घर के सभी लोग मेला देखने गए थे। बहू-बेटा अपनी अपनी चीज़े खरीद रहे थे। बेटे के दोनों बच्चे हम दोनों के साथ थे। पत्नी नाती को साथ लेकर घूम रही थी और खुश थी। नातिन मेरे साथ थी। दोनों ही बच्चे छोटे-छोटे हैं।
मैंने अपनी नातिन को अपने दोनों कंधों पर बैठा लिया था। वह मुँह में पीपनी लिये बजा रही थी और बीच-बीच में मेरे सिर को बजाने लगती थी। हम सभी साथ-साथ चल रहे थे कि….कि….मेरी पत्नी बिफ़र गई, ‘इसको कंधों पर क्यों चढ़ाकर रखा है । बूढ़े हो रहे हैं । दिमाग तो बिल्कुल रहा ही नहीं। उतारो इसे नीचे । मुड़चरी कर दोगे। अभी से सिर पर चढ़कर रहेगी तो ससुराल में जाकर तो दियासलाई ही लगा देगी। उतारो। उतारो जल्दी।’ फिर नाती की ओर देखकर बोली थी- ‘इसे नहीं बैठाया जाता। घर तो मेरे इस कुलदीपक से रोशन होगा ,न कि इससे ।’
मैंने अपनी नातिन को कंधों पर से नहीं उतारा था। हाँ नाती को भी गोद में लेने का प्रयास कर रहा था।
मेरी पत्नी अब भी खिसिया रही थी।