जून 2026

अध्ययन -कक्षरत्नकुमार सांभरिया की लघुकथाएँ     Posted: March 1, 2020

यदि मानवेतर लघुकथाओं को पढ़ने का सुख लेना है तो आपको रत्नकुमार सांभरिया को पढ़ना होगा। यदि लघुकथा में थॉटफुलनेस से साक्षात्कार करना है तो भी आपको रत्नकुमार सांभरिया को पढ़ना होगा। यदि स्त्री-विमर्श की लघुकथाएँ पढ़नी हैं तब भी आपको रत्नकुमार सांभरिया को पढ़ना होगा। यदि दलित-विमर्श की लघुकथाएँ पढ़नी है तब भी आपको रत्नकुमार सांभरिया को पढ़ना होगा। उनकी लघुकथाएँ आपको पढ़ने के लिए मजबूर ही नहीं करती, मजबूत भी करती हैं। यदि हिन्दी लघुकथा से सांभरिया को डेबिट करना पड़े तो हमें हिन्दी लघुकथा की बैलेंस सीट फायनल करने के लिए कई अन्य को क्रेडिट करना होगा, क्योंकि उनकी अनेक लघुकथाएँ ऐसी हैं, जिन्हें केवल और केवल रत्नकुमार सांभरिया के द्वारा ही रचित किया जा सकता है।

सांभरिया की लघुकथाएँ आवाज़ नहीं करतीं। उनके पास मूक बोलने की कला तो  है ही, पात्रों में शालीनता के साथ विरोध करने का संयम भी कायम है। उनकी लघुकथा का भी यही प्रमुख आधार है। वे उन गरीबों के साथ हैं, जो चुपचाप अन्याय सहते जाते हैं, तो वे उनके साथ भी हैं, जो प्रतिरोध करना जानते हैं। सामान्यतः उनके पात्र गाँधी की भाँति अहिंसा का प्रदर्शन करते हैं, जो निश्चित ही अवतार नहीं  हैं, वह सामान्य हैं।

जब श्री सांभरिया मानवेतर पात्र रचते हैं, तो सज्जन हो जाते हैं। हालाँंकि यह एक सामान्य बात नहीं है। उनके पात्र हिंसक नहीं है, लेकिन उनका प्रतिरोध करने का ढंग द्रष्टव्य है। वे भाषा के ज्ञाता हैं। यदि अपनी भाषानुकूल पात्र रचते तो शर्तिया वह भी बौद्धिक हो जाता है। उनके पात्र आम जीवन से उठाये गये हैं। मानवेतर भी, जिनके माध्यम से सांभरिया अपने भीतर की आग को शब्दों के हवाले कर देते हैं। उनकी लघुकथाएँ बेशक वैचारिक द्वन्द्व से साक्षात्कार करातीं हों, लेकिन वे बौद्धिकता के फ्रेम में बंधी नहीं होतीं।

उनकी कतिपय लघुकथाओं पर दृष्टि डालेंगे जिन्हें प्रतिनिधि लघुकथाएँ मानना गहरी भूल होगी ;क्योंकि उनका फलक कहीं ज्यादा बढ़ा है।सांभरिया जी अपने मानवेतर पात्रों के सहारे अपने विचारों की दुनिया सजाते हैं। ये विचार बेशक उनके होते हैं लेकिन ये सारी दुनिया को प्रभावित और संवेदित करने की क्षमता रखते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में सर्वप्रथम उनकी लघुकथा ’अंतर’ को देखिए। लघुकथा का मुख्य पात्र एक घोड़ा है। घोड़ा भी क्या है, एक संवेदना है। एक फीलिंग है, जो आदमी में नहीं जागती, एक घोड़े में जागती है।

आदमी और घोड़े में यही अंतर होता है। आदमी स्वभाव से घोड़ा यानी जानवर होता है, जबकि घोड़ा अपने स्वभाव के कारण यहाँ आदमी को भी मात कर देता है।

घोड़ा दिन भर चाबुक खाता है फिर भी उसे अफसोस होता है कि उसके मालिक की हथेली चाबुक मारने के कारण नीली पड़ गयी है और वह अपनी संवेदनाओं का मलहम लगाने मालिक के पास पहुँच जाता है।

‘दर्द से गीली हो गईं घोड़े की आँखें एकाएक अपने मालिक की ओर घूमीं। वह थान के पास चारपाई डाले बैठा अपनी हथेली पर मेहंदी लगा रहा था। घोड़े का मन व्यथित हो गया। आँखें डबडबा आईं। गर्दन हिलाई और अश्रुकण नीचे झटक दिये। चारा छोड़ दिया। वह दो टापें आगे बढ़ा।’ (अन्तर)

दिनभर चली चाबुकों से मालिक की हथेली छिल गई थी। फफोले उठ रहे थे। चाबुक से आहत मालिक की हथेली को घोड़ा अपनी नर्म-नर्म जीभ से सहलाने लगा था। दर्द करते फफोलों को राहत मिलेगी।

यहाँ लघुकथा का कथानक जितना छोटा प्रतीत होता है, असर उससे कहीं अधिक है। यदि आपने लघुकथा उसी भावना के साथ पढ़ी है, जिस भावना के साथ लिखी गयी है तो आप आधी रात में सपने में देख पायेंगे कि घोड़ा आपके हाथ सहला रहा है। यह घोड़ा वस्तुतः एक जागृति है, जिसे सांभरिया जी जगाना चाहते हैं कि जाग जा मानुष..अभी भी वक्त है।

एक घोड़े में किस तरह की फीलिंग होती है। यह वही लेखक जान सकता है जिसने घोड़े के साथ उम्र गुज़ारी हो अथवा जो खुद घोड़े को जिया हो। यह जो दर्द होता है मालिक के हाथ में, वो दर्द सारा का सारा सिमट कर घोड़े की आँखों में आ गया लगता है। यह दर्द माालिक की छिली हथेली से घोड़े की आँखों में उतरा और अंततः लेखक की लेखनी में उतर गया।

रत्नकुमार सांभरिया जब लिखते हैं तो यह नहीं सोचते कि वे मानुष हैं। वे लघुकथा के कथानक का अंग बन जाते हैं। वे चरित्र को जीने लगते हैं। कभी वे वृक्ष बनते हैं तो कभी वटवृक्ष। मानवेतर लघुकथा ‘अपने हाथ’ में उनका चारित्रिक विश्लेषण करेंगे तो रत्नकुमार सांभरिया कभी न पायेंगे। वटवृक्ष या वृक्ष को ही पायेंगे। यह लघुकथा सृजन नहीं, बल्कि एक पूरा दर्शन है। इसमें वृक्षों के जीवन के ऊहापोह का चित्रण है, उनके जीवनकाल में आयी निश्चिंतता का वर्णन है। यदि आप लघुकथा को पढ़कर कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं तो कृपया लघुकथा को दोबारा पढ़िये। आप अभी तक वहाँ नहीं पहुँच सके हैं जहाँ तक लेखक पहुँच गया है। कथानक वृक्षों के जीवन की कहानी नहीं बांच रहा। मानव जीवन की त्रासदियों को चित्रित कर रहा है। बेशक अडॉप्टेड वातावरण में ऐसा कुछ आभास न होता हो, किन्तु है कुछ ऐसा ही।

‘हरियाये वृक्षों की एक गुंफित  शृंखला थी। कुल्हाड़े हाथों में लिए कुछ लोग उन वृक्षों को काटने आ गए थे। सशस्त्र आततायियों को देखकर वृक्ष घबरा गये। उनके पाँव होते, इधर-उधर भाग खड़े होते। पंख होते उड़ जाते। हाथ होते मुकाबला करते। जड़ें थीं, गहरीं।

भयभीत वृक्षों ने वयोवृद्ध वटवृक्ष से समवेत स्वर में गुहार की-‘‘दादा, दुश्मन मौत बन कर आ रहे हैं, बचा लो, हमें।’’ (अपने हाथ)

रत्नकुमार सांभरिया जब ‘अहसान’  लघुकथा लिखते हैं तो वे निरीह बछड़ा बन जाते हैं। उनका बछड़ा होना गाय के दूध का सेवन करना नहीं, दर्द में विश्वास रखना है। खुर में कील ठुकवाने के लिए उन्हें बछड़ा होना होता है। उन्हें माँ मिले या न मिले, मर्म मिलना चाहिए। ‘सिकुड़ कर गठरी हो गया’ तथा ‘फड़फड़ी’ जैसे शब्द लघुकथा को एक नई हाइट से लबरेज करते हैं।

“नाल बाँधने वाले कारीगर ने अद्र्ध-चन्द्राकार लोहे को किशोर बछड़े के खुर पर रखा। उसके छेद में कील नुमाई और हथौड़ी की ठोंक दी। नुकीली कील खुर में घुसते ही बछड़े के सर्वांग पीड़ा बिजली-सी कौंध गई। सिकुड़ कर गठरी हो गया। भाग खड़ा होने के लिए उसने रस्सियों में जकड़े अपने पाँव छटपटाए। शरीर को फड़फड़ी दी। निष्फल।’’

विवश बछड़े ने व्यथित मन कील से अनुनय की-‘‘बहन, किस दुश्मनी तुमने मुझे कष्ट पहुँचाने का पुण्य कमाया?’’

‘अहसास’ प्रतिशोध की लघुकथा है, दुर्व्यवहार की गाथा है। यह प्रतिशोध अभी समाज में  द्रष्टव्य नहीं हैं। लेकिन यदि ऐसा होने लगा तो कप ही नहीं टूटेंगे, अपितु समाज के शेष बर्तनों से भी बास आने लगेगी।

‘‘सुदेश ने अपनी पत्नी से बलवंत का परिचय कराया-‘‘याद करती थी न, खूब। यही हैं, मेरे दोस्त बलवंत लाल। जाति से चाहे नीचे हैं, रहन-सहन, खान-पान, बोलना-बतियाना ऊँची जाति वालों से कतई कम नहीं है। फक्र है ऐसे दोस्त पर।’’

उसकी पत्नी चाय-नाश्ता ले आई थी।

बलवंत चाय-पानी पीकर गेट से बाहर निकला तो सुदेश की पत्नी ने उन कप-प्लेटों को तोड़ दिया, जिन्हें बलवंत ने इस्तेमाल किया था। वह खून का घूँट पीकर रह गया था।’’ (अहसास)

लघुकथा लिखते हुए सहजता जरूरी है। अधिक मुखरता सृजन को कमजोर कर सकती है। सांभरिया लघुकथा को लिखते वक्त उसके कंटेन्ट को ध्यान में रखते हैं और पात्रों के भीतर प्रवेश कर जाते हैं। उनकी लघुकथा ‘आईना’ बोधकथा के पैमाने को छूकर निकली है। लघुकथा में खरखराने तथा रिपसता-रिपसता जैसे शब्दों का प्रयोग अलग ही आकर्षण उत्पन्न कर देता है।

एकांत पाकर चिड़ा आईने पर आ बैठा। वह अपनी चोंच खरखराने के लिये उस पर झुका। उसे आईने में बलिष्ठ देहयष्टि का एक चिड़ा दिखाई दिया। उतना ही तगड़ा-ताजा, जितना वह है।

            एकाएक एक शंका से चिड़े का सर्वांग सुलग उठा था, ‘‘ओह, यह उसकी संगिनी की करतूत है। मेरी अनुपस्थति में यह मेरा विकल्प है। वह जितनी भोली-भली है, उतनी ही बेवफ़ा है। मेरे पत्नीव्रत होने का यह सिला! कपटाचार।

पस्त चिड़ा आईने से रिपसता-रिपसता नीचे आ गिरा था।

दम तोड़ता चिड़ा खुश था, उसने गैर को परास्त कर दिया है।’’ (आईना)

सांभरिया नहीं मानते। गर्ज़ कि तवा हो गये हैं। खुद को जलाने लगे हैं। रोटी से बहस लड़ाने लगे हैं और इस बहस में वे इशारा कर बैठते हैं कि बड़ा वही होता है, जो खुद को होम कर देता है। दूसरों के सुख के लिए। इतनी बड़ी बात कहने के लिए वे यह भी परवाह नहीं करते कि उनकी लघुकथा को बोधकथा होने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

सांभरिया की लगभग हर लघुकथा संदेश देती है। लघुकथा ‘आटे की पुड़िया’ में कष्टों का विवरण है। दर्द का विस्तार है। लघुकथा में मजदूरिन आटे की पुड़िया को सोने के सिक्के की माफ़िक रखती है। लघुकथा वर्णनात्मक है। लघुकथा का अंत किसी नतीजे की घोषणा करता प्रतीत नहीं होता, अपितु कष्टों के भीतर कष्टों के साथ कलपता हुआ मौन ही सिधार जाता है। सिधारता भी कहाँ है। वह मजदूरिन तो कत्र्तव्य निभा रही है तो लघुकथा का अंत भी पल-प्रतिपल नये संघर्ष के अन्वेषण में सिसकता प्रतीत होता है। प्रतीति है तो मजदूरिन के बच्चे के प्रति, बच्चे की माँ के प्रति और उस दर्द और संघर्ष के मार्ग के प्रति, जिसे उन्होंने स्वयं चुना है।

लघुकथा में ये अपने मुहावरे स्वयं गढ़ते हैं-माँ सींक सी, बेटा कांटे सा तथा भूख बड़ी, दुनिया छोटी और मजदूरिन के आँचल दूध उतरे आदि। ये मुहावरे नैरेशन में देते हैं और लघुकथा का प्रवाह अवरूद्ध होने का खतरा मोल लेने में भी संकोच नहीं करते।

‘‘मजदूरिन के पास मात्र पाँच रुपये हैं, वह आटा खरीदे या ….? वह बच्चे को लिए दुकान से थोड़ी दूर खड़ी थी, दुकान की ओर आँख लगाए। दुकान पर मौजूद ग्राहक जब चले गए, मजदूरिन ने अपनी अंटी खोली। पाँच रुपए के मुड़े-तुड़े नोट की सलें ठीक कर वह दुकान पर गई। उसने दुकानदार की ओर जितनी जल्दी हाथ बढ़ाया, उतनी ही लंबी साँस मारी, व्यथाभरी-‘‘सेठजी, आटा तोल दो।’’

दुकानदार ने गरीबी की मुखबिर-सी मजदूरिन की ओर तटस्थ भाव से देखा-‘‘पाँच रुपए का आटा? कितना-सा आएगा?’’

तोल दो। उसने सेठजी का बिगड़ा चेहरा देखा। तराजू देखी। गर्दन नीची कर ली।’’ (आटे की पुड़िया)

सांभरिया की लघुकथा ‘आदमी’ लेखक की जिद की कथा है, जिसने कथा के आरम्भ में ही आदमी की नीयत पहचान कर उसे भिखारी घोषित कर दिया। यह एक ऐसे भिखारी की कथा है जिसे सत्ता हमेशा भिखारी बनाये रखना चाहती है और इन दोनों से अधिक यह सत्ता की एक कथा है जिसे बाँटों और राज करो की नीति सदैव भाती आयी है। सांभरिया ने इन तीनों कोणों को जम कर टटोला है।उनकी भाषा का जादू भी यहाँ जम कर चला है-धरती बिछाते थे, आसमान ओढ़कर सोते थे, जगह गंदाई है। नाक भींचे निकलते हैं जैसे वाक्यों का सुनहरापन यहाँ भी देखने को मिलता है।

‘‘मंत्री ने अपने नेताई अंदाज में भिखारी नेता को सहलाया-‘‘भिक्षावृत्ति उन्मूलन के लिए सरकार अभियान चलाकर उनके पुनर्वास की योजना पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर रही है। आपको सहयोग करना चाहिए।………………..पशुओं के साथ रहते इज़्ज़त नहीं है। रही बात उनके सींग पैने करने की, चिंता मत करो। हमारे पास बंदूकें हैं।’’ मंत्रीजी ने भिखारी नेता का कंधा थपका-‘‘जाओ, निजी सचिव से मिल लो।’’

दूसरे दिन चैराहे पर जलसा था। भिखारी नये-नये परिधान पहने स्टेज के नजदीक बैठे थे। भिखारी जिसको सबने अपना नेता चुना था, सफेदपोश बना मंत्रीजी के पास स्टेज पर विराजमान था।

आक्रोशित और आहत पशु दूर खडे़ खोखिया रहे थे।’’ (आदमी)

कभी-कभी सांभरिया जी साधारण से लगने वाले कथानक को भी अत्यन्त सावधानीपूर्वक सजाते हैं। फलस्वरूप लघुकथा एक मैसेज देने की कोशिश करती प्रतीत होती है। उनकी लघुकथा ‘अपना अपना संसार’ देखी जा सकती है जो एक शिशु पक्षी और उसकी माँं के बीच के सम्बन्धों का खाका खींचती है। ये सम्बन्ध इतने गहरा गये हैं कि शब्द कम पड़ जाते हैं किन्तु भीतर की संवेदना कम होने का नाम नहीं लेती। हालाँंकि यह सर्वविदित तथ्य है कि युवा होने के बाद पक्षी बहुत दिन अपनो के साथ नहीं गुज़ारता तो भी सांभरिया जी स्त्री पक्षी की उस मूक संवेदना को परिभाषित करने की चेष्टा करते हैं। इस तरह यह लघुकथा मानवेतर नहीं स्त्री मानव मन की पड़ताल करने लगती है।

            ‘सूरज डूब गया था। रात गहरा गई थी। रात बीत रही थी। चिड़ी घोंसले के द्वार पर अपनी चोंच टिकाये, ममता का चिराग जलाये बैठी थी। बच्चे की चिंता, उसकी आँखें अश्रुवर्षण कर रही थीं। मन तड़प रहा था। बच्चे की बाट जोहते उसने पूरी रात आँखों में काट ली।

वह नहीं आया था। उसके संसार के समक्ष घोंसला छोटा था, अब।’ (अपना अपना संसार)

सांभरिया जी अपनी लघुकथा ‘आवरण’ में मुखौटों की वकालत करते नज़र आते हैं और यह नाहक ही नहीं है। जब वे आवरण रचते हैं तो उनके संज्ञान में जंगल में पायी जाने वाली भेड़ें नहीं, कंकरीट के जंगलों में मिलने वाली भेड़ें होती होंगी। यह लघुकथा हमारे वर्तमान संकट को प्रदर्शित करती है। यदि यह लघुकथा उपदेशात्मक नहीं है, तो सांभरिया जी प्रशंसा के पात्र हैं। मेरे विचार से इसे उपदेशात्मक बनाने का विचार उनके मन में आया भी नहीं होगा। और ऐसा होना भी नहीं चाहिए। यह एक सच्चाई है और इसके अपने खतरे बेशक होते हों लेकिन उपदेशात्मक होने की घोषणा करने से बड़ा खतरा कोई नहीं होता होगा।

देश में जातिगत व्यवस्था के तेवर जिस भाँति तारी हो रहे हैं, उसे देखते हुए सम्मान के साथ जीना एक दुष्कार्य बनता जा रहा है। ऐसे में मुखौटों का अस्तित्व बेशक एक औषधि प्रदान करता हो, किन्तु यह इलाज नहीं है और निश्चित रूप से यही कारण रहा होगा सांभरिया जी के समक्ष लघुकथा ‘आवरण’ लिखते वक्त।

‘भेड़ दम्पती लौटा तो उनके शरीर पर भेड़िया-आवरण था। वे गली मोहल्ले से निकलते। कुत्ते, कुत्तियाँ और उनके पिल्ले उनको देखकर घरों में घुस जाते। भाग खड़े होते। ज़मीन पर लेट दुम हिला-हिला उनका अभिवादन करते। अपनी जान की खैरियत चाहते।

दम्पती को पश्चाताप था।पहले चेते होते, न उनकी वंश संपदा का विनाश होता, न ही उनका स्वाभिमान मरता।’ (आवरण)

रत्नकुमार सांभरिया यर्थाथवाद के पोषक हैं। उनका यर्थाथवाद उनकी लघुकथाओं के शब्द-शब्द में झलकता है। ‘आस्था’ ऐसी ही यथार्थवादी लघुकथा है, जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ रचा है। लघुकथा में जो चींटियां हैं, वे सांभरिया जी की सहयोगी हैं। चींटियाँ लघुकथा के आरम्भ में ही बता देती हैं कि ये पड़ोसी की दहलीज के भीतर नहीं रहने वालीं। ये दहलीज के बाहर निकलेंगी। लेखक के रुकने से भी नहीं रुकने वाली। और ऐसी कोई कोशिश भी नहीं करते दिखते। चींटियों का एक समर्पण हैं। उनका एक समाज है। मानवों का समाज नहीं होता। न ही समर्पण होता है। उनका तो स्वभाव होता है। और यह स्वभाव उन्हें चींटियों से भी पिछड़ा हुआ बनाता है।

            ‘‘बरसात हुई और चींटियों के बिलों वाली नीची जगह में पानी भर गया। मरता क्या नहीं करता। चींटिया ने रातों-रात अपना दूसरा बसेरा ढूँढ लिया था।

                        उसने सुबह उठकर देखा। उसके गेट के पास जो ऊँची जगह थी, वहाँ चींटियों ने अपनी बिलें बना ली थीं। बिलों से उनकी आवाजाही अनवरत जारी थी।’’ (आस्था)

                        घर के बूढ़ों के साथ व्यवहार पर आधारित लघुकथा ‘एक और एक ग्यारह’ अपनी भाषा और शिल्प के कारण चिह्नित की जा सकती है। लघुकथा में बाढ़ के द्वारा अपने ही खेत को खाने का इधर अपने भारतवर्ष में चल रहे ट्रेण्ड का उदाहरण मिलता है। यह जो मुल्क हैं न, उसमें नयी जमात आजकल भरोसे की नहीं रह गयी है। वो जब कुछ नहीं होता है तो उसे सब कुछ चाहिए होता है और जब वो कुछ बन होता है तो उसे एक ही चीज चाहिए होता है जो उसे अपनी संगिनी में मिल जाता है।

जब वो कुछ बन जाती है तो उसे वो सब नहीं चाहिए होता है, जो उसने माँ-बाप से सीखा होता है।

            ‘‘क्षुब्ध बूढ़ी ने शिकायती निगाह बूढ़े की ओर लखा-‘‘मुझ से लड़-झगड़ कर दंभ भरे गये थे न, बेटे के पास दिल्ली   रहूँगा।

            पत्नी के तंज का प्रत्युत्तर, आत्मग्लानि और रोष से हिलती बूढ़े के चेहरे की झुर्रियाँ थीं। उसका कंठ रुंध गया, बुदबुदाते होंठ पीड़ कर पी कर रह गये थे।’’

उनकी लघुकथाओं में दलित विमर्श आसानी से मिल जाता है। सदियों से पंडितों के द्वारा समाज पर हुकूमत करने का चित्रण उनकी लघुकथाओं में मिलता है। ‘कर्म’ लघुकथा कुछ इसी तरह का मैसेज देती है। साधारणतया सोच यही है कि दलितों की खराब स्थिति ब्राह्मणों के द्वारा ब्राह्मणों के लिए बनायी गयी है। इसलिए इस प्रकार की रचनाओं में ब्राह्मणों के द्वारा किये गये अन्यायों का सचित्र वर्णन दृष्टिगत होता है।

‘‘चारावाली ने उसकी हाँफी देखी। सहज होते हुए आग्रहपूर्वक अनुरोध किया-‘‘दादीजी, आप तीसरी मंजिल से नीचे आती हैं। आपका शरीर दोहरा है। उतरते-चढ़ते तकलीफ होती है। आपके नाम पर मैं गायों को चारा डाल दिया करूँगी। सप्ताह दस दिन में हिसाब कर लेंगे और लोग भी……….। आप गायों से लिपट-लिपट रोज साड़ी भी गंदी कर लेती हैं।’’

पंडिताइन ने  होंठ बिचकाए। हाथ नचाया। चिनकी उठी-‘‘बावली हुई है। धर्म हाथ का। गौ-माता के बारे में ऐसी अधर्मी बात मत निकालना मुँह से सेवा करती साड़ी खराब कर लेती हूँ। कह देती हूँ, हाँ।’’ (कर्म)

कतिपय लघुकथाएँ ऐसी हैं जो अपने समय की चुस्त रचनाएं रही होंगी, किन्तु कालांतर में इसी प्रकार की अनेक रचनाएं आ जाने के कारण नये पाठक को मूल रचना में वह स्वाद नहीं आ पाता है जो इसके लिखने के समय रहा होगा। यह विचित्र स्थिति है और इससे बड़े से बड़े लघुकथाकार को गुज़रना पड़ता है। फिर भी रत्नकुमार सांभरिया की लघुकथा ‘किरचें’ राजनीतिक और मंजे हुए चरित्रों के प्रस्तुतीकरण के लिए अलग से पहचानी जा सकती है।

‘‘उसकी गर्दन लटकी थी। धीरे से बोला-‘‘साहब, सुबह दस बजे से शाम पाँच बजे तक पंडाल में इतनी भीड़ थी तिल गिरने की जगह नहीं थी।’’ वह अपने बूढ़े हाथों धोती का छोर लेकर चश्मे के काँच पोंछने लगा था।

‘‘जब इतना पैसा फुँक गया, ठेकेदार को थोड़ा रुपया और देते, भीड़ रुक जाती।’’

‘‘हमने लाख कोशिश की साहब। उसके पाँवों पगड़ी तक रख दी। तैयार ही नहीं हुआ, वह।’’

‘‘क्यों?’’ अध्यक्ष ने क्रोधित मुद्रा में अपनी कार की ओर बढ़ते हुए पूछा।

उम्मीदवार रुँधे कण्ठ बोला-‘‘साहब, शहर में अभी छह बजे दूसरी पार्टी का जलसा है।’’ (किरचें)

सांभरिया जी के भीतर एक आक्रोश है, जिसके स्वर उनकी लघुकथाओं में उनके द्वारा क्रिएट किये गये प्रधान चरित्रों के माध्यम से प्रस्फुटित होते हैं। उनकी लघुकथा ‘कोड़ा’ ऐसी ही है जिसकी प्रमुख पात्र ‘पतिया’ है। ‘पतिया’ के भीतर ज्वाला सुलगती है जो उसे बिल्कुल अलग चरित्र घोषित करती है। जिसके कारण लघुकथा अविस्मरणीय बन गयी है।

            ‘‘मालकिन ने अपने मुँह में दबी पान की गिलौरी को चुभला और नाक छिनक कर कहने लगी-‘‘ऐ पतिया, देख तेरी बक-बक सुनने के लिए मेरे पास टेम नहीं है और सुन, ऐसी मुँहजोर भी पसंद नहीं है, मुझे। कल से पोंछा-बर्तन को मत आना, तू।’’

लाख रोकते पतिया के अंदर का आक्रोश दब नहीं पाया। वह मालकिन उसे बेहद खुदगर्ज और जाहिल लगी। पतिया दो क़दम आगे बढ़ी और मालकिन के हाथ में रुपये थमाकर बोली-‘‘ऐ री बीबीजी, हम तुम्हें पूरे महीने की तनखा दिये देती हैं, तुम एक दिन हमारे घर पोंछा-बरतन कर आओ।’’ (कोड़ा)

‘‘गुंडई’’ सांभरिया जी की वह लघुकथा है, जो वर्दी की कलई खोलती है। बूढ़ों की व्यथा अपने सपूतों द्वारा ठुकराया जाना ही नहीं होती, प्रशासन से भी परेशान है। लघुकथा में किस्सागोई आकर्षित करती है। भाषा तो खैर इनकी गज़ब की है ही।’’

            ‘‘एक दिन बूढे़ और बुढ़िया दोनों ने हिम्मत बाँध ली। वे अपनी-अपनी लकड़ी टेकते, हाँफते-धूजते थाने चले गए। दरोगा दिखे कि वे उनके पाँवों में गिर पड़े। बूढ़े ने उनको अर्जी पकड़ाई। झुर्रियों से अटीं, डबडबार्इं आँखों को मिचमिचाते हुए उसने व्यथा-कथा दरोगा को सुना दी।

            बुढ़िया ने अपनी आँखों की पानियाँ पोंछते हुए दरोगा से गुहार की-“बेटा, गुण्डों से हमारी इज्जत बचा लो।“

अधेड़ावस्थी दरोगा का रात-बिरात वृद्ध दम्पती के घर आना-जाना शुरू हो गया था।’’

साम्प्रदायिकता की आग को ‘घोंसला’ जैसी लघुकथा के माध्यम से व्यक्त करना रत्नकुमार सांभरिया जैसे कुशल लघुकथाकार का ही कौशल है। पूरी लघुकथा में साम्प्रदायिकता का कहीं भी ज़िक्र नहीं है। अंत में चिड़ी जब वेदनापूर्वक बस्ती में घोंसला न बनाने के अपने अनुरोध का स्मरण चिड़े को कराती है तभी यह जाहिर होता है।

‘‘चिड़ी ने फुँक रहे घरों की ओर देखा, जल कर ठूँठ हो गये अपने आश्रयदाता वृक्ष के प्रति सहानुभूति प्रकट की और चिड़े को आग्नेय नेत्रों से घूरती हुई बोली-‘‘मैंने तो पहले ही मना किया था, बस्ती में घोंसला मत बनाओ, अब।’’

‘चश्मा’ शानदार लघुकथा है, जो भारतीय लालफीताशाही और विभागों@कार्यालयों में चल रही अव्यवस्थाओं का पुरजोर ढंग से पोल खोलती है। लघुकथा व्यंग्य करती है भ्रष्ट आचरण पर और पाठकों को यही प्रतीत होता है कि एक सामान्य सा किस्सा है सांभरिया जी ने किस्सागोई अंदाज़ में पिरोया है।

‘फूँक- फूँककर क़दम रखते दो वृद्धजन आए। फूँक  उड़े उनकी देह थीं। बाबूजी का चश्मा और खुला काग़ज़ देखकर वे आश्वस्त थे। बाबूजी बस आते ही हैं। हालाँकि वहाँ कुर्सियाँ पड़ी थीं, उन्होंने अपनी गरज और गँवई गरिमा के मद्देनज़र धरती मैया पर बैठना उचित समझा। वे दोनों हाथ जोड़ कर वहीं आस लगा कर बैठ गए और उम्मीदभरी निगाह कुर्सी की ओर देखते रहे, बाबूजी अब आए।’’

चपड़ासी आया और उसने अपना वही वाक्य दोहराया-‘‘बाबूजी अभी-अभी बाहर गए हैं। उनका चश्मा रखा हैं। काग़ज़ खुला पड़ा है। आएँगे ज़रूर। बाहर बैठो।’’

शाम होते नेत्रहीन, मूकबधिर, निःशक्त, अशक्त और वृद्धजनों का हुजूम हो गया था। रोज-रोज की परेशानी से अच्छा है, आज बाबूजी से मिल कर ही लौटें। उनका चश्मा रखा है। काग़ज़ खुला पड़ा है। ‘‘आएँगे ज़रूर।’’ (चश्मा)

पत्रकारों का दायित्व निरपेक्ष भाव से पत्रकारिता करना होता है, बिना किसी दवाब के। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ कहा जाता है। यदि मीडियाकर्मियों को चुग्गा खाने की आदत पड़ जाये तो? सांभरिया जी की लघुकथा ‘चुग्गा’ में एक पत्रकार को यही रोग लगा है। लघुकथा नैरेशन में है और पुराने ट्रीटमेंट के बावजूद अपने कथ्य के कारण आकर्षित करती है। राष्ट्रहित में ऐसे कथानक वाली लघुकथाओं की बहुत जरूरत है। आजकल के मोबाइल युग में भी इस तरह के प्रस्ताव पत्रों के माध्यम से आते होंगे इसमें संदेह होता है। लघुकथा बतलाती है कि सत्ता के सामने इस प्रकार की पत्रकारिता हमेशा से एक चुनौती रही है।

‘‘लेखक को अगले दिन पत्र मिला। उन्होंने उसे खोलकर पढ़ा। उनकी आँखें पत्र से चिपक गईं। उन्हंे यक़ीन नहीं हो रहा था, सरकार ने उनको अपनी साहित्यिक संस्था का अध्यक्ष बना दिया है।

सहसा वे आनंदित हो हवा में तैरने लगे। दफ्तर, आवास, स्टॉफ, कार, नौकर-चाकर और मासिक पत्रिका। नामी-गिरामी साहित्यकार ढोंक देंगे। वाह! वाह!! अच्छे दिन आ गए हैं।’’

सांभरिया जी में गज़ब की किस्सागोई है। ‘चुनाव प्रचार’ कुछ इसी प्रकार की लघुकथा है। चुनाव के प्रचार जैसे विषय को लेकर उन्होंने पूरी चुनाव प्रणाली पर ही तंज कसा है।

‘‘एक सभा-स्थल पर अजूबा हुआ। नेताजी मंच पर तुल रहे थे, उनका वज़न बढ़ गया। आयोजकों की चिंतित, आश्चर्यभरी सवालिया निगाहें एक-दूसरे पर अटक गयीं, ‘कैसे हो? क्या करें? और सिक्के कहाँ से लायें? उनमें उतना ही वज़न होता था, जितने बोरी में सिक्के।

दर्शक कुछ देर उत्सुक और उत्साही रहे। तराजू के दोनों पलड़े बराबर नहीं हुए, तो उनके धैर्य का बाँध टूट गया। उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया। नेताजी और उनकी पार्टी के खिलाफ हाय-हाय के नारे लगा दिये।

नेताजी सुर्ख हुए पलड़े से उतरे और आयोजन समिति पर आग बबूला हो उठे। क्षमा माँगने पर भी जब वह शान्त नहीं हुए, उनके एक हमप्याला से नहीं रहा गया। उसने याद दिलाया-‘‘साहब रात दारू कम पड़ गई तो आपने ही कहा था न, कार में पड़ी बोरी में से सिक्के निकालकर ले आओ।’’ (चुनाव-प्रचार)

वे अपनी लघुकथाओं में कभी-कभी पात्रों की बेबसी का ऐसा वर्णन करते हैं कि आँखें चौधिया जाएँ। उनकी लघुकथा ‘चौकीदार’ एक ऐसी ही लघुकथा है। लघुकथा में ‘मुँह चुभलाते हुए मेरी ओर आँखें टिमकाईं’ और ‘धूजते हाथों’ जैसे वाक्यांश-शब्द उनकी सम्पन्न शब्द सम्पदा को दर्शाते हैं। इन पर गर्व किया जाना चाहिए।

‘‘जिस कॉलोनी में मैं पहले रहता था, वहाँ दस रुपए माहवार चौकीदारा देता था। यहाँ के चौकीदार की शख्सियत और लॉकेलिटी देख, मैंने बीस रुपए उसकी ओर बढ़ा दिये।’’

उसने जेब में से गुटके का पाउच खींचा। चुटकी से फाड़ा। मुँह में फांक गया, समूचा। मुँह चुभलाते हुए मेरी ओर आँखें टिमकाईं-‘‘सर पचास रुपए और दे दीजिएगा, आप?’’

‘‘सत्तर  रुपये?’’ मैं चौंका। ‘‘ज्यादा है?’’

‘‘सर आपके छोटा बच्चा भी है, न एक। उसके भयावह चेहरे पर कुटिलता उभर आई थी।

मेरे नथूने काँपने लगे। पलकें नम हो आई थीं। दो माह की इकलौती बिटिया है, मेरी।

उसे पचास पये पकड़ा कर मैंने धूजते हाथों गेट बंद कर लिया था।’’

सांभरिया की लघुकथा ‘‘जानवर’’ के चरित्रों की बात करें तो एक ही परिवार के सभी सदस्य उनके घर घुसे सिपाही नाम के जानवर के बारे में जानते हैं और बात करते हैं, लेकिन बोलने का बीड़ा उठाता है एक किशोर वय पात्र। सांभरिया जी की महारत है उनके पात्रों की महानता या जिस किसी पात्र के हिस्से के संवाद होते हैं वही सामने आता है अथवा मौके की नज़ाकत भांपकर ही किरदार उपस्थित होता है, यह विस्मयकारी है। लघुकथा में तरुण ने जो कहा वह खानाबदोश मुखिया भी कह सकता था। तरुण तो एक है जिसे लघुकथा में लाना या न लेकर आना लेखक पर निर्भर करता है। अब या तो लेखक ही इतना असहाय हो जाता है लिखते समय कि किरदार खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं और अपने हिस्से के संवाद बोलते चले जाते हैं अथवा लेखक खुद ईमानदारी से किरदारों को चुनता है और उनके  संवादों को गढ़ता है।

‘‘नहीं साब! हमें डर लगता है। बहुत डर लगता है, साब!’’ गुहार करता असहाय खानाबदोश रुआँसा हो गया था।

‘‘किसका?’’ सिपाही ने आँखें फैला कर जिज्ञासा प्रकट की।

सिपाही की कदाचारी देखकर तेरहेक साल के खानाबदोश लड़के ने सिपाही को घूरते ज़मीन में अँगुली  धँसा दी-‘‘है एक जानवर।’’ (जानवर)

सांभरिया जी की ‘जीने की राह’ से परिचय ‘हंस’ मासिकी के माध्यम से हुआ। लघुकथा में सांभरिया जी का मुख्य पात्र सारी दुनिया को रुलाता है। वह दर्द में है पर दर्द से बेखबर है। उसे दर्द से तब राहत तब मिलती है जब घर पर उसकी पत्नी उसके दर्द को बांटती है। लेकिन थोड़ी ही देर में उसका दर्द फिर बढ़ जाता होगा क्योंकि तब एक घोड़े की चर्चा हम उसके मुँह से सुनते हैं। घोड़ा भी दर्द के मारों में होता है, लेकिन उसके पाँंवों में लोहा ठोंक दिया जाता है, जिससे उसे दिन भर सर्दी, गर्मी, बरसात, पत्थर, पानी, रेत, मिट्टी में चलते हुए दर्द कम हो। इसी की कामना मुख्य पात्र करता है और अपने लिए जूती खरीदने से पत्नी के प्रस्ताव का मुस्कुरा कर ठुकरा देता है। दर्द और पीड़ा का जो मार्मिक वर्णन सांभरिया जी ने किया है वह मुख्य पात्र के साथ आपको भी रुला जाता है। सांभरिया जी जो भाषा लघुकथा में प्रयुक्त करते हैं, वह अतुलनीय है। जो लघुकथा लिखने की राह प्रदर्शित करती है।

‘‘पति की दयनीयता देखकर उसका मन भर आया। विस्फारित नेत्रों में आँसू डबडबाने लगे। रोती-सी बोली-“अभी जाकर जूतियाँ पहन आओ। यूँ कितने दिन जी पाओगे?”

उसने अपने हड़ीले चेहरे में धँसी छोटी-छोटी आँखों को टिमटिमा कर पत्नी को समझाया-“इस काम में जूतियाँ चार दिन नहीं पकडे़ंगी। पैसे बेकार। तैनाल वाले के पास जाऊँगा कल। वह घोड़े की तरह मेरे पंजों में भी लोहा ठोंक दे।”

‘तमाचा’ में एक नेकलेस की संघर्ष गाथा का सारांश हथौड़ी के माध्यम से व्यक्त है। यह मात्र कुछ ही शब्दों में है और वार्तालाप शैली में है। यह सब सांभरिया के बस का ही है। वस्तुतः सांभरिया जी का आशय है कि बिना कथानक के संवाद अदायगी भर से भी लघुकथा कही जा सकती है और काफी कुछ कहा जा सकता है।

‘‘यह मत भूलो, तुम्हारा यह सुंदर बदन मेरी ही चोटों की परिणति है? हथौड़ी ने बड़ी अहमियत से नेकलेस की बात का प्रतिवाद किया।’’

यह सांभरिया की इच्छित शैली है कि बाल और कैंची परस्पर संवाद आरम्भ कर दें और लघुकथा बना दें।

‘‘बालों की बेतुकी बात कैंची के रति-मासा गले नहीं उतरी। बोली-‘‘भैया, तुम अकेले ही कटते हो, मैं नहीं घिसती हूँ क्या, तुम्हारे साथ? मेरी काया वह कहाँ रह गई, जैसी थी।’’

दूसरी ओर, जहाँ कहीं सांभरिया जी अपनी लघुकथा के लिए जीवंत कथानक बुनते हैं, वहाँ वे अपने भीतर की संवेदना सारी की सारी उलट देते हैं, कथानक में। उनकी लघुकथा ‘ताला’ को इसके लिए पढ़ना होगा, जहाँ पर कोई मैसेज उनकी लघुकथा नहीं छोड़ती पाठकों के लिए। सिवाय  संवेदना के। यह संवेदना ही लघुकथा की जान बन जाती है।

‘‘पत्नी की तेरहवीं को दूसरा दिन था। आँगन आँसुओं से गीला रहा, पूरे दिन। रात दस बजे थे। कॉलेज जाती अपनी लड़की और स्कूल जाते लड़के को रामधारी ने अपने पास बैठाया। उसने एक-एक के सिर पर वात्सल्य से दोनों हाथ फेरे। बायाँ बाप का हाथ। दायाँ माँ का हाथ।

उनको ढांढस बंधाते वह कहने लगा-‘‘जब तुम्हारी माँ थी, घर खुला रहता था।’’

जेब से ताला निकालकर सामने रख दिया। चाबियाँ लीं तथा लड़के और लड़की को एक-एक संभलाकर कहने लगा-‘‘ताला ले आया हूँ। तीन चाबियाँ हैं। हम सबके पास एक-एक चाबी रहेगी। पहले आएगा, घर का ताला खोल लिया करेगा।’’ (ताला)

जातिगत शोषण के विरोधस्वरूप ‘दंश’ जैसी लघुकथाएँ उपजती हैं।

‘‘एक चिड़ा झोंपड़ी की छान पर बैठा अपनी चोंच खरखरा रहा था। उसने आँखें रोककर टकटकाया। उड़ा और दाना खींच कर ले जा रहे चींटे के निकट आ बैठा था। चींटे से दाना छीना, चोंच में भरा और फुर्र उड़कर फिर छान पर जा बैठा था। चोंच मार-मार उसने दाने को तोड़ा और ग्रास-ग्रास खा गया था।’’

सांभरिया को विरोध की चाशनी पसंद है। बाप-बेटे के द्वंद्व के बीच उन्होंने विरोध के स्वर को प्रमुखता दी है। यह स्वर उनकी लघुकथा ‘दो मुँह’ में शिद्दत से महसूस किया जा सकता है जिसमें पिता को अपनी होने वाली बहू के प्रोफेशन, शौक पर एतराज है। लघुकथा पर इसके काल को लेकर बयानबाजी की जा सकती है, लेकिन देखा जाये तो आधुनिक होने के बाद भी घरों में इस प्रकार की दिक्कतें पुत्र के समक्ष उपस्थित हो जाती हैं, जिनपर लेखकों को ध्यान जरूर जाता है भले ही परिणाम पुत्र के पक्ष में हो अथवा पिता के पक्ष में। यहाँ लघुकथा में पुत्र के संकल्प से पाठकों को अवगत करा दिया जाता है, लेकिन क्या हम इसी प्रकार के पुत्रों के हर काल में दर्शन करेंगे। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि पुत्र माँ-बाप का विरोध न करके उनकी अपने पक्ष में सहमति बनाकर इतिहास रचे?

‘‘बेटे की पसंद सुनी कि वे अवाक रह गए। शौहरत और धन-दौलत का नशा, प्रतिष्ठा और जात्याभिमान मानो दफ़न हो गए थे, उनके। मन दुःखी हुआ। लड़के का मुँह नोच ले। उन्होंने उम्र की परिपक्वता और पिता की गरिमा को सहेजा। लड़के के कंधे पर सहज भाव हाथ रखा और चेहरे पर नम्र भाव लाते हुए बोले-‘‘पश्चिमी संस्कृति में मत ढलो बेटा, संतान की शादी माँ-बाप का दायित्व है।’’

‘‘द्रोणाचार्य ज़िंदा है’ एक गुरु की हीनभावना और जातिगत मनोवृत्ति को प्रकट करती है। परीक्षा का परिणाम बनाते समय एक मोची के पुत्र के अंक को सर्वाधिक देखकर वे उसके अंकों में संशोधन करते हैं और उसे अनुत्तीर्ण घोषित कर देते हैं। परिणामस्वरूप उस बेचारे को बाप का पुश्तैनी व्यवसाय संभालना पड़ता है।’’

इस छोटे से कथानक को फैलाव बहुत विस्तृत है। इतना विस्तृत कि इस सोच के भीतर ढेर सारे प्राध्यापक आ जाते होंगे। लघुकथा काफी पहले लिखी गयी जब इस प्रकार की निकृष्ट सोच आम हुआ करती थी। सोच अब समाप्त हो गयी होगी, इसमें संदेह है। बड़े शहरों में तो लोगों के पास फुर्सत ही नहीं है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में यह सोच अब भी प्रभावी है और यही कारण है कि इस प्रकार की लघुकथा अब भी प्रासंगिक हो रही है। सांभरिया जी अपनी लघुकथाओं में होने वाले वार्तालाप को बखूबी चित्रित करते हैं और जहाँ वार्तालाप न होकर नाटक की भाँति सूत्रधार वाली स्थिति होती है, वहाँ भी अपने संग्रहणीय शब्दकोश के माध्यम से परिस्थितियों का निर्वाह इस प्रकार कर जाते हैं कि लघुकथा अविस्मरणीय बन जाती है।

‘‘मेरिट लिस्ट बनाते उनके मन-मस्तिष्क पर एक गहरी चोट लगी। ना चुही, ना  नील उपड़ी। टीस उठी। कुछ देर तक वे अनमने से बैठे रहे, फिर अनापेक्षित चिन्ता से झुलसे और शनैः-शनैः उनकी चिंता कुत्सा में परिणित हो भभक उठी-”रामदीन! स्साला मोची का पूत! इतने अंक ले मरा, पूरी कक्षा के सिर पर चढ़ बैठा। मेरे खुद के लड़के से भी ऊपर। गाँव थूककर आंट देगा मुझे गुरुजी के लड़के से मोची का लड़का ज्यादा होशियार है, जिसका बुढ़ऊ बाप जूते सीं कर उसे पढ़ा रहा है।’’

सांभरिया जी के पास याद रखने लायक पात्र हैं। अधिकांशतः ये पात्र बिना नाम के हैं। नाम नहीं होता तो कोई याद रखने वाला भी नहीं होता। लेकिन कतिपय पात्रों का चरित्र-चित्रण स्मरणीय रह जाते हैं।

‘हार’ लघुकथा के उन दोनों पति-पत्नी के चरित्रों को स्मरण कीजिए जिसमें पत्नी के गले में महंगा हार देखकर पति की भृकुटी तन जाती है। यह हार पति की अनुपस्थिति में किसी हिस्ट्रीशीटर को बचाने के लिए अग्रिम भुगतान स्वरूप घर दीवाली के उपहारों में पर प्राप्त हुआ था।

स्व0 ध्रुव देवी को याद कीजिए जिसका पुत्र जीते जी उसकी बेकद्री करता है और उनके मृत्यु के उपरांत उनकी याद में  गाँव के स्कूल में हॉल बनवाता है।

पत्तू और पतिया की लघुकथा ‘हाथ’ को याद कीजिए जिसमें पतिया अपने पति के ऊपर इसलिए हाथ उठा देती है क्योंकि वह उसे शराब के नशे में मारता-पीटता है।

हरामी ‘हरिया’ उसकी पत्नी और दोनों युवा पुत्रों के हरामीपन टाइप के चरित्रों लघुकथा ‘हत्या’ को याद कीजिए जो मजदूर से घर पर मजदूरी कराते हैं, लेकिन उसकी मजदूरी को देने में आनाकानी करते हैं।

‘समीकरण’ के कर्मचारी यूनियन के उस नेता के चरित्र को याद कीजिए जो कार्यालय अध्यक्ष से वार्ता करने जाता है, तो बाँहों पर बंधी काली पट्टी खोल कर जाता है।

‘समझौता’ लघुकथा में आप थानेदार के चरित्र को कभी नहीं भूल सकते हैं जो दो सगे भाइयों के बीच झगड़े में से पैसा कमाना जानता है।

‘वजूद’ लघुकथा में रमिया का किरदार देखिए जो भूखी रहती है और अपने बच्चे का स्कूल जरूर भेजती है। साथ ही घाघ जमींदार के किरदार से उसकी तुलना कीजिये जो नहीं चाहता कि बच्चा स्कूल की किताबंे पढे़। साथ ही उस बच्चे के किरदार को भी आप भूल नहीं सकते जो जमींदार के द्वारा दिया रुपया फेंक देता है और अपनी किताब को उठा कर पढ़ने लगता है।

ये किरदार कहां से आए सांभरिया जी के पास? कैसे जन्म लिया इन्होंने? उपरोक्त किरदारों में ध्रुव देवी अबला है, मजदूर बेचारा है, रमिया बेचारी है। लेकिन साथ ही ध्रुव देवी के पुत्र का चरित्र काला है, मजदूर के शोषक भी लघुकथा में मौजूद हैं और जमींदार तो है ही शोषक।

तो इन लघुकथाओं में सांभरिया जी वर्ग शोषण का संघर्ष दिखलाने में पीछे नहीं हटते। लघुकथा में बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन जितना कहा जा सकता उतना कहने से सांभरिया जी पीछे नहीं हटते।

एक सवाल का जवाब उठने से पहले देना ज़रूरी है। किसी भी लघुकथाकार की अनेक लघुकथाएँ बने-बनाए फ्रेम से बाहर निकलने की कोशिश करती प्रतीत होती हैं और समीक्षकों की पेशानी पर बल डाल सकती हैं। कदाचित उनमें कथा न होने का आरोप लग सकता है। लेकिन कोई लेखक लिख रहा है और लगातार लिख रहा है, यही क्या कम है। वह क्या लिख रहा है और क्या लिख डाला है इसका मूल्यांकन तो किया जा सकता है परन्तु ख़ारिज़ करने का कार्य तो समय और पाठकों का ही होता है।

एक बात और हर काल में पाठकों का सोचने का ढंग अलग हो जाता है। यह उसकी बौद्धिक क्षमता पर निर्भर करता है। मनुष्य की बौद्धिक क्षमता लगातार बढ़ रही है। जिस रचना का मर्म तब समझ नहीं आया था, अब समझा जा रहा है। जो अब नहीं समझा या समझाया जा सकता उसे कुछ वर्षों बाद आसानी से समझा जा सकेगा। इसलिए रचनाएं देखकर तेवर नहीं, सिर्फ पहलू बदलें। पहले बदलें।

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