयुक्त ढंग से लेखिका ने ‘चींटियों’ की तुलना‘अपनों’ से कुछ इस प्रकार की है कि पाठक अवाक् रह जाता है। जब तक इंसान के हाथ-पैर चलते रहते हैं, सारी दुनिया उसके आगे पीछे लगी रहती है। उसके निशक्त होते ही, दुनिया ही नहीं, उसके अपने भी साथ छोड़ जाते हैं। ठीक उन चींटियों की तरह जो मिठाई का रस चूसकर शेष छोड़ जाती हैं।
देखा जाए तो, यह आवश्यक नहीं कि माँ-बाप के जीवन में जो बच्चों का स्थान है, वही स्थान बच्चों के जीवन में, परिवार में, माँ-बाप को भी मिल जाए। बहुत भाग्यवान होते होंगे वे माता-पिता, जिनको बच्चों से उतना ही प्रेम व सम्मान प्राप्त होता है, जितना स्नेह उनके मन में बच्चों के प्रति है। लघुकथा “भ्रम” अपने शीर्षक के ही अनुरूप हमें इस भ्रम से बाहर रहने को सिखाती है।
दुनिया पैसे और नई-नई तकनीकों के पीछे भागी जा रही है।इस दौड़ में रिश्ते -नाते कहीं पीछे छूटने लगे हैं। सभी लोग प्रैक्टिकल एप्रोच अपनाने में लगे हुए हैं। दुख तो तब होता है, जब भावनाएँ भी व्यावहारिकता के तराज़ू में हल्के पड़ने लगती हैं, विशेषकर माता-पिता के प्रति। लघुकथा “दृष्टिकोण” में इसी भाव को बख़ूबी चित्रित किया गया है।
उम्र के दूसरे पड़ाव में, बुजुर्गों के हिस्से में, अक्सर समझौते ही आते हैं, जिन्हें ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकारने के अलावा, उनके पास शायद, कोई और चारा भी नहीं होता। ऐसे में यदि बच्चे माता-पिता को आपस में ही अलग कर दें, तो उससे बड़ा अन्याय कोई नहीं! लघुकथा “समझौता” ऐसे ही एक दम्पत्ति की दिनचर्या का करुणात्मक वर्णन है।
“लंबी उम्र” में नायक मरने के एकाध मिनट बाद, ऊपर मँडराता हुआ, अपनी मृत्यु को लेकर, अपने परिवार और जान-पहचान वालों की प्रतिक्रिया देखता है कि उनके चेहरे उतर गए, सिर्फ़ बड़े बेटे की आँखें गीली हुईं, केवल बेटी उसके सीने पर सिर रखकर रोई, बच्चों को खेलने का अवसर मिल गया, और आने वाले लोग सब, उसके मरने के फ़ायदे बताने लगे। जब वह देखता है कि कोई भी दुखी नहीं हुआ, तो वह अपने शरीर के साथ-साथ अपने परिवार का भी मोह छोड़ देता है, जिससे वह जीवनभर बँधा रहा था। बहुत ख़ूबसूरती से लेखिका ने एक कटु सत्य को उजागर करते हुए, यह लघुकथा रची है!
“बदलाव” लघुकथा विदेश से गाँव में, अपने घर आया हुआ एक बेटा, गाँव में भौतिक उन्नति को देखकर जहाँ प्रसन्न होता है, वहीं उन्नति की आड़ में अपने संस्कारों को तिलांजलि दे चुके घर के बाकी सदस्यों को देखकर दुखी हो जाता है। ‘रिश्तों के लिजलिजेपन’ का एहसास कराती दिल को छूती हुई यह लघुकथा यह संदेश देती है कि हमारे संस्कार, हमारे बुज़ुर्ग सच्चे अर्थों में हमारी सबसे मूल्यवान धरोहर हैं। उनके प्रति सम्मान रखना ही असली प्रगतिशीलता है।
““भेड़िया” एवं “सुरक्षित” दोनों लघुकथाएँ एक भयानक सिहरन उत्पन्न करती हुई मन को बिल्कुल सुन्न कर जाती हैं। रक्षक ही जब भक्षक बन जाए तो फिर? ऐसी घटनाएँ आए दिन समाचार में सुनाई पड़ती हैं, पर उनके ख़िलाफ़ आरोपियों को क्यों ऐसी सज़ा नहीं मिलती, जिससे ऐसे घिनौने अपराधों पर कोई रोक लगे। यह एक बहुत बड़ा सवाल है, जिसका उत्तर नहीं मिलता।
“इज़्ज़त” में एक कामवाली बाई इसलिए अपनी बेटी को नायिका के घर नहीं छोड़ना चाहती क्योंकि उसका पति (उसकी बेटी का बाप) जब शराब पीकर उस पर बुरी नज़र डाल सकता है, तो फिर दुनिया के सारी मर्द ज़ात का क्या भरोसा!
औरतों को मतलब के आगे कर देने और फिर मतलब निकल जाने पर, धौंस दिखाकर उन्हें पाँव की जूती समझने वाले, अनगिनत लोग इस दुनिया में भरे पड़े हैं। परंतु समय आ गया है, कि अब नारी न गाली सुनेगी, न ही मार-पिटाई सहेगी, बल्कि वह अपनी शक्ति एवं अपने अधिकारों के प्रति सजग होगी और अपना कार्य करेगी -क्रांति तभी आएगी। “क्रांति” तथा “नारी सशक्तिकरण” लघुकथाओं में लेखिका ने अपने पात्रों ‘जानकी’ व ‘घास काटने वाली औरत’ द्वारा अन्याय के विरुद्ध स्वर उठाकर, यही संदेश दिया है।
नेता और भ्रष्टाचार दोनों एक ही कश्ती के सवार होते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है, केवल कुछेक अपवादों को छोड़कर। उनके बच्चे तक उनकी फ़ितरत को समझते हैं। “आश्वासन” लघुकथा में एक ऐसे ही नेता के आचरण पर बहुत बढ़िया ढंग से कटाक्ष किया है लेखिका ने।
“कुत्ते” लघुकथा में दो कुत्ते आमने- सामने खड़े होकर, एक दूसरे पर भौंक रहे होते हैं। उनमें से एक कुत्ता जब दूसरे पर रौब जमाता है कि वह उससे पंगे ले रहा है, उसकी यह औक़ात! तो दूसरे कुत्ते के साथ गली के और कुत्ते आकर खड़े हो जाते हैं, और कहते हैं कि ‘हाँ सबको पता है कि वह नेता का कुत्ता है, मगर वे सब भी गली के कुत्ते हैं और एक साथ हैं।‘ इसमें एक बहुत सार्थक संदेश है कि नेता ही नहीं, नेता के कुत्ते तक रौब झाड़ते हैं और जनता जब चाहे, एक होकर उनकी हेकड़ी निकाल सकती है।
“दुकानदारी” में लेखिका ने बाबाओं के नाम की दुकानदारी की पोल खोली है। लोगों को आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाने वाले कुछ बाबा तो नीचता की हद तक भ्रष्ट पाये गए हैं।
“जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है, “साँझा दर्द” लघुकथा संग्रह में लेखिका ने मानव मन के हर तार को छुआ है। कई जगह मन उद्विग्न हो जाता है क्योंकि अन्याय हमारे सामने हो रहा है, हमारे साथ हो रहा है और हम स्वयं भी कर रहे हैं। हम भले ही यह दिखावा करें कि हमें कुछ नहीं पता, पर कब तक? दुनिया को तो हम बेवक़ूफ़ बना लेंगे, मगर अपने आप से कब तक झूठ बोला जा सकता है? अपने अंतःकरण की आवाज़ हम कब तक नकार सकते हैं! इसी कारण कुछ लघुकथाएँ मन को घायल कर जाती हैं। लेकिन वहीं कुछ लघुकथाएँ ऐसी भी हैं, जो मन पर बहुत कोमलता से मलहम लगा जाती हैं। हमारे कानों में बता जाती हैं कि सच केवल भयानक और बदसूरत ही नहीं! वो देखो! बादलों के चारों ओर की वह सुनहरी लक़ीर -आधा सच तो वो भी है!
अब मैं ऐसी ही कुछ लघुकथाओं की चर्चा करने जा रही हूँ। इसमें सबसे पहले वह लघुकथा आती है, जिसके शीर्षक को इस संग्रह का शीर्षक बनाया गया –“साँझा दर्द”। बेहद ख़ूबसूरत लघुकथा है। हृदय की सच्ची भावनाओं एवं मानवीय मूल्यों को, अपने कष्ट एवं ग़रीबी से ऊपर रखते हुए, एक चारपाई ठीक करने वाला, जब किसी अजनबी के दुखदर्द को अपना समझकर, अपना पेट काटकर मदद कर सकता है, तो हम सब क्यों नहीं कर सकते?
“घर की लक्ष्मी” लघुकथा बहुत ही सुंदर भावना को सँजोये हुए है। इसे समझने के लिए प्रेम व अपनेपन की सच्ची अनुभूति को समझना आवश्यक है। इसमें एक सास अपनी बेटी व भतीजी को न डाँटकर, अपनी बहू को ही डाँट दिया करती है। बहू भी हर बात मुस्कुराकर सुन लेती है। भतीजी को यह देखकर बुरा लगता है, तो वह अपनी बुआ से यह बात कहती है। इस पर उसकी बुआ कहती है कि ‘बेटियाँ तो पराई होती हैं, उन्हें एक दिन पराए घर ही जाना है। अतः उन्हें क्या डाँटू-टोकूँ! बहू तो अपनी होती है, घर की लक्ष्मी होती है! उसपर अधिकार होता है। यदि हर घर में ऐसा प्यार, ऐसी सोच एवं आपसी समझ हो तो यह दुनिया स्वर्ग बन जाए।
आजकल के युवा जिस क़दर उन्नति के लिए ‘शॉर्टकट’ अपनाने में लगे हुए हैं, उनके लिए ‘भाई जैसा’लघुकथा अत्यंत सकारात्मक संदेश देती है।
“बँटवारा” लघुकथा जब पहली बार मेरी नज़रों के सामने आई थी, तभी मेरे दिल छू गई थी। दो बेटे, घर के बँटवारे के साथ-साथ, माँ-बाप को भी बाँट लेते हैं, क्योंकि दोनों की पत्नियों के बीच झगड़े होने के कारण, घर में तनाव बढ़ने लगा था। माता-पिता की मर्ज़ी पूछने की उन्होंने ज़रूरत भी नहीं समझी। सारा जीवन ज़िम्मेदारियों के बोझ तले बिताने के बाद, माता-पिता ने सोचा था कि रिटायरमेंट के बाद अब इकट्ठे रहेंगे, फ़ुर्सत से, एक दूसरे के सहयोग से अपनी सारी इच्छाएँ, सारे शौक़ पूरे करेंगे, तो ऐसे में उन्हें अलग-अलग रहकर बच्चों के घर-परिवार एवं बाहर के काम देखने पड़ रहे थे। कई-कई दिन वे आपस में बात तक नहीं कर पाते थे। सब कुछ बिखर -सा गया था। उसी बीच ससुराल से बेटी मायके आती है। वह भी यह सब देखती है, और मन ही मन बहुत दुखी होती है। एक दिन वह अपने दोनों भाइयों को बुलाकर उनसे कहती है कि ‘माता-पिता, उनकी प्रॉपर्टी एवं उनका घर -इन सब पर, उसका भी उतना ही हक़ है, जितना कि दोनों भाइयों का। घर तो उन्होंने बाँट लिया, मगर माता-पिता को वह अपने साथ ले जा रही है। भाई उसका मुँह ताकते रह जाते हैं और वह गर्व से माता-पिता को अपने साथ ले जाती है।‘कितनी अजीब से बात है कि जो बात बेटियों को, बिना कहे ही समझ में आ जाती है, वह बेटों की समझ से प्रायः बाहर ही रह जाती है! माता-पिता के दिलों का दुख-दर्द, जैसे मायके से मीलों दूर रह रही बेटियाँ समझ लेती हैं, वैसे चौबीसों घंटे साथ रहने वाले बेटे क्यों नहीं समझ पाते? बेटी चाहती, तो वह घर में भी अपने हिस्से की माँग कर सकती थी, पर उसने नहीं किया। यहाँ, जहाँ बेटी के चरित्र व स्वभाव की ऊँचाई एवं गहराई को महसूस किया जा सकता है, वहीं एक चुभन भी होती है कि ये बात बहुओं को कैसे नहीं समझ आती है, जबकि वे भी किसी की बेटी हैं।
“साँझा दर्द” लघुकथा संग्रह आदरणीया सुदर्शन रत्नाकर जी का पहला लघुकथा संग्रह है, जो 2014 में प्रकाशित हुआ था। तब से अब तक लघुकथा की यात्रा में कई पड़ाव आए और वह उन्नति करती गई एवं अभी भी प्रगति की ओर उन्मुख है।लघुकथा के कथ्य-तथ्य, भाव-भंगिमा आदि हर पक्ष में बदलाव आया है और निरंतर आ रहा है। परंतु मानव हृदय की गहराई में समाई हुई भावनाएँ, संवेदनाएँ, विचार, प्रेम, घृणा, सुख-दुख, सुंदरता, विद्रूपता इत्यादि तो आदिकाल से वैसे ही रहे हैं, और सदा रहेंगे, भले ही उनके व्यक्त होने का ढंग बदल जाए। समाज की नींव और ढांचे में तो मुख्य रूप से इन्हीं का लेपन होता है। इसी विशेषता को सुगंध की भाँति अपने भीतर समेटे हुए, दिल से निकलकर दिल तक पहुँचने वाली, मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है -“साँझा दर्द”।
-0-साँझा दर्द (लघुकथा संग्रह);-सुदर्शन रत्नाकर,प्रकाशक-इतिहास शोध संस्थान, 33/1 भूलभुलैयाँ रोड, महरौली, नई दिल्ली-110030, पृष्ठ 135, प्रकाशन (प्रथम संस्करण) -2014