
2016 में पूरे परिवार के साथ राजस्थान भ्रमण पर थी, जिनमें अजमेर भी हमारा एक ठिकाना था। हम रात 9 बजे निजी वाहन से अजमेर पहुँचे अजमेर में मेरा एक मात्र आकर्षण था शकुन्तला दीदी से मिलना। चूँकि फोन पर चर्चा होती रहती थी, जिससे यह संज्ञान था कि दीदी अमूमन कहीं जाती नहीं, अतः सोचा अजमेर पहुँचकर अचानक दीदी के सामने खड़े हो, उन्हें सरप्राइज दूँगी । सो मैंने रात अजमेर पहुँचकर भी दीदी को सूचना नहीं दी। पूरा परिवार था सो होटल में रुके थे।सुबह जल्द तैयार हो दीदी से मिलने पहुँचे, तो पता चला अभी सुबह 6 बजे दीदी अपने किसी रिश्तेदार से मिलने उनके गाँव के लिए निकल चुकी हैं।अब उनसे फोन पर बात करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं था। डाँट अलग पड़ी,“आने की सूचना तो देती; मैं अपना प्रोग्राम न बनाती। यूँ मेरा सरप्राइज़ मुझी पर भरी पड़ गया । खैर ! पहली मुलाकात सफल न हो सकी।“
30 सितंबर 2017 में यह गलती नहीं की। दीदी को आने की पूर्व सूचना तो दे ही दी (उस वक्त लघुकथा पर साक्षात्कार को लेकर कार्य जारी था और दीदी देश की प्रथम लघुकथा शोधार्थी हैं, इस नाते उनका साक्षात्कार मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण तो था ही, गौरव का विषय भी था) सो बड़े उत्साह के साथ दीदी से कहा ,”दीदी ! आपका साक्षात्कार लेना चाहती हूँ। अगर आप कहें तो प्रश्न पहले भेज दूँ?”
जवाब मिला,”लता ! अन्यथा मत लेना, मैं कभी साक्षात्कार नहीं देती।” आज तक दीदी से कभी पलटकर सवाल नहीं किया, सो उनके निर्णय को स्वीकार लिया। साक्षात्कार की बात दिमाग से निकाल दी । सितम्बर जाने को था राजस्थान में मगर दिन की उमस बनी हुई थी। ट्रेन सुबह साढ़े छह बजे अजमेर स्टेशन पर पहुँची। बाहर निकली तो ड्राइवर गाड़ी लेकर खड़ा था। घर पहुँची, दीदी को पहली बार रूबरू देख रही थी। जिस पल दीदी से सामना हुआ हैरान रह गई…इतने बड़े महल की राजकुमारी श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, साक्षात् शिव की आराधिका लगीं । सादगी ऐसी कि बस नि:शब्द कर दे । सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् का साक्षात् मेल देख रही थी सामने, सिर श्रद्धा से उनके चरणों में झुक गया, जब उन्होंने प्यार से गले लगाया तो चेहरे से ममता बरस रही थी, जितनी बेसब्री से मुझे उनसे मिलने का इंतजार था, उनकी आँखों में भी मिलन की वही ललक झलक रही थी। निहाल हो गई थी मैं उस दिन, बरसों से तरसती ममता को शीतलता मिली। हम दोनों के बीच अघोषित माँ –बेटी का रिश्ता कायम हो गया जो निरंतर बरकरार रहा ।
दिन तो आश्रम, हॉस्पिटल, कोठी देखने तथा परिजनों के बीच निकल गया। रात साढ़े बारह बजे तक भाऊ सा, मम्मी जी, संगीता, मृदुला सभी दीदी के कमरे में बैठ मुझसे बातें करते रहे । फिर सभी अपने अपने कमरे में सोने चले गए। मुझे दूसरे दिन सुबह शब्दनिष्ठा कार्यक्रम में पहुँचना था ,फिर वहाँ से रात को सलूम्बर के लिए निकलना था। सो बस अब रात का ही समय था हमारे पास। घड़ी में बारह बजकर पैंतालीस मिनट हो रहे थे, कमरे में दीदी और मैं थे । अचानक दीदी ने ही समझो मेरा साक्षात्कार आरम्भ कर दिया, “लिखने के अलावा और क्या शौक हैं तुम्हारे लता ?”
“कुछ खास नहीं दीदी, घर और नौकरी के बाद लेखन को ही पूरा समय नहीं दे पाती। “
“फिर भी…गीत वगैरह गा लेती हो ?”(बाद में पता चला दीदी ने संगीत सीखा है,उन्हें गीतों से बहुत लगाव था…वे छंदोबद्ध अपनी कविताएँ गाती भी हैं। )
“दीदी!गीत तो नहीं …हाँ भजन गा लेती हूँ। “
“अच्छा सुनाओ।” उतनी रात को धीमी आवाज में एक भजन सुनाया, फिर उन्होंने अपनी फरमाइश के एक भजन के बारे में पूछा, संयोग से मुझे आता था, वह सुनाया इस तरह तीन भजन उन्होंने मुझसे सुने। फिर बोलीं बहुत थक गई होगी अब सो जाओ सुबह जाना है। हम दोनों सोने को तत्पर थे कि उन्होंने फिर एक सवाल किया, “मुझसे मिलकर पता नहीं तुम्हें कैसा लगा ?” यह सवाल दी ने पूछा क्यों समझ नहीं आया, फिर भी उत्तर तो देना था, मैंने कहा,
“दीदी ! सच कहूँ तो ऐसा लगा बरसों से तरसती माँ की ममता से आज नहा ली ।”
“और सब ?”
“बहुत अपने लगे, भाऊ- सा, मम्मी जी मुझसे बात करने ऊपर चढ़कर आए… इतना वक्त दिया… मेरे लिए बहुत सुखद स्मृति है यह। (बोलते हुए भावावेश में कह गई ) बस एक बात रह गई मन में। “
“वह क्या ?”
“काश ! आपका साक्षात्कार ले पाती !”
“लता ! कई लोगों ने मुझसे कहा मगर मैंने आज तक किसी को नहीं दिया साक्षात्कार ।”
“मगर क्यों दीदी ?”
“क्योंकि …मैं खुद को इस योग्य मानती ही नहीं…आखिर ऐसा क्या किया है मैंने ?”
“दी! आप तो लघुकथा जगत की लाइट हाउस हैं।” वो कुछ देर ऊपर छत की ओर खामोशी से देखती रहीं…फिर अचानक बोल पड़ीं, “अच्छा पूछो क्या पूछना है ?” अब हैरानी की बारी मेरी थी कारण दीदी द्वारा साक्षात्कार के लिए इनकार करने पर मैं कोई तैयारी करके नहीं ले गई थी। लेकिन चूँकि मैंने लघुकथा की बारीकियों को समझा था, उनका शोध ग्रंथ पढ़ा था, इसलिए बहुत सी सामग्री ज़हन में थी। सो मोबाइल का रिकॉर्डर ऑन किया और शुरू हुआ प्रश्नों का सिलसिला। लगभग 1 घंटा मेरे प्रश्नों का इतनी सहजता से उन्होंने उत्तर दिया । मैं समझती हूँ यह एक मात्र साक्षात्कार है जिसमें कुछ पल पहले न मुझे पता था न दीदी को कि साक्षात्कार होना है। ऐसी थीं मेरी शकुन्तला दीदी कि मेरा दिल न टूटे, इसके लिए अपना निश्चय भी तोड़ देती थीं। ममता का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा । इसी तरह किसी भी किताब की उन्होंने कभी भूमिका नहीं लिखी, मगर पिछले दिनों जब मेरी पुस्तक ‘गांधारी नहीं हूँ मैं’ का दूसरा संस्करण आ रहा था, तब मैंने हक के साथ (अब तक हमारे रिश्ते इतने प्रगाढ़ हो चुके थे) दीदी से जिद की, मेरी किताब भी अध्यात्म विषय पर है आपको इसकी भूमिका लिखनी है। दीदी ने कहा भी , “लता ! मैं बहुत लोगों को मना कर चुकी हूँ उन्हें बुरा लगेगा। मगर मेरी जिद के आगे एक बार फिर ममता ने हथियार डाल दिए। दूसरा बड़ा कारण यह भी था कि उन दिनों दीदी को ब्रेस्ट कैंसर बताया था, वे कैंसर के ऑपरेशन के लिए मुम्बई जा रही थीं। कहीं न कहीं उन्हें मुझ पर तरस ही आया होगा, इसलिए फिर एक बार अपना उसूल तोड़ा। किसी को उनसे कभी कोई कष्ट न पहुँचे, भले ही वे स्वयं कष्ट पा लें । यही निशानी होती है बड़प्पन की । खैर,यूँ तो उस रोज दीदी से विदा लेकर ही आई थी कि शब्द्निष्ठा का कार्यक्रम होने पर यहीं से रात २ बजे उदयपुर के लिए निकल जाऊँगी । मगर शाम होते ही दीदी ने फिर एक बार गाड़ी भेज दी बोलीं,
“आजाओ लता, अभी मन नहीं भरा ..तुम्हारी गाडी को अभी समय है छुड़वा दूँगी ।” फिर दीदी के साथ डिनर किया और लौटने को हुई तो सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं,
“बहुत अच्छा लगा तुमसे मिलकर लता, आती रहना ।” मैं बाहर निकलते हुए बार-बार पलटकर देख रही थी । सुना था कि किसी जगह से जाते हुए अगर बार-बार पलटकर देखते हैं तो आप जल्द ही उस जगह पर लौटकर आते हैं । हुआ भी यही , उसके बाद सतत शब्दनिष्ठा में जाने का अवसर मिलता रहा और साथ ही दीदी से मिलने का भी । यूँ हमारे स्नेह की डोर और मजबूत होती गई । तब से एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा कि हमारी फोन पर बात नहीं हुई हो । यहाँ तक कि जिस दीदी मुम्बई कैंसर के ऑपरेशन के लिए गईं तो उन्होंने कहा, ‘लता चिंता मत करना मैंने संगीता को कह दिया है वह ओपरेशन होते ही तुम्हें सूचित कर देगी। मैं इंतजार कर ही रही थी , शाम चार बजे दीदी के फोन से रिंग आई , सोचा संगीता होगी, मगर नहीं दीदी थीं , मैं आश्चर्य में थी ,
“दीदी ! क्या हुआ ? नहीं हुआ ओपरेशन ?” बोलीं, “अरे हो गया, मैं बढ़िया हूँ , तुम चिंता कर रही होंगी इसलिए सोचा बता दूँ मैं ठीक हूँ।” ऐसी उदारमना थीं मेरी दीदी । उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की तो क्या कहूँ ,साहित्य के अतिरिक्त उनकी राजनीति के क्षेत्र में भी सक्रिय भागीदारी रही, समाज सेवा तो मानो उनकी रग-रग में बसी थी। हॉस्पिटल में बने उनके केबिन में लोग नित उनके पास अपनी समस्याएँ लेकर आते , वे उनके समाधान में तन-मन और धन से जुट जातीं । अक्सर कहतीं, ‘लता तुम मुझे पहले मिल जाती तो मैं राजनीति से संन्यास नहीं लेती …। नहीं जानने का प्रयास किया कभी कि उनके जीवन में यह वैराग्य का पल कैसे आया जिसने उनके जीवन की दिशा को आध्यात्म की ओर मोड़ दिया । गुरु की महती कृपा थी उन पर ,अपने गुरु का आशीष पाकर उन्होंने जीवन को ईश्वर भक्ति में लगा दिया।
किन्तु रिश्तों की यह डोर भौतिक रूप से महज 5 वर्ष ही रह पाई । 4 अप्रैल को दोपहर ढाई बजे फोन की घण्टी बजी तो दीदी का फोन था बोलीं, “लता ! भाऊ सा, मम्मी जी और मैं तीनों कोरोना पॉजिटिव आए हैं। दिलीप और सुनील मान नहीं रहे , कह रहे हैं जीजी आपको अस्पताल चलना है गाड़ी तैयार है नीचे। मुझे जाना पड़ेगा … मगर तुम चिंता मत करना मैं जल्दी ठीक होकर आ जाऊँगी।” कभी न हारने वाली मेरी दीदी कोरोना से भी नहीं हारी…उन्होंने कोरोना को मात दे दी । हम लोगों की आस बढ़ गई। उस दिन भाऊ सा ने फोन करके बताया भी,
“बेटे ! मैं और तुम्हारी मम्मी जी भी निगेटिव आ गए और शकुन भी । हम लोग घर जा रहे हैं ,शकुन को अभी समय लगेगा …मगर ठीक हो जाएगी।” न जाने कैसे साँसों की वह डोर टूट गई। मेरे ममता भरे संसार की लड़ियाँ टूटकर बिखर गई। मेरी दीदी, इस बार अपना वादा पूरा नहीं कर पाईं। मुझे कोरोना हुआ तो भले ही वे भौतिक रूप से मेरे पास उपस्थित नहीं थीं मगर दिन में कई – कई बार फोन करके पूछतीं, “खाना खाया ? दवाई ली ? समय से दवाई लेना, तुम चिंता मत करना तुम्हें कुछ नहीं होगा…मैं हूँ न तुम्हारे लिए गुरुजी से प्रार्थना करती हूँ रोज। तुम्हें ठीक होना ही है लता, मैंने अपने सारे सपने तुम्हारी आँखों में बो दिए हैं…एक ही सपना है मेरा, तुम्हें खूब ऊँचाइयों पर देखूँ।“ मगर मुझे भरोसा है वे हर समय अभौतिक रूप से ही सही मेरे साथ हैं। ईश्वर उन पुण्यात्मा को बहुत सँभालकर रखेंगे क्योंकि ऐसे आदर्श चरित्र दुर्लभ ही मिलते हैं ।