जून 2026

देशमुक्ति     Posted: May 1, 2019

            घर के बाहर निकलते ही जुगनू को अँधेरा मिला और उसे अपनी रोशनी अलग से दिखाई दी। थोड़ी दूर आने के बाद उसने पीछे मुड़कर अपना घर देखा। जंगल में वह पेड़ जिस पर जुगनुओं का खत्ता था, लाखों लाख जुगनुओं से दिप रहा था। वहाँ उसे कभी अहसास ही नहीं हुआ था कि उसके पास अपनी अलग से एक रोशनी है। वह अँधेरे का कृतज्ञ हुआ और अपनी रोशनी पर गर्वित। बहुत देर वह जंगल के घने घुप्प अँधेरे में रोशनी की पगडंडियाँ बनाता रहा। किसी पेड़, किसी पौधे, किसी लता, कभी किसी झाड़-झंखाड़ या पथरीली चट्टान पर ही, वह दिप्प से सुलगकर उसे अपनी रोशनी से चौंका देता और हँसता हुआ भाग खड़ा होता। बहुत धीमी, नीली-सी ठंडी चिनगारी भर रोशनी उसके  पास थी मगर उसे रास्ता दिखाने भर को, पेड़,पत्थर और झाड़-झंखाड़ से टकराने से बचा  लेने भर को काफी थी। उसे और कुछ नहीं चाहिए ।

            खिलवाड़ में उसे पता ही नहीं चला, कब वह जंगल के पार निकल आया। दूर एक खिड़की थी, खुली हुई, अँधेरे की छाती को रोशनी की सुरंग से छेदती हुई। जुगनू ने देखा और बढ़ चला। रोशनी उसे उमंग से भर गई। उसे याद नहीं आया कि फिर उसकी अपनी रोशनी छिप जाएगी और वह अपने को अँधेरे में खोज चुकने के बाद फिर रोशनी में खो जाएगा। या कौन जाने, अपने आपको खोज चुकने के बाद अपने आपको खो देने की ही उमंग मन में जागी हो।

            उस सुनहले चौखटे में घुसकर वह रोशनी में डूबा, उतराया, भीगा, नहाया। पट की एक आवाज आई और अचानक सब अँधेरे में  डूब गया। अँधेरे की छाती में सुरंग खोदन वाले सत्य को अपनी रोशनी पर कोई अधिकार नहीं था। कोई भी हाथ उसे स्विच दबाकर बंद कर सकता था।

            अब फिर अँधेरा था। जुगनू था। जुगनू के पास उसकी अपनी रोशनी थी और मन में खुद को खो देने की विकलता थी। उसने सोचा, वापस लौट चले लेकिन बाहर निकलने का कोई रास्ता सुझाने के लिए उसकी अपनी रोशनी काफी नहीं थी। स्विच दबाने वाले हाथ ने खिड़की बंद कर दी थी। खिड़की के अँधेरे कोच से जुगनू टकराया तो उसे अपनी हताश रोशनी की बूँद भर परछाई दिखी, बंद दरवाजों,बंद खिड़कियों और दीवारों से घिरे उस अँधेरे में जुगनू की रोशनी के पास फैलने भर की जगह भी नहीं थी।

            अब न उसके मन में अंधेरे के लिए कृतज्ञता थी, न अपनी रोशनी पर गर्व। मुक्त न हो पाने की टीसता हुआ अहसास था, बस।

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