जून 2026

मेरी पसन्दमेरी पसंद की लघुकथाएँ     Posted: May 1, 2019

आज की भागदौड़ भरी ज़िदगी के चलते कम लोग ही उपन्यास अथवा लम्बी कहानियाँ पढ़ पाते हैं। ऐसे लोगों को साहित्य से जोड़े रखने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम हैं-लघुकथाएँ। साहित्य की इस महत्त्वपूर्ण विधा में बहुत कम शब्दों में ही बड़े और गहरे संदेश दिए जा सकते हैं। मैंने अस्सी के दशक में ‘सारिका’ में कई लघुकथाएँ पढ़ी थीं। तब से अब तक कई पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथाएँ पढ़ता रहा हूँ। मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि बहुत से लघुकथाकार इस विधा को हल्के में ले रहे हैं और सीमित शब्दों में सपाटबयानी को ही लघुकथा मान रहे हैं। इसके विपरीत कुछ लघुकथाकार पूरी ज़िम्मेदारी के साथ अपने कहन को प्रभावशाली बनाए रखते हुए इस विधा की कलात्मकता को बरक़रार रखे हुए हैं। 

     मैंने कुछ समय पहले ही माधव नागदा की लघुकथा ‘अब भुगतो’ पढ़ी है। यह भारतीय लोकतंत्र की ‘अपरिपक्वता’ को रेखांकित करती है। मुझे इस लघुकथा ने इसलिए आकर्षित किया क्योंकि यह राजनीतिज्ञों से अधिक मतदाताओं को दोषी ठहराती है। यह कठोर सत्य है कि देश में अनेक स्थानों पर जनता ईमानदार नेताओं को पसंद नहीं करती है और थोड़े से लालच अथवा मुफ्त प्राप्तियों के बदले गलत व्यक्तियों के पक्ष में मतदान करना पसंद करती है। अपने मत की शक्ति और लोकतंत्र की शक्ति के प्रति भारतवासियों में जैसी जागरूकता होनी चाहिए, वह स्वतंत्रता के सात दशकों बाद भी नहीं आ पाई है। इसी का दुष्परिणाम है कि पंचायत से लेकर संसद तक में बड़ी संख्या में दागी और भ्रष्ट व्यक्ति पहुँच रहे हैं, जबकि शिव खेड़ा सरीखे ईमानदार व्यक्ति इस स्थिति को बदलने के लिए जब चुनाव में उतरते हैं तो बुरी तरह परास्त हो जाते हैं। कहानी यह संदेश देने में सफल है कि यदि हम स्वयं ही अपने स्वार्थोंवश गलत लोगों का चयन करते हैं, तो उनसे अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरने की आशा रखने का भी हमें कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

     दूसरी लघुकथा ‘अप्रत्याशित’ डॉ. लवलेश दत्त द्वारा लिखित है। यह एक अभावग्रस्त स्त्री के प्रति संवेदना जगाती है। अप्रत्याशित भीख मिलने पर नायिका की प्रतिक्रिया पढ़कर पाठक को एक ज़ोरदार झटका लगता है। युवा भिखारिन का यह कहना, “अभी चलूँ या रात को आओगे ?” वास्तव में एक स्त्री के मन में संसार के सभी पुरुषों के प्रति अविश्वास को प्रकट करता है। वह यह मान चुकी है कि कोई भी पुरुष किसी स्त्री की ‘बड़ी मदद’ बिना किसी स्वार्थ के नहीं करता है, यद्यपि चंदन ऐसा नहीं था। यह लघुकथा हमारे समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता, स्त्रियों के प्रति पुरुष-दृष्टिकोण, एक निर्धन स्त्री की असहायता जैसे कई पहलू एक साथ सामने लाती है और पाठकों को उन पर विचार करने के लिए विवश करती है। कम शब्दों में लिखी गई यह एक प्रभावशाली लघुकथा है।

1.अब भुगतो

-माधव नागदा

     आज ग्रामसभा में अच्छी-खासी उपस्थिति थी। हो भी क्यों न, नए सरपंच को कार्य सँभाले एक वर्ष पूर्ण हो चुका है। इस एक वर्ष में क्या-क्या हुआ और क्या-क्या होना चाहिए था, सभी इस बात का लेखा-जोखा जानना चाहते हैं। लोगों के चेहरों पर एक किस्म का आक्रोश चस्पा है, जिससे साफ़ जाहिर है कि वे नए सरपंच के कार्यकाल से कतई संतुष्ट नहीं हैं। 

     सचिव ने जैसे ही कार्रवाई आरम्भ होने की सूचना दी, लोगों की खुसर-फुसर एकबारगी थम गई। परन्तु यह ख़ामोशी मानो तूफ़ान के आने की सूचना थी। शीघ्र ही लोगों ने सरपंच पर हमला बोल दिया- “इस एक साल में क्या किया है तुमने ? न नालियाँ, न टूटी सड़कों की मरम्मत, न पीने के पानी की माकूल व्यवस्था। चारों ओर गंदगी का अम्बार, कीचड़-ही-कीचड़ ! ढोली घोड़े की तरह बैठे रहते हो। काम के न करम के, नहीं कर सकते हो तो इस्तीफ़ा दे दो। कुर्सी से चिपककर क्यों बैठे हो ? चिपकू कहीं के। “

     सरपंच कुछ देर तक तो चुपचाप सुनता रहा। फिर अकड़कर बोला,”सब हो जाएगा,सरकारी काम है, सरकारी चाल से होगा। तुम्हारे कहने से नहीं होगा। तुम कौन होते हो मुझ पर इस तरह चिल्लानेवाले ?”

     “अच्छा, हम कौन हैं ? अरे, हमारे वोटों के बल पर ही तुम गांव के सरपंच हो। तुम्हीं आए थे नाक रगड़ते हुए हमारे दरवाज़े पर। “

      “अब तुम रगड़ो अपनी नाक। तुम्हारे वोट के बल पर नहीं, नकदनारायण के बल पर जीता हूँ। मैंने सौ -सौ में खरीदा है तुम्हें, याद है ? मुझ पर तुम्हारा कोई  एहसान नहीं है।

     सभा में सन्नाटा पसर गया। लोग धीरे-धीरे खिसकने लगे। अंत में रह गए सचिव और सरपंच। सचिव से रहा नहीं गया, पूछा, “सरपंच साहब, जनता को इस तरह फटकारना क्या अच्छी बात है ?”

      “ये इन्हीं लखणों के हैं। पिछले चुनाव में मैंने इनसे वादा किया था ग्राम विकास, ईमानदारी और नई-नई योजनाएं लाने का। नतीजा ? मैं हार गया, क्योंकि मैंने पैसा नहीं खर्च किया, अपने उसूलों पर अड़ा रहा। अब भुगतो। “

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2. अप्रत्याशित

 डॉ. लवलेश दत्त

          शाम को मंदिर से बाहर निकलते ही चंदन की नज़र सड़क के दूसरी ओर बैठी एक भिखारिन पर पड़ी। अत्यन्त दयनीय स्थिति में लगने वाली उस भिखारिन की उम्र बाइस-तेईस साल से अधिक नहीं होगी। वह राहगीरों से भूख का इशारा करते हुए भीख मांग रही थी जिससे उसके गूंगे होने का अंदाज़ा लग रहा था। आते-जाते लोग भीख देना तो दूर, उसकी ओर देख भी नहीं रहे थे। दो मिनट तक उसे देखते रहने के बाद चंदन को उस पर तरस आया। उसने सड़क पार की और उसकी ओर कदम बढ़ा दिए। भिखारिन अभी तक उसके आने से अनजान थी। चंदन उसके पास पहुँच गया। उसने देखा कि भिखारिन के आगे एक मैली-कुचैली चादर पड़ी है और उस पर एक दो रुपये के चार-पाँच सिक्के पड़े हैं। ‘इनसे इसका क्या भला होगा ?’ सोचते हुए चंदन ने पचास का नोट अपनी जेब से निकाला और उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “लो, खाना खा लेना। ” भिखारिन ने उसे देखा और नोट पकड़ लिया। सड़क पर बिछी चादर पर पड़े सिक्के उठाकर नोट के साथ अपनी मुट्ठी में दबाये और धूल झाड़कर चादर अपने कंधे पर डालते हुए चंदन से बोली, “अभी चलूँ या अँधेरा होने के बाद रात में आओगे ?” उसकी बात सुनकर चंदन का मुँह खुला का खुला रह गया।

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