प्रेम का सूत्रपात जिन दिनों हुआ, कृतिका मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी और मैं अपनी पीएच.डी. के शोधपत्र को अंतिम रूप दे रहा था। शहर एक था; लेकिन कॉलेज अलग-अलग। मेडिकल लाइन की होने पर भी हिन्दी साहित्य में उसकी रुचि थी। उसी के चलते, साहित्यिक संगोष्ठियों में वह मिलती रही। उन गोष्ठियों ने हमारी आत्माओं को एक-दूसरे से जोड़ दिया। फिर, गोष्ठियों के अलावा भी हम मिलने लगे। मैं उसे तुलसी, मीरा के पद, महादेवी और मुक्तिबोध कविताएँ, दुष्यंत की गजलें सुनाता। सुनते-सुनते वह मेरे कंधे पर सिर रखकर पढ़ाई के तनाव भूल जाया करती। उस समय वह सिर्फ एक लड़की होती थी, जो थककर मेरे शब्दों में पनाह लेती थी।
लेकिन अब वह डाक्टर थी। देश की एक बहुत बड़ी हॉस्पिटल चेन में सीनियर सर्जन। था तो मैं भी डॉक्टर ही; लेकिन मेरे गले में स्टेथोस्कोप नहीं, शब्दों की गुनगुनाहट होती थी। कभी कोमल, कभी धारदार; और कभी दोनों एक-साथ। मैं शब्दों की दुनिया में खुद को तलाशता। वह धड़कनों की दुनिया को सँभालती। मैं जिंदगी के अर्थ तलाशता, वह, जिंदगियाँ बचाती। जब वह कहती, “आज एक फूल-सी बच्ची के जीवन को बचाया!” तो मैं उस पर कविता लिखने की कोशिश करता। जब मैं कहता, “मैंने प्रेम पर एक ललित निबंध पूरा किया!” तो वह मुस्करा भर देती, जैसे कहती हो मेरी समझ में सिर्फ प्रेम आता है सुधीश, निबंध नहीं।
हमारी मुलाकातें अब तयशुदा समय और जगहों पर होने लगी थीं। एक शाम, जब हमारा मिलना पहले से तय था, वह नहीं आई। कैफ़े के बंद होने तक मैं वहाँ बैठा रहा। मालिक या मैनेजर को अन्यथा न लगे, इसलिए कॉफ़ी पर कॉफ़ी मँगाता और बिना पिये ही वापस भेजता रहा।
कृतिका अगली सुबह मेरे कमरे पर आई। बेहद थकी-सी। आते ही बेड पर पसर गई। आँखें बंद। “सॉरी सुधीश!” पसरे-पसरे ही उसने कहा, “कल शाम एक सीरियस केस आ गया था। तुरन्त ऑपरेशन के लिए ले जाने का निर्णय लेना पड़ा।”
“तो?” मैंने कड़वाहट के साथ पूछा।
“तुम्हें फ़ोन करने का ख्याल तक नहीं आया। रात भर चला ऑपरेशन,” मेरी कड़वाहट पर ध्यान न देकर वह बोली, “थैंक गॉड, सफल रहा। एक और फूल मुरझाने से बच गया।” उसके किसी भी शब्द में कल शाम के खराब हो जाने का दुख या चिन्ता नहीं थी।
“सोया तो रात भर मैं भी नहीं कृतिका!” कल शाम के ही तनाव से चालित भीतर के पुरुष ने कहा, “तुम प्लीज, अपनी प्राथमिकता मुझे बताओ- मैं या मरीज़ !”
मेरे सवाल पर उसने एक झटके में आँखें खोल लीं। नींद से बोझिल, सूजी-सूजी- सी पलकें। मैंने उन्हें देखा, तो अपने सवाल की क्रूरता का आभास हुआ।
“मैंने सोचा था, मुझ थकी-हारी को यहाँ कुछ तसल्ली मिलेगी; इसीलिए ओ.टी. से सीधे चली आई। लेकिन अब… मेरा निर्णय मुझे गलत लग रहा है।”
उसके आक्रामक तेवर ने मेरे गले को खुश्क कर दिया था।