समय परिस्थिति एवं वातावरण के अनुरूप साहित्य के स्वरूप में परिवर्तन होता रहता है। यही साहित्य की सुन्दरता है और इसी में साहित्य की सार्थकता है। लघुकथा साहित्य के इसी परिवर्तित स्वरूप का प्रतिफल है।
वर्तमान समय में लघुकथा साहित्य की लोकप्रिय और रोचक विधाओं में से एक है। पत्र-पत्रिकाओं में यह प्रमुखता से प्रकाशित हो रही है और इनकी पाठकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस प्रकार लघुकथा का भविष्य उज्ज्वल।
मुझे सुकेश साहनी, सतीशराज पुष्करणा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु ‘, कमल चोपड़ा, योगराज प्रभाकर, डॉ. उमेष महादोषी, बलराम अग्रवाल, माधव नागदा, अशोक भाटिया एवं गुडविन मसीह जैसे ख्यातिलब्ध लघुकथाकारों की लघुकथाओं को पढ़ने का सुअवसर मिला है। इनकी लघुकथाएँ मन के संवेगों की गहराई से छू जाती हैं।
इनमें प्रत्येक लघुकथा पाठक की कोई न कोई रचनात्मक संदेश देती हुई प्रतीत होती है।
इस दौरान जिन दो लघुकथाओं ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया है वे हैं सुकेश साहनी की लघुकथा ‘धुएँ की दीवार’ और रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु ’ की लघुकथा ‘ऊँचाई’।
पहले मैं सुकेश साहनी जी की लघुकथा-‘धुएँ की दीवार’ का जिक्र करना चाहूँगा। पारिवारिक सम्बन्धों के ताने-बाने पर गढ़ी गई यह लघुकथा अन्तर्मन को झकझोर कर रख देती है। देखने में यह रोजमर्रा की जिन्दगी का बखान करती हुई एक साधारण लघुकथा लगती है, मगर इसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। अमीचंद और दुलीचंद इस लघुकथा के दो मुख्य पात्र हैं और दोनों सगे भाई हैं। अमीचंद बड़ा है और दुलीचंद छोटा। पारिवारिक कलह के कारण दोनों भाइयों के बीच बँटवारा हो जाता है। बँटवारे के बाद अमीचंद पहली बार बेलेवाले की बाजार से घर के लिए जरूरी सामान लेने जा रहा है। यह बात उसके मन में शूल की तरह चुभ रही है कि वह आज बेलेवालाँ की हाट से केवल अपने परिवार के लोगों के लिए सामान लेकर आएगा, दुलीचंद के परिवार के लोगों के लिए नहीं। उसका मन इतना खिन्न है कि उसे शीशे में भी तरेड़ दिखाई देती है।
तभी उसकी नजर अपनी दस वर्षीया बेटी पर पड़ती है’ जो एक बड़ा सा गिलास लेकर अपने चाचा दुलीचंद के पास खड़ी है। उसका भाई दुलीचंद अपनी गाय दुह रहा है। अमीचंद कल्पना करता है कि अब शायद उसका भाई दुलीचंद उसकी बेटी को डाँटकर भगा देगा, मगर इसके विपरीत दुलीचंद बड़े प्यार से अपनी भतीजी के गिलास को दूध की धारों से भर देता है। तभी दुलचंद की पत्नी आ जाती है, अब अमीचंद सोचता है कि उसकी पत्नी जरूर उसकी बेटी के हाथ से दूध का गिलास छीन लेगी दुलीचंद की पत्नी मुस्कराती हुई अन्दर चली जाती है। यह सब देखकर अमीचंद के मन का सारा मैल धुल जाता है और उसके मन में अपने भाई और उसके परिवार के प्रति गहरा प्रेम उमड़ पड़ता है।
वह फिर शीशे में अपना चेहरा देखता है। अब उसका मन प्रसन्न है इसलिए उसे तरेड़ की जगह शीशे में सफेद बाल चिपका हुआ दिखाई देता है और वह उसके बाल को हटाकर शीशे को साफ कर देता है। यहां प्रतीकों के रूप में तरेड़ और बाल का बहुत ही सटीक प्रयोग किया गया है, जिसने लघुकथा को बहुत प्रभावी बना दिया है।
लघुकथा का उपसंहार बहुत ही प्रभावी है। अमीचंद प्रफुल्ल मन से अपने छोटे भाई दुलीचंद से ऊँची आवाज से कहता है-“ओए दुली, मैं बेलेवालाँ जा रहा हूँ, तुम्हें जाने की जरूरत नहीं। मैं तुम सबके लिए सामान लेता आऊँगा।”यहाँ लेखक कुछ अनकहा भी छोड़ता है पाठकों के लिए,अमीचंद का ऊँची आवाज में पड़ौसियों को सुनते हुए कहने से पाठक को पता चल जाता है की दोनों भाइयों के बीच धुएँ की दीवार किसके द्वारा खड़ी की गई थी।
इस प्रकार यह लघुकथा बुनावट, कसावट, शिल्प और रचनाधार्मिक की दृष्टि से एक उत्कृष्ट लघुकथा है। यह पाठकों के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है।
मेरी पसन्द की दूसरी लघुकथा है रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा-‘ऊँचाई’। इस लघुकथा में कथ्य और तथ्य एकामेक हो गए हैं और यह पाठकों को सकारात्मक संदेश देती है। रोजी-रोटी की तलाश में शहर या कस्बों में बसे एकाकी परिवारों की मनोदशा को रेखांकित करती यह लघुकथा बहुत प्रासांगिक और प्रेरणादायक है।
लघुकथा का मुख्य पात्र रोजी-रोटी के सिलसिले में शहर आकर बस गया है। इन दिनों वह और उसका परिवार आर्थिक तंगी के कठिन दौर से गुजर रहा है। उसे अपने परिवार के सदस्यों के लिए जरूरी सामान जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। इस सबके कारण उसका मन इतना परेशान है कि उसने तीन महीने से गाँव में रह रहे अपने परिवार को पत्र तक नहीं लिखा है।
इसी बीच एक दिन अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के उसके पिताजी उसके घर आ जाते हैं। यह देखकर वह और उसकी पत्नी परेशान हो उठती है। पत्नी का यह कथन उनकी विपन्नता और मानसिक वेदना का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है-“लगता है पैसों की जरूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे।”
पिता के इस तरह से आ जाने से बेटा बड़ा संकोच और दुविधा में है। वह सोच रहा है कि पिताजी जरूर रुपये माँगने आए होंगे। अब वह उनकी सहायता कहाँ से और कैसे कर पाएगा, यही चिन्ता उसे सताए जा रही है।
खाना खाने के बाद पिताजी ने जब एकान्त में उसे अपने पास बुलाया तो उसके दिल की धड़कन तेज हो जाती है। वह सोच रहा है कि अब पिताजी घर की जरूरतों के लिए रुपए मांगने ही वाले हैं। मगर उसकी आशा के विपरीत जब पिताजी उसे सौ-सौ के दस नोट थमा देते हैं तो उसका हृदय पिता के प्रति असीम प्रेम से भर जाता है। पिता के हृदय की विशालता के सामने वह अपने को बहुत बौना अनुभव करने लगता है। उसका हृदय अपराधबोध से भरा जा रहा है।
लघुकथा के शीर्षक ‘ऊँचाई’ का यह कथनपूर्ण सार्थकता प्रदान करता है-“ले लो बहुत बड़े हो गए हो क्या?“
नायक की आँखों के सामने बरसों पहले का वह दृश्य स्थिर हो जाता है जब पिताजी स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर इकन्नी टिका दिया करते थे,लेखक के इस वाक्य ने लघुकथा को भी उत्कृष्ट श्रेणी में ला खड़ा किया – ‘तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।’ लघुकथा के गुण और धर्म के आधार पर यह एक आदर्श लघुकथा है। इसका कैनवास बहुत छोटा है मगर इसकी मारक क्षमता बहुत अधिक है।
सुरेश बाबू मिश्रा, ए-373/3, राजेन्द्र नगर,
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1-धुएँ की दीवार
सुकेश साहनी
अमीचंद ने कुलाह सिर पर जमाया, फिर शीशे के सामने खड़ा होकर पगड़ी बाँधने लगा। उसकी नज़र शीशे के बीचों-बीच पड़ी बारीक तरेड़ पर ठहर गई। वह आज भी उदास हो गया…. टूटे शीशे में मुँह देखना शुभ नहीं होता…. आज हाट से दूसरा शीशा ज़रूर खरीदकर लाएगा। बँटवारे के बाद आज पहली बार वह बेलेवालाँ जा रहा था, पर उसके मन में कोई उत्साह नहीं था। पहले हर महीने वह बेलेवालाँ के हाट से सबके लिए ज़रूरी सामान लाता था, दुलीचंद और उसके बच्चों के लिए भी, पर आज…. उसने खिड़की के बाहर उदास निगाह डाली, अपने पुश्तैनी मकान को दो हिस्सों में बाँटती दीवार उसके दिल को चीरती चली गई। बँटवारे वाले दिन से उसके और दुलीचंद के बीच बातचीत बिल्कुल बंद थी।
बाहर दुलीचंद श्यामा को दुहने की तैयारी कर रहा था। दूसरे अन्य सामान के साथ गाय छोटे भाई के हिस्से में गई थी।
तभी अमीचंद की नज़र अपनी दस वर्षीया बेटी पर पड़ी, जो हाथ में लस्सी वाला बड़ा गिलास लिये दबे कदमों से अपने चाचा की ओर बढ़ रही थी। वह चिल्लाकर उसे रोकना चाहता था, पर आवाज़ गले में फँसकर रह गई। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
दुली ने मुस्कराकर अपनी भतीजी की ओर देखा, जवाब में वह भी धीरे से हँसी। दुलीचंद ने उसके हाथ से गिलास लपक लिया और चटपट उसे दूध की धारों से भर दिया।
अमीचंद साँस रोके इस दृष्य को देख रहा था। ठीक उसी समय दुलीचंद की पत्नी घर से निकली। उसे पूरा विश्वास था कि बहू उसकी बेटी के हाथ से दूध का गिलास छीनकर पटक देगी और न जाने क्या-क्या बकेगी। बँटवारे के समय कैसे मुँह उघाड़कर उसके सामने आ खड़ी हुई थी। अमीचंद यह देखकर हैरान रह गया कि बहू के चेहरे पर हल्की मुस्कान रेंगी और कहीं पति उसे देख न ले, इस डर से उल्टे कदमों भीतर चली गई।
उसकी बेटी ने एक साँस में ही दूध का गिलास खाली कर दिया और वापस घर की ओर दौड़ पड़ी। अमीचंद की आँखें भर आईं।
उसने वापस शीशे के सामने आकर तरेड़ पर हाथ फेरा तो एक बाल उसके हाथ में आ गया, और शीशा बिल्कुल साफ़ हो गया। उसे बेहद ख़ुशी हुई, लगा घर के बीच की दीवार अदृश्य हो गई है।
अमीचंद उत्साह से भरा हुआ घर से बाहर आया और अड़ोस-पड़ोस को सुनाता हुआ ऊँची आवाज में बोला, “ओए दुली, मैं बेलेवालाँ जा रहा हूँ। तुम्हें जाने की ज़रूरत नहीं। मैं तुम सबके लिए सामान लेता आऊँगा।”
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2-ऊँचाई
रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’
पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?“
मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफ़र की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज़्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाने के वक्त रोज़ भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबू जी को भी अभी आना था।
घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी। खाना खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया। मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आए होंगे। पिताजी कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए। एकदम बेफिक्र, “सुनो!“ कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं साँस रोककर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चैकन्ना था।
वे बोले, “खेती के काम में घड़ी भर की फुर्सत नहीं मिलती है। इस बखत काम का ज़ोर है। रात की गाड़ी से ही वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।”
उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकाल मेरी तरफ़ बढ़ा दिए-“रख लो। तुम्हारे काम आ जायेंगे। इस बार धान की फ़सल अच्छी हो गई है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमज़ोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फँसकर रह गए हों। मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डाँटा-“ले लो। बहुत बड़े हो गए हो क्या?“
“नहीं तो।” मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर इकन्नी टिका दिया करते थे, परन्तु तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।
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