डॉ गजेन्द्र नामदेव
‘‘बधाई हो, बेटी हुई है ।’’
नर्स के यह कहते ही परिवार के लोग अचानक दो खेमों में बँट गये। एक चहक उठा और दूसरा दहक गया। उनके चेहरे पर मुर्दनी_ सी छा गई। कसक साफ पड़ी जा सकती थी……….काश।
उधर भविष्य के तानों को लेकर मां की कोरें भीगीं थीं। एक और नई मुसीबत, अभी से रो– रोकर पूरा अस्पताल सिर पर उठा लिया है। चुप ही नहीं हो रही।
नर्स भागी–भागी डॉक्टर के पास गई। डॉक्टर ने जाँचा–परखा– ‘‘सब कुछ तो सामान्य है। फिर क्या बात है?’’
आशंका के बादल घिर आए। तुरंत बड़ी डाक्टर के पास खबर भेजी गई। उन्होंने बारीकी से जाँच की। फिर विचार मग्न हो गईं। अचानक अनुभव की पिटारी खुली–
‘‘बच्ची के पिता को बुलाओ।’’
‘‘जी मैम! ।’’ नर्स फिर भागी।
बाहर बेचैनी फैल गई– ‘‘हे भगवान ये लड़की आई है कि…….।’’
वह अस्पताल के बाहर बेचैनी से टहल रहा था। मारे शर्म के सामने जाने की हिम्मत ही नहीं कर पा रहा था। लेकिन मन बेचैन था, अपनी पहली संतान का मुंह देखने के लिए। जैसे ही नर्स ने कहा वह सरपट भागा।
बड़ी डॉक्टर ने बच्ची को गोद में देकर उसे छूने सहलाने को कहा। वह नर्स और स्टाफ को समझा रहीं थीं–
‘‘जन्म से बच्चे का लगाव सिर्फ़ माँ से ही नहीं, पिता से भी होता है। कुछ स्पेशल केसेज में पिता से कुछ ज्यादा ही ।’’
भाव–विहल वह उससे बातें कर रहा है, लाड़ जता रहा है। बच्ची चुपचाप उसे टुकुर– टुकुर देख रही है जैसे देर से आने की शिकायत कर रही हो। नन्हें हाथों ने अंगुली थाम ली। वह मुस्कराया तो वह भी मुस्कराई। एक नन्हीं मुस्कान। खिलती कली सी जादुई मुस्कान। भीगी पलकों से माँ भी मुस्कराई। फिर नर्स भी, डॉक्टर भी, बाहर काँच की खिड़की से झाँकते परिजन भी। सहसा एक लहर-सी दौड़ गई।
अब तक सारा तनाव हवा हो चुका था।
-0-डॉ गजेन्द्र नामदेव,(भूगोल विभाग), शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय,छिंदवाड़ा (मप्र)