एक गाँव में लड़कियों के जीन्स पहनावे के खिलाफ…..
पंचायत बैठने में अभी तीन घण्टे शेष थे, सरपंच की पोती,, ढीला-ढीला-सा जीन्स पहनकर, अपने दादाजी को पानी पिलाने आई।
‘‘बेटे! ये आज तूने क्या पहन रखा है?’’
इससे पहले कि पोती, अपने दादाजी को बताती, ढीला-ढीला जीन्स पहने,उसकी सहेलियाँ, अपनी योजनानुसार, सरपंच के सामने यकायक आकर एक स्वर में बोलीं-‘‘दादाजी, ये जीन्स हैं!’’
‘‘क्याऽऽ….ये….ये जीन्स हैं, तो वो, फिर वो क्या है, जो हमारी बेटियाँ पहने, नंगी-सी डोलती-फिरती हैं?’’
‘‘दादाजी! वे भी जीन्स हैं; ये भी जीन्स है!’’
‘‘अरे! ते फिर नहीं!….नहीं! ऐसे पहनावे का नहीं! हमारा गाँव उस पहनावे के खिलाफ कैसे जा सकता है, जो नारी शरीर की गरिमा अपनी तरह से बनाए रखने में सक्षम है।’’
………
सरपंच, लड़कियों को साथ लेकर, अपने साथियों को समझाने, पंचायत भवन की ओर अपने कदम, छड़ी टेकते-टेकते बढ़ा रहा था।
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