एक साल में इतना परिवर्तन. जहां चमचमाते बरतन, शानदार फर्नीचर और जानदार रहनसहन वाले मुलाजिम काम करते थे, वहां इतनी गंदा रहनसहन, गंदा माहौल और गंदे फर्नीचर देख कर वैभव चकित था, ” अरे कमल ! ये क्या हुआ ?”
” कुछ नहीं यार! धंधा पीट गया।”
” मगर, कैसे? तुम तो बहुत मेहनती, सूझबूझ और ईमानदारी से धंधा करने वाले आदमी थे. फिर धंधा कैसे पीट गया ?”
” आजकल मेहनत से कुछ नहीं होता है. ग्राहक भी तो आना चाहिए.” कमल ने गंदी टेबल को साफ करते हुए वैभव को बैठने का इशारा किया।
” तू तो हर समय अपना फर्निचर बदल दिया करता था? और ये ?”
“ हाँ यार ! उस समय धंधा अच्छा चलता था. मगर,…”
” मगर, अब क्या हो गया।? लोगों को खाना खाने को रोज चाहिए. यात्री रोज आते हैं. फिर तेरी होटल क्यों नहीं चल रही है ?”
” सरकार ने रोजगार लूट लिया?” कमल ने कहा, ” अब भूखों मरने की नौबत आ गई।”
” ऐसा क्यों कहता है यार? सरकार सभी को रोजगार देती है. लूटती नहीं है. ” वैभव ने कहा तो कमल ने एक चमचमाती वेलअपटूडेट गाड़ी की भीड़ की ओर इशारा कर दिया, ” अब वहाँ 5 रूपए में खाना दिया जाता है ,तो लोग यहां 50 रूपए की थाली में खाना खाने क्यों आएँगे.” कहते हुए कमल ने वैभव के सामने वही 5 रुपये की खाने की थाली आगे कर दी, ” ले तू भी खाना खा.”
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ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’,पोस्ट ऑफिस के पास,रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र
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