प्रभाष दादा ने आज भी पूछा था कि सत्या तू इतनी मैच्योर उम्र में घर से कैसे भाग आया..पन्द्रह साल की उम्र.. कोई छोटा बच्चा नही था तू ?
यही प्रश्न बारह साल पहले प्रभाषदा ने उससे ट्रेन में तब किया था, जब वो घर छोड़ कर अनजान सफर के लिए निकल पड़ा था।
सत्या सर खुजाता..सर में दबाव देता हुआ तेजी से बालों को हाथ से रगड़ता..फिर हँसता हुआ बोला- “प्रभादा मैं भी आज तक नही समझ पाया हूँ कि मैं घर छोड़ कर क्यों भागा..”
“इस साल जाएगा घर..माँ से मिलने?”
“ नही दा ,बारह साल हो गए ..घर और घरवालों के बारे में कुछ नही पता..माँ है भी या नहीं।”
“तुझे याद भी नही आती किसी की भी?”
“कभी नहीं आती, किसी की भी याद..पता नहीं क्यों ऐसा हूँ मैं..धीरे से सर झुका कर यादों और भर आईं आँखों को छुपाने की कोशिश करता, सरल से पापा याद आते..जो होली -दिवाली की छुट्टी में घर आते..माँ को याद करने की कोशिश करता, तो बात-बात में हाथ उठाने वाला चाचा याद आता..माँ के साथ उसकी ठिठोली याद आती..
तब चाचा के प्रति अपनी अन्तहीन नफरत पर वो अंकुश नही रख पाता था, सोचता कभी मौका मिले तो दोनों को मार डालूँगा , जैसे ही चाचा को माँ के आस पास देखता ,तो दोनों से लड़ने लगता , चाचा उसे बुरी तरह से तब तक पीटता जब तक वह घर से बाहर नहीं भाग आता , माँ मूक दर्शक बनी रहती।
कई सालों तक वह पिटता रहा , उस बार दिवाली से पहले पापा आए थे ,सत्या को लगा आज उसके पास बहुत बड़ा सहारा है उसके पिता के रूप में…जैसे ही चाचा घर में आया ,तो सत्या भड़क उठा..चाचा ने हाथ आजमाईश शुरू की …..उसने उम्मीद से पिता को देखा, पिता ने आँखें फेर लीं। पिता के लिए भी क्रोध नफ़रत से भर उठा मन , और जोर से पिता पर चिल्लाया- “कायर हो तुम!”
घर से निकल आया रेलवे स्टेशन….. लम्बी कशमकश के बाद उसने निर्णय लिया..कभी घर नही लौटने का, और आज वह समझ गया था कि ये आँखों की नमी किसी की यादों के कारण नहीं, बल्कि अपमान के दंश की है,उसने धीरे से सर उठाया, “प्रभादा आप हो ना मेरे माँ बाप,फिर क्यों किसी की याद आएगी”,और मुस्कुरा दिया।
-0-गाजियाबाद,उ.प्र.