जून 2026

पाठकीयराजेन्द्र यादव एवं उनकी लघुकथाएँ     Posted: December 1, 2023

हिंदी के चर्चित एवं स्थापित कथाकार राजेन्द्र यादव कहानीकार के रूप में प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय भी हैं। उनका जन्म 28 अगस्त 1929 को आगरा (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे हिंदी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कहानीकार, संपादक एवं आलोचक हैं। हिंदी साहित्य में उन्होंने “नई कहानी” के नाम से नई विधा का सूत्रपात किया। हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध पत्रिका हंस के 1986 से मृत्युपर्यत संपादक रहे। आपकी प्रकाशित रचनाएँ हैं-‘देवताओं की मूर्तियाँ’ (1951), ‘छोटे-छोटे ताजमहल” (1962),’जहाँ लक्ष्मी कैद है’ (1957), ‘टूटना’ (1966) आदि; ये सब कहानी-संग्रह हैं। ‘सारा आकाश’ (1959), उखड़े हुए लोग (1956), कुलटा (1958), अनदेखे अनजाने  पुल (1965) एक इंच मुस्कान! (1965) उपन्यास हैं। अपने पार’, ‘हनीमून’, अपनी ही मूर्ति’, ‘सिद्धांत’, ‘सजा या सम्मान’, ‘पहला झूठ’ आदि लघुकथाएँ हैं। (विश्व लघुकथाकोश में बलराम ने राजेन्द्र यादव की नौ लघुकथाएँ संकलित की हैं। इनमें से पाँच-सजा या सम्मान’, सिद्धांत, अपनी ही मूर्ति, मरणकामना, आस्था आदि हंस’ में प्रकाशित हुई थीं। ‘अपने पार’ को भी बलराम अग्रवाल ने भारतीय लघुकथा कोश’ में संकलित किया था। हनीमून, पहला झूठ, प्रेमपत्र,प्रतिकार, मुक्ति, आत्महत्या, प्रेमिकाएँ, माँ की कमर तथा ‘पकड़ से बाहर एक क्षण’ आदि राजेन्द्र यादव की अन्य प्रकाशित लघुकथाएँ हैं।

राजेन्द्र यादव लघुकथा के विषय में अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं-“मैंने पाँच-सात लघुकथाएँ लिखी हैं। मुझे लगा, यह विधा बहुत कठिन है, मैं नहीं लिख पाऊँगा, लेकिन चुटकुले जरूर लिख सकता हूँ, जिनको मैं लघुकथा नहीं मानता, क्‍योंकि लघुकथा में लेखक मूल स्वर पकड़ता है। बड़ी कहानी को संक्षिप्त करके लिखना लघुकथा नहीं है।” राजेन्द्र यादव की वर्षों पूर्व की इस टिप्पणी के साथ ‘हंस’ और ‘इंडिया ट॒डे’ के वार्षिकांक में उनकी नई लघुकथाओं का प्रकाशन लघुकथा से जुड़े कथाकारों के लिए अच्छी बात है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि लघुकथा लेखकों ने ‘हंस’ में छपी राजेन्द्र यादव की लघुकथाओं को सबसे पहले पढ़ा होगा। राजेन्द्र यादव सरीखे कथाकार से अति गंभीर, उत्कृष्ट या कहा जाए कि मानक लघुकथाओं की अपेक्षा की जा रही थी। आज लघुकथा के क्षेत्र में बहुत गंभीर लेखन हो रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि अब लघुकथा में श्रेष्ठ ही लिखा जा रहा है। कूड़ा-करकट फैलाने वाले आज भी मौजूद हैं, सभी विधाओं में होते हैं। समय अपने आप श्रेष्ठ को अलग कर देता है। अन्य विधाओं की तुलना में लघुकथा को इन तथाकथित रचनाकारों ने सबसे अधिक हानि पहुँचाई है। स्थापित साहित्यकारों की लघुकथा के प्रति चिढ़ पहले ही लघुकथा की स्थापना में अवरोध का काम कर रही थी, उस पर इसमें उग आए खरपतवार ने इसका और अधिक अवमूल्यन कर दिया था। आज स्थिति बेहतर है। अन्य विधाओं की भाँति लघुकथा में अनेक ऐसी रचनाएँ लिखी जा रही हैं, जिनकी तुलना विश्वस्तरीय रचनाओं से की जा सकती है।

राजेन्द्र यादव की लघुकथा ‘अपने पार’ स्त्री-पुरुष के संबंधों पर लिखी गई उत्कृष्ट रचनाओं में से एक है। पति-पत्नी के संबंध-विच्छेद से बच्चों के मन पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है। बच्चे को अपनी मम्मी के साथ पापा का भी प्यार चाहिए। इस परिवेश से बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है-“साल-दो साल में हम लोग मिलने जाते हैं। अक्सर मेरी बर्थ-डे तभी होती है। पापा खूब प्यार करते हैं। आइसक्रीम खिलाते हैं, कपड़े-खिलौने दिलाते हैं। हर बार उनके साथ एक औरत होती है। पापा मुझसे कहते हैं-“ये तुम्हारी मम्मी है।” मेरी मम्मी वैसे तो गुमसुम बैठी रहती है, लेकिन जब पापा मुझसे यह बात कहते हैं, तो दूसरी तरफ देखने लगती है। गले की जंजीर को निकालकर दाँतों से पकड़ लेती है। मेरा मन होता है कि मैं उसका कंधा पकड़कर पूछूँ- “तुम मेरे लिए एक पापा नहीं ला सकतीं ? मुझे तुम्हारे गले में हाथ डालने वाले अंकल नहीं, पापा चाहिए… मगर मैं कुछ नहीं बोलता। ‘नई मम्मी’ को देख लेता हूँ। वह मुझे बड़े प्यार से आइसक्रीम खिलाती है। मेरा मन करता है, हटकर अपनी मम्मी के पास चला जाऊँ… ।” बहुत ही मर्मस्पर्शी, अभिव्यंजनात्मक एवं सांकेतिक होने के कारण बहुत ही प्रभावशाली है। राजेन्द्र यादव की इस लघुकथा में एक भी शब्द व्यर्थ नहीं हैं। वाक्य स्वयं में पूर्ण एवं सटीक हैं। इस दृष्टि से राजेन्द्र यादव की यह लघुकथा उच्च कोटि की है।

लघुकथा ‘अपनी ही मूर्ति’ में नेताजी अपने स्वयं के जीते जी अपनी मूर्ति का अनावरण स्वयं करते हैं, ताकि इतिहास में उनका भी नाम रहे । ऐसे नेताओं के स्वार्थ, लालच एवं महत्वाकांक्षा का लेखक द्वारा सूक्ष्म चित्रण हुआ है-“उन्हें लगता ही नहीं कि उनकी मूर्ति है। लगता जैसे वह कोई दूसरा है, बहुत दूर, बहुत बड़ा और बहुत महान… जब वे खुद विश्वास नहीं कर पा रहे तो क्या दूसरे लोग या आने वाली पीढ़ियाँ विश्वास करेंगी कि ऐसा महान और मानवोपरि इंसान सचमुच इस दुनिया में कभी रहा होगा ।”

राजेन्द्र यादव की लघुकथा ‘सिद्धांत’  संवाद-शैली में लिखी गई है। लघुकथा की शुरुआत संवाद से होती है और अंत भी संवाद से । इस लघुकथा में-लड़के का पिता लड़की वालों से पाँच लाख की माँग करता है और माँग पूरी न होने पर बारात वापस ले जाने की धमकी देता है। लड़की का पिता गिड़गिड़ाता है। लड़की बीच में हस्तक्षेप कर झूठे-लालची लोगों के यहाँ जाने से इंकार कर देती है और लड़के के पिता को खूब खरी-खोटी सुनाती है। लघुकथा लड़की के पिता के इन शब्दों के साथ समाप्त हो जाती है-“बेटी का जन्म तो आपके घर भी हुआ था समधी जी, मगर आपने उसे जनमते ही मार डाला। अब आप हम सबको इसीलिए तो जलील करने की हिम्मत कर रहे हैं कि हमने अपनी बेटी को आपकी तरह क्‍यों नहीं मारा? उस बेटी का प्रेत आपसे रोज एक नई बेटी का खून माँगता है।”

सजा या सम्मान! लघुकथा के अंतर्गत तीन कालखण्डों में अलग-अलग स्थितियों का वर्णन हुआ है। इस लघुकथा में विभिन्‍न कालावधि की घटनाओं को ब्यौरों के माध्यम से कथ्य में संप्रेषित किया गया है। ‘पहला झूठ’ लघुकथा घटना प्रधान है, जिसकी शुरूआत चिंतन से होती है। ‘मरण कामना’  लघुकथा में राजेन्द्र यादव ने पारंपरिक रूढ़ियों और धार्मिक अंधविश्वासों पर चोट की है। ‘प्रतिकार’ मिथकीय-शैली में लिखी गई लघुकथा है, जो द्रोणाचार्य और एकलव्य के संवाद से शुरू होती है। किस प्रकार समाज में उच्चवर्ग के धनी लोगों के द्वारा निम्नवर्ग शोषित होता है, कैसे काबिल और लायक व्यक्ति को पंगु बनाकर उसकी प्रतिभा को खत्म करने का प्रयास किया जाता है, यह इस लघुकथा में द्रष्टव्य है। लघुकथा ‘हनीमून’ में कुमारी माधुरी अरोड़ा नवदंपति को हनीमून मनाने हेतु चहल जाने सुझाव देती है और फिर तन्मय होकर वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों एवं मनाए जाने वाले हनीमून का चित्र उनके सम्मुख खींचती है। रचना में संवादों के माध्यम से बताया गया है कि सोनी की शादी उसके माता-पिता की मर्जी के खिलाफ हुई है। माधुरी अरोड़ा के जमाने में इतनी हिम्मत करना मुश्किल था।

कहानीकार राजेन्द्र यादव की ‘अपने पार’, ‘हनीमून’, ‘प्रेमपत्र’ आदि उत्कृष्ट लघुकथाएँ हैं। राजेन्द्र यादव ने पाँच-सात से अधिक लघुकथाएँ नहीं लिखी हैं। वे मानते थे कि लघुकथा-लेखन सरल विधा नहीं है, क्योंकि बड़ी कहानी को संक्षिप्त करके लघुकथा नहीं लिखी जाती, इसमें लेखक को मूल स्वर पकड़ना पड़ता है।

लघुकथा-लेखन में गंभीरता बहुत ही आवश्यक है। लघुकथा का वर्तमान स्वरूप लघुकथा के समर्पित लेखकों के संघर्ष एवं लंबी सृजन-यात्रा के फलस्वरूप बन पाया है। स्थापित साहित्यकार लघुकथा को गंभीरता से लेंगे तो यह विधा के लिए बहुत ही अच्छा होगा।

28 अक्टूबर, 2015 को दिल्‍ली में उनका निधन हुआ।

[28 अगस्त 1929-28 अक्टूबर 2015]

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