मैं बहुत पहले मर चुका था। यह बात यूँ ही नहीं कह रहा हूँ। मैंने अपनी मौत का तमाशा अपनी ही आँखों से देखा है; अपने लिए उठे विलाप को सुना है, अपने ही कमरे से अपनी चारपाई को बाहर जाते देखा है। गाँव की संकरी गलियों में मेरी मौत की खबर धुएँ की तरह फैलती चली गई,धीमी, पर चुभन लिये।
मुझे लगा- अब बंधन टूट गए। पर हैरानी तो तब हुई जब पता चला कि मैं आज भी जिंदा हूँ, राशन कार्ड में, मतदाता सूची में, और सरकारी दफ्तरों की ठंडी मेज़ों पर। मेरी राख उड़ चुकी थी, पर मेरे दर्जे अब भी ज़मीन पर पसरे पड़े थे,काग़ज़ों पर, सूचियों में, जिलों की धूल भरी काग़ज़ी पेटियों में।
उस सुबह मैंने अख़बार खोला। भीतर कुछ चटख-सा गया।
मुखपृष्ठ पर मोटे अक्षरों में लिखा था- “विधानसभा में उठाया गया मुद्दा,मुर्दों के साथ छेड़-छाड़।”
मैंने सिर झुका लिया।
दिल किसी अँधियारे कुएँ में सरक गया।
सोचा, कितनी दूर भटक आया हूँ उस जगह से, जहाँ मनुष्य देह से अधिक था; जहाँ उसकी देह पर उसका अधिकार था, मृत्यु पर उसकी मुक्ति।
पहले तो लगा और खबरों की तरह यह भी थोड़ी देर धुआँ देगी; दो दिन गरम बहसें होंगी; अगले दिन चूल्हे की राख की तरह ठंडी पड़ जाएगी। पर मंत्री महोदय का बयान सिहरन की तरह देह में उतर गया- “कब तक यूँ ही मुर्दों के साथ छेड़-छाड़ होती रहेगी!”
मेरी मृत्यु की तारीख भी है, नाम भी है; पर मेरा मरना सबसे अस्थायी घटना निकली।
स्थायी तो मेरी उपस्थिति है, जहाँ मैं नहीं हूँ, पर हर बार मुझे बुलाया जाता है।
मेरे मरे अंगूठे का निशान हर साल नया होकर लौट आता जैसे चिता की आग अब भी मेरी उँगली में धधक रही हो। कौन रखवाला है जो मेरी उँगलियों को खूँटे से बाँधे बैठा है? कौन है जो मेरे मरने को मानने से इंकार करता है?
मैंने तो हमेशा सुना था,छेड़-छाड़ भावों से होती है,पर अब यह छेड़-छाड़ देह से थी, उस देह से, जो मर चुकी थी, पर उसे मरने नहीं दिया गया।
मरघट में शलाखों की चादरें उतरती, चढ़ती रहीं,नाम बदलते रहे; पर मैं वही का वही रहा।
हर बार चुनाव में मेरी मिट्टी को जगाया जाता;कोई अनजान हाथ मेरे हिस्से की स्याही में अंगूठा भिगो,मेरी पहचान पर निशान लगा आता।
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