जून 2026

देशमीठे बोल     Posted: April 1, 2025

आज सुबह स्त्री गुनगुनाते हुए नींद से जागी थी।  उठते ही रसोई में लग गई। पुरुष  को उसकी प्रसन्नता व गुनगुनाहट शिशिर ऋतु की खिली हुई नरम धूप के समान लगी। वह उसकी गुनगुनाहट में खोने ही वाला था कि उसके मन में शंका उत्पन्न हुई।

आज इसे क्या हुआ। सुबह से अभी तक शब्दों के गोले नहीं दगे। लग रहा था मानों सूर्य पश्चिम से उदित हुआ हो।  वह चिड़चिड़ी स्त्री और यह गुनगुनाती, चहकती स्त्री।

शायद, ये पुरुष द्वारा एक मित्र की सलाह पर अमल करने का नतीजा था। दो दिनों से उसने भी मुख से अपशब्द नहीं निकाला था। नुक्ताचीनी करने के बजाय  स्त्री के कार्यों में मदद की थी।

उसकी दिनचर्या एवं कार्य-कलाप ने पुरुष को घर के प्रति स्त्री की निष्ठा का अहसास करा दिया था।

पुरुष  के इस बदलाव से स्त्री अचंभित थी। सुखद स्वप्न को हकीकत जानने के बाद  धीरे धीरे उसके चेहरे पर मुस्कान और अधिक गहरी होकर खिलने लगी थी। उसके इस कदर खिल उठने से पुरुष शंकामुक्त होकर मुस्कुरा रहा था।

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine