जून 2026

अध्ययन -कक्षरामकुमार आत्रेय की दृष्टि में लघुकथा     Posted: November 1, 2019

संचयन :  राधेश्याम भारतीय

साहित्य मेरे लिए हवा भी है, पानी भी है, और धूप भी। इन्हें पाने और सहेजने के लिए मैं अक्सर भटका भी हूँ और अटका भी। इसी राह पर आगे बढ़ते रहने पर मैंने झटका भी खाया है और पटका भी। इस प्रक्रिया के दौरान मेरे तन-मन पर गहरे निशान जन्म लेते रहे हैं। तन पर पड़े निशान तो समय पाकर क्रमानुसार मिटते रहे और फीके पड़ते रहे; परन्तु मन पर पड़े निशान निरन्तर सालते रहे हैं। उनका फीका पड़ना, मिटना, मेरे वश में कभी नहीं रहा। निशान पड़ने की यह प्रक्रिया आज भी जारी है। लगता है जब तक जिंदा रहूँगा तब तक जारी ही रहेगी।

इतना अवश्य है कि कभी-कभी मैं अपने हाथ में कलम उठा लेता हूँ और मन में पड़े निशानों को कागज पर उकेरने लगता हूँ। गरीबों, शोषितों तथा सीधे-साधे इन्सानों के मन पर पड़े गहरे घावों को भी मैं अपने ही घाव समझने लगता हूँ। सिर्फ समझने ही नहीं, महसूस भी करने लगता हूँ।  सही ढंग से लिखना मुझे कभी नहीं आया। मैं स्वयं भी बेडोल हूँ, मेरे अक्षर भी बेडोल हैं। आपको मेरी लघुकथाओं के बहुत सारे पात्र में मेरे जैसे ही मिलेंगे। उनके दुख दर्द  मात्र उनके नहीं बलिक मेरे भी बन गए हैं।

यदि मैं लघुकथाओं के बारे में बात करूँ तो बताना चाहूँगा, लघुकथा मेरे लेखन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। अभी तक मेरे चार लघुकथा संग्रह (इक्कीस जूते ,आँखों वाले अंधे, छोटी सी बात ,बिन शीशों का चश्मा) प्रकाशित हो चुके हैं। और सैकड़ों लघुकथाएँऔर है जिनसे एक पुस्तक प्रकाशित हो सकती है।

‘लघुकथा’ शब्द ’लघु’ तथा ’कथा’ के योग से बना है। ’कथा’ अपने आप में संज्ञा शब्द है और ’लघु’ उसका विशेषण है। परन्तु ’लघुकथा’ विशेषण और विशेष्य के योग से बना सिर्फ एक नया और सार्थक शब्द नहीं है। लघुकथा स्वयं को साहित्य की गरिमामय अभिवृ़द्धि करने वाली एक नई विधा बनकर सुस्थापित कर पाने में सफल सिद्ध हुई है।

 मेरी दृष्टि में लघुकथा ‘सीमित शब्दों’  में, सीमित संवाद  के साथ या सीमित रचना वातावरण के माध्यम से  एक  अनूठा प्रभाव पैदा करती है। जिसका  प्रभाव ऐसा होता है, मानो किसी ने किसी  के मुंह पर तमाचा जड़ दिया हो। यहां तमाचा जड़ने का अर्थ खेल खेल में तमाचा जड़ना नहीं बल्कि एक दम उसको आंदोलित करना है।’

          कहानी और लघुकथा में एक विशेष अंतर देखने को मिलता है।  कहानी में जो प्रभावोत्पादकता पांच-छह पेज में पैदा होता है। लघुकथा में वहीं प्रभाव एक या मुश्किल से दो पृष्ठ की लघुकथा में मिल जाता है।

यदि मैं लघुकथा लेखन प्रक्रिया की बात करूँ तो कहूँगा कि लेखन कार्य की शुरूआत  में मुझे लगता था कि लघुकथा लिखना आसान है। अनुभव से सीख पाया हूँ पर वास्तव में ऐसा है नहीं।  लिखने का तो सभी लघुकथाएँलिख ही रहे हैं। पर इतना आसान भी नहीं है लघुकथा लेखन।  लघुकथा का स्तरीय रूप टेढ़ा काम है। जितना इसमें लाघव है उतना ही टेढ़ापन ; जिसे साधना कठिन है। कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा सार्थक बात कहना ही लघुकथा की विशेषता है। लेकिन जब रचनाकार शब्दों से खेलने लगता है और सिर्फ कहन मानकर ही रचना का रूप दे देता है। इससे उसकी गम्भीरता एवं सार्थकता पर आघात पहुँचता है। और वास्तव में वह लघुकथा नहीं रह जाती। लघुकथा में उसके लघु या विस्तार पर अक्सर चर्चा होती रहती है तो इस पर मेरा मानना है कि कोई लघुकथा  शब्दों की निश्चित संख्या में नहीं बांधी जा सकती है क्योंकि रचना कोई गणित नहीं होती। गणित की अपनी एक सीमा होती है । रचना संवेदना होती है; भावना होती है और भावना, संवेदना को शब्द सीमा में बाँधना उसकी आत्मा को मार देना है।

यदि मैं लघुकथा में कथानक की बात करूँ तो किस्सागोई से जुड़ी जितनी भी विधाएँ  हैं, चाहे वह उपन्यास अथवा नाटक हो, कहानी अथवा एकांकीं हो सभी में ’कथानक’ की आवश्यकता रहती है। कथानक का फलक जैसा होगा वह विधा के रूप में वैसा आकार ग्रहण करता है। कथानक का होना लघुकथा में भी जरूरी है। कहने का मतलब यह है कि कथा तो यहां भी रहेगी ही। यह पहली शर्त है लघुकथा के लिए। कथा जहां होगी, वहां मनोरंजन भी होगा ही। मनोरंजन जहां होगा वहां मन को बिगाड़ने, सुधारने या फिर सन्तुष्ट करने की प्रक्रिया भी रहेगी ही। यदि ऐसा है तो फिर कथा भी लघुकथा में उपस्थित रहती ही है। स्थूल रूप में यदि कहा जाए कि जो अन्तर रूमाल और टॉवल में होता है, वही अन्तर लघुकथा और कथा में होता है। यहॉं इस बात पर ध्यान देना भी जरूरी है कि कई रूमाल मिलकर भी एक टॉवल का काम नहीं कर सकते और न ही एक टॉवल एक रूमाल की तरह आपकी जेब में आपके दिल के समीप रहने की औकात रख सकता है।

       मेरी प्रत्येक लघुकथा में  ’कथा’ निश्चित रूप से मौजूद रहती है। वह कथा आपका मनोरंजन भी करेगी, तिलमिलाएगी, गुदगुदाएगी, कुछ सोचने के लिए मजबूर भी करेगी। ऐसा मेरा दावा है। ऐसी लघुकथाएँही मुझे आकर्षित करती हैं। प्रयोग जिसे करना हो, करे। मैं ऐसा नहीं कर पाता।

लघुकथा में शीर्षक का अपना महत्व है। शीर्षक ऐसा हो जो पाठक को कथा पढ़ने को विवश कर दे।  मेरी लघुकथा ‘बिन शीशों का चश्मा’ का शीर्षक पढ़कर एक बार पाठक अवश्य सोचेगा कि क्या बिन शीशों का चश्मा भी होता है…होता भी है तो कैसा होता है….लेखक इसके माध्यम से क्या बताना चाहता है। और यही बातें सोचते हुए पाठक उस रचना को पढ़ना चाहेगा। बहुत से साथियों की लघुकथाओं के शीर्षक अक्सर चर्चा में रहते है।  मैं सुकेश साहनी की लघुकथा ‘अथ विकास यात्रा’ का उदाहरण देना चाहूँगा।  

विद्वानों का मानना है कि शीर्षक जितना छोटा हो उतना ही अधिक प्रभावशाली होता है। ‘अथ विकास यात्रा‘ में से यदि ‘अथ’ शब्द हटा दिया जाए तो ‘विकास यात्रा’ शीर्षक बचा रहता है। विकास यात्रा भी एक बढ़िया शीर्षक है। लेकिन कथा के अनुसार विकास यात्रा तो शुरू ही हुई है। यह यात्रा निरन्तर जारी रहने वाली है।  सभंव है भविष्य इस यात्रा का मार्ग परिवर्तित हो जाए, अथवा इसका मंतव्य ही बदल जाए। ऐसे में आप विकास को भी और ही कुछ कहने लगें। यात्रा बीच में विश्राम भी कर सकती है, रुक भी सकती है। ऐसे में न तो ‘विकास यात्रा’ और और न ही ‘यात्रा‘ शीर्षक रचना के मर्म को प्रकट कर पाते। रचना का विषय भ्रष्टाचार को उजागर करना है। सिर्फ उजागर ही नहीं करना; बल्कि भ्रष्टाचार आपके दिल और दिमाग में कांटे की तरह चुभने लगे उसे ऐसा रूप प्रदान करना है। भ्रष्टाचार एक ऐसा रोग है जो नासूर की तरह लाइलाज बनता जा रहा है। लेखक एक कुशल और अनुभवी चिकित्सक की तरह अपने ढंग से इस रोग का इलाज करता है। जिसका नाम ईलाज नहीं होता उसका नाम थैरेपी हो सकता है। इस थैरेपी के माध्यम से रोग धीरे-धीरे मूलसहित नष्ट होने लगता है यही तरीका साहनी जी अपनाते हैं। भ्रष्टाचार शब्द का उन्होंने एक बार भी प्रयोग नहीं किया है। हालाँकि यह एक भ्रष्टाचार कथा है।

लघुकथा का उद्देश्य की बात करें तो कोई भी रचना निरुद्देश्य नहीं लिखी जाती। रचना का काम भटके हुए को रास्ता दिखाना है। संवेदनहीन होते समाज को संवेदनशील बनाना और मानवीय मूल्यों की स्थापना करना है। कभी -कभी मेरे सामने ऐसे पात्र आ गए ,जिनका दुःख सुनकर मुझे लघुकथा लिखने पर विवश कर जाते हैं। फिर मैं लघुकथा की रचना करते हुए उस पात्र की तरह रोता रहता हूँ। उसका दुःख मेरा दुःख बन गया और मैं चाहता हूँ कि वही दुःख हर पाठक का दुःख बन जाए।

दूसरी बात,  किसी घटना से प्रभावित होकर उसे अपने शब्दों में ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देना लघुकथा का उद्देश्य पूरा नहीं होता, उसके लिए लेखक का कौशल  काम करेगा। मैं  अपनी एक लघुकथा ‘पंख’ की रचना प्रक्रिया के बारे में बताना चाहूँगा। वैसे अभी हाल में मैंने यह रचना प्रक्रिया लघुकथा को समर्पित  साहित्यकार योगराज प्रभाकर के सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका‘ लघुकथा कलश’ के लिए लिखी है।

‘पंख’ लघुकथा में खुद मैं ही उपस्थित हूँ। हुआ यों कि दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र ने एक लव लैटर लिखकर एक लड़की के सामने फेंका। अचानक वह पत्र दूसरी लड़की के सामने जा गिरा। लड़की ने प्रधानाचार्य से शिकायत कर दी। लड़के को बुलाया गया ,तो उसने बता दिया कि पत्र अमुक लड़की के लिए लिखा गया था। जो गलती से दूसरी लड़की पर जा गिरा। लड़के को धमकाने पर उसने बता दिया कि लड़की भी उसे पत्र लिखती है। और वे दोनों शादी करना चाहते हैं। इसपर उस लड़की के माता-पिता को स्कूल में बुलाया गया । उन्होंने उस लड़की को विद्य़ालय में भेजना बंद कर दिया। दूसरी लड़कियों के अभिवाभवकों को जब इस घटना का पता चला, तो उन्होंने अपनी -अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से मना कर दिया।

 प्रधानाचार्य  के साथ-साथ अन्य अध्यापकों एवं गाँव के लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि लड़कियों के पंख उग आए हैं। यदि इन पंखों को काटा नहीं गया ,तो गाँव उजड़ जाएगा । घटना यह थी अब उस घटना को लघुकथा के रूप में देखिए।

पंख

गाँव के सभी लोग,जिनमें औरतें भी शामिल थीं, अपने हाथों में कैंचियाँ उठाएँ एक ही दिशा में दौडे़ चले जा रहे थे। आश्चर्य तो इस बात का था कि उनके हाथों में थमी कैंचियाँ  उनके कदों से कहीं बड़ी थीं। मैं उस गांव में किसी काम से पहली बार गया था। उन लोगों के लिए मैं और मेरे लिए वे पूर्णतया अपरिचित थे। इसलिए मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह सब हो क्या रहा है। विवश होकर मुझे एक आदमी को रोककर पूछना पड़ा-‘‘ मेहरबानी करके मुझे इतना बताते हुए जाओ कि आप सब हाथों में कैंची उठाए क्यों और किधर भागे चले जा रहे हैं?’’

‘‘गाँव पर अचानक एक विपत्ति आ पड़ी है…इसलिए सब लोग उससे बचाव करने के लिए कैंचियाँ  उठाएँदौड़े चले जा रहे हैं।’’उसने किसी तरह अपनी हंफहंफी पर काबू पाते हुए मुझे बताया।

‘विपति! कैसी विपत्ति?’’ चौंकते हुए मैंने पूछा था।

‘अरे भाई, एक लड़की के पंख उग आए हैं। देखा -देखी दूसरी लड़कियों के भी पंख उगने लगेंगे। यह विपति नहीं तो और क्या है?’’ इतना कहते ही वह भी उधर ही दौड़ चला। 

 मेरी लघुकथाओं में समकालीन समाज की चिंताए  तीक्ष्ण और यथार्थपरक ढंग से  पाठकों के सामने उपस्थिति दर्ज करवाती हैं। भारतीय व्यवस्था, व्यवस्था में व्याप्त सडांध, भ्रष्टाचार भाई-भतीजावाद, जाति एवं धर्म की संकीर्णता,  किसान-मजदूर की पीड़ा, रिश्तों में स्वार्थ की बू और कथनी और करनी में अंतर को दर्शाती लघुकथाए हैं।

          अंत में इतना ही कहूँगा कि लघुकथा जन-जन की विधा इसलिए नही बन रही है कि पाठक के पास समय का अभाव है बल्कि इसलिए बन रही है कि लघुकथा अपना विशेष प्रभाव छोड़ती है, पाठक को चिंता एवं चिंतन को बाध्य करती है। बहुत लम्बे समय तक उसके जेहन में वह घटना घूमती रहती है। बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह जाती है। यानि गागर में सागर भर जाती है।

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