जून 2026

संचयनरामकुमार आत्रेय की प्रिय लघुकथाएँ     Posted: November 1, 2019

-इक्कीस जूते

बादशाह ने ढिंढोरा पिटवाया कि उसने अपने पूरे राज्य में ऐसे अवसर उत्पन्न कर दिए हैं कि अब किसी भी व्यक्ति को भूखा नहीं रहना पडे़गा…..पूरा राष्ट्र खुशहाल हो चुका है…यदि कोई व्यक्ति अब भी भूखा रह गया हो ,तो उसके दरबार में हाजिर हो जाए, ताकि उसके भूखा रह जाने का कारण जानकर इसके लिए उतरदायी राजकीय कर्मचारी को दंड दिया जा सके। ढिंढोरा पिटवाकर बादशाह निश्चिन्त हो गया था कि कोई भी भूखा व्यक्ति उसके समक्ष उपस्थित नहीं होगा और उसकी कीर्ति दशों-दिशाओं में फैल जाएगी। लेकिन बादशाह के इस सुखद स्वप्न को तोड़ता हुआ एक मरियल -सा व्यक्ति उसके सामने हाथ जोड़े उपस्थित हो गया।

“तुम भूखे हो?’’बादशाह ने गुर्राते हुए पूछा।

“जी मालिक।’’ गिड़गिड़ाहट भरा स्वर था उस व्यक्ति का।

“क्यों….क्यों? आखिर क्यों ? आग की तरह भड़क उठे थे बादशाह।

“मेरी ईमानदारी के कारण ,भगवन!’’ व्यक्ति ने गर्व के साथ बादशाह से आँखें मिलाते हुए कहा।

उसे आशा थी कि बादशाह प्रसन्न होकर उसकी पीठ थपथपाएँगे और पुरस्कार देंगे।

“क्या तुमने मेरे कर्मचारियों को तथा दूसरे लोगों को बेईमानी करते हुए नहीं देखा था? क्या तुमने उन्हें अपनी बेईमानी के कारण पुरस्कृत होते नहीं देखा था?’’अगला प्रश्न था बादशाह का।

“हाँ, सरकार,देखा था।’’

“क्या तुम्हें किसी ने बेईमानी करने से रोका था।?’’

“नहीं ,प्रभु ,नहीं।’’

“तो फिर भी बेईमानी करके तूने अपना पेट क्यों नहीं भरा?’’

“मैं अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहता हूँ स्वामी।’’

“बहुत अच्छा। फिर तो भूखा रहने के उतरदायी तुम स्वयं हो।’’ फिर अपने मंत्री की ओर उन्मुख होते हुए उसने आदेश दिया-‘‘इस व्यक्ति को इक्कीस जूते लगाए जाएँ,जोकि ईमानदारी व सिद्धांतों जैसी गली -सड़ी चीजों से खुद को चिपकाए हुए है।’’

-0-

2-शिकायत                                           

                    मोहन जी कुर्सी पर आराम की मुद्रा में पसरे हुए थे। ऐसा  होने पर भी उनकी आँखें दरवाजे पर टिकी थीं। दरवाजा बंद था। हालांकि जाली की राह से दूर तक देखा जा सकता था। बाहर से आने वाले व्यक्ति को इस तथ्य का ज्ञान नहीं होता था कि भीतर बैठा कोई व्यक्ति उसकी गतिविधि पर नजर रखे हुए है। तभी मोहन जी को एक साइकिल वाला व्यक्ति अपनी ओर आता दिखाई दिया। व्यक्ति ने अपनी साइकिल वहाँ खड़ी की। उसने हैंडल पर टंगा एक पुराना-सा थैला उतारा और दरवाजे की ओर बढ़ा।

                    मोहन जी किसी चुस्त-दुरूस्त व्यक्ति की तरह सावधान होकर कुर्सी पर बैठ गए।  झट से लैंडलाइन फोन का चोंगा उठाकर कान से लगाते हुए वे तेज आवाज में  बोले-‘‘ चड्ढा साहब,मैंने कहा न अगले हफ्ते के पहले दिन जो आपकी पेशी है,यह आखिरी है। अगली पेशी पर आप बरी होंगे, इज्ज्त के साथ बरी, समझ गए न?अब मेरा माथा न खाइए।’’ ऐसा कहते हुए उन्होंने फोन काट दिया।

          साइकिल वाला व्यक्ति ने अंदर घुसते-घुसते मोहन जी को यह सब कहते हुए सुना। मोहन जी ने उसे दफ्तर में घुसते हुए देखकर, मेज के दूसरी ओर रखी कुर्सी पर बैठने का संकेत करते हुए फोन के की बोर्ड पर तेजी से अँगुलियाँ घुमाई। कुछ क्षणों के उपरांत बोले- ‘‘शर्मा जी, आपको याद दिला रहा हूँ, कल ही आपकी पेशी है। मेरा मुंशी किसी काम से ट्रेज़री तक गया है नहीं तो वही तुमसे बातें करता। समय पर पहुँच जाना, समझे?’’

          मोहन जी ने फिर से फोन को काट दिया। और अगला नम्बर मिलाने लगे। तभी साइकिल वाले व्यक्ति ने उन्हें  बीच में टोकते हुए कहना चाहा -‘‘ साहब जी आपने…..।’’

          मोहन जी ने हाथ के इशारे से उसे चुप रहने के लिए कहते हुए फोन में कहना शुरू किया-‘‘ गुप्ता जी, जब आपका फोन आया यहाँ दो-तीन पार्टियाँ बैठी हुई थीं। वे लोग जिद कर रहे थे कि मैं ही, उनका मुकदमा लड़ूँ। इसलिए मैं उनकी बात मना नहीं कर सका। अब भी एक क्लाइंट मेरे सामने बैठा है। आपसे बाद में बात करता हूँ । पहले इस गरीब की बात सुन लूँ। फिर टाइम ही टाइम है। आप कह रहे थे कि आप खुशी से मेरा सार्वजनिक सम्मान करना करना चाहते है ,तो वह भी हो जाएगा…।’’

          साइकिल वाला व्यक्ति ज्यादा इंतजार नहीं कर सका। वह उठते हुए बोला-‘‘ साहब जी, आपने शिकायत दर्ज करवाई थी कि आपका फोन खराब है ;लेकिन मैं देख रहा हूँ  कि यह तो बिल्कुल ठीक-ठाक है। दस मिनट से आपने मुझे यहाँ बिठा रखा है। मुझे दूसरी जगह भी जाना है। आपसे अनुरोध है कि आगे से आप झूठी शिकायत दर्ज न कराया करें। आप वकील होते हुए भी ऐसा करते हैं अच्छी बात नहीं।’’

                    साइकिल वाला व्यक्ति बुड़बुड़ाता हुआ बाहर निकल गया। वकील के हाथ में थमा चोंगा तो बिल्कुल बेजान था। वह चाहकर भी यह नहीं कह पा रहा था कि वास्तव में उसका फोन खराब है!    

-0-

3-कसूर                            

ऋषिकेश में गंगा का तट। एक निर्जन -सा स्थान। वहाँ खड़ी थी एक बहुत ही सुन्दर युवती। गोरी- चिट्टी। इतनी गोरी-चिट्टी इतनी सुन्दर कि कोई देख ले तो ,बस, देखता ही रह जाए। उसने अपना बैग कंधे से उतारा। उसमें उसने अपना पर्स रखा।और फिर बैग को नीचे जमीन पर रख दिया। पर्स में कुरुक्षेत्र से वहाँ तक पहुँचने का बस टिकट भी था और थे एक हजार के लगभग रुपये। सरकारी सेवा में दर्शाने वाला उसका  परिचय पत्र। इसके उपरांत  हाथ ऊपर उठाकर माँ गंगा को प्रणाम किया। और फिर स्वयं को उसके हवाले कर दिया। गंगा निगल गई उसे। मगर कसूर गंगा का  नहीं था। दूर खड़े एक अपरिचित व्यक्ति ने उस युवती को गंगा की लहरों में समाते देख कर पुलिस को फोन कर दिया।

पुलिस वहाँ पहुँच गई। युवती का बैग उठाकर देखा। पर्स में अन्य चीजों के इलावा एक स्लिप भी मिली। उस पर मोती जैसे अक्षरों में लिखा था-‘‘ तुम मेरे पति हो। तुम्हारा कहना है कि तुम मुझसे प्राणों से भी अधिक प्यार करते हो। अवसर मिलते ही, चाहे दिन हो अथवा रात ,मेरी देह से जोंक की तरह चिमट जाते हो। देह को पसीने से और चेहरे को  थूक से लथपथ कर देते हो। विरोध करती हूँ  ,तो मारने को दौड़ते हो। पर मारते कभी नहीं…..। आखिर में रोने लगते हो। मैं तुम्हारा रोना नहीं देख सकती । इसलिए नहीं कि तुमसे प्यार है, बल्कि इसलिए कि  रोता हुआ पुरुष बदसूरत लगता है। इतना बदसूरत की उससे घृणा होने लगती है। शादीशुदा दूसरी महिलाओं से उनके पति के विषय में पूछती हूँ  ,तो वे भी यही कहानी दुहराती हैं। कुछ एक का कहना है कि उन्हें यह सब अच्छा लगता है । लगता होगा । पर मुझे नहीं लगता। मैं मर रही हूँ । लगता है तुम पुरुष लोग ‘प्यार’ का वास्तविक अर्थ जानते ही नहीं। कसूर मेरा ही है कि मैंने ……।

पुलिस के जिस व्यक्ति ने यह स्लिप पढ़ी थी ,उसके चेहरे पर अचानक पसीना उभर आया। उसने तुरन्त अपना मोबाइल जेब से बाहर निकाला और पत्नी को फोन मिलाते हुए काँपते स्वर में पूछा-‘‘ प्रिया जी, आप ठीक तो हैं न?’’

-0-

4-छुट्टी

बेटा बाइक उठाकर बाहर जाने लगा तो बूढे़ पिता ने टोका । अच्छा होता ड्यूटी पर बस से जाते । बाइक की अपेक्षा बस से यात्रा करना ज्यादा सुरक्षित होता है ।

          “आज मैंने छुट्टी ले रखी है पिता जी, डयूटी पर नहीं जा रहा मैं ।’’ पुत्र ने पीछे की ओर मुँह घुमा कर उत्तर दिया था । रेहड़ी मार्किट से कुछ खरीद कर ला रहा हूँ अभी ।

          “कमाल की बात है, तीन दिन पहले सोमवार को जब मैंने तुम्हें छुट्टी लेने के लिए कहा था तो तुमने बताया था कि दो हफ्तों तक कोई सी.एल. नहीं ले सकेगा । सर्लुकलर आया हुआ है । फिर आज अचानक छुट्टी कैसे मिल गई? मुझे तो फॉलोअप चैकिंग के लिए अकेले ही जाना पड़ा था ।’’ कहते-कहते पिता हाँफने लगे थे ।

          “मेरा आफिसर बड़ा सख्त है, पिता जी । लेकिन मैं भी उसका बाप हूँ । अभी जब मैंने फोन किया तो डाँटते हुए कहने लगा कि तुरन्त डयूटी पर आओ । मैंने उसे जवाब दिया कि पिता जी को चण्डीगढ़ ले जा रहा हूँ । रात में इन्हें फिर से छाती में दर्द होना लगा था । चण्डीगढ़ पहुँचने ही वाला हूँ । बस, फिर तो रबड़ की तरह मुलायम हो गया साला । बोला कोई  बात नहीं, पिता जी का इलाज ठीक से करवाना ।’’

          बेटे नें गर्व भरी हँसी के साथ उत्तर देते हुए बाइक स्टार्ट की और बाहर निकलने लगा।

          “रुको, ऐसा क्या जरूरी काम आ पड़ा कि तुम्हें इतना  बड़ा झूठ बोलनी पड़ा ?“ पिता ने न चाहते हुए भी पूछ ही लिया ।

          “पिता जी, आपकी बहू की बहन अभी-अभी अपने मायके आई है । आपकी बहू चाहती है कि आज मै उसको साथ लेकर वहाँ मिल आऊँ । मैं मना नहीं कर सका ।’’

          बेटे ने पीछे मुड़कर यह नहीं देखा कि उसकी बात सुनते ही पिता का हाथ अचानक अपनी छाती पर चला गया है और काँपते कदमों के साथ दूर पड़ी कुर्सी पर बैठने का प्रयास कर रहा है ।

-0-

5- पूर्णिमा का चाँद    

          बहुत तनाव में चल रहा था वह उन दिनों । पत्नी किसी न किसी बात को लेकर ज़िद पर उतर आती । प्यार से समझाने-बुझाने के सारे तरीके बेकार साबित हो चुके थे । इसलिए इस बार पत्नी के द्वारा ज़िद किए जाने पर उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह उसकी जिद को पूरा नहीं होने देगा । मारपीट, गाली-गलौच करना उसकी आदत में शामिल नहीं था । इसलिए उसने तय कर लिया कि वह तब तक भोजन नहीं करेगा जब तक पत्नी अपनी जिद पर अड़ी रहेगी।

          दो दिन हो गए थे उसे आज भोजन किए । भूख की वजह से एक आध बार उसका निश्चय अवश्य डोला पर स्वयं को समझा-बुझाकर वह अपने निर्णय पर अटल रहने में सफल हो गया था हालाँकि पत्नी के व्यवहार को लेकर उसका तनाव कम होने की अपेक्षा बढ़ता ही जा रहा था । दिन में आज उसने अपनी बीमे की किस्त जमा करवाई थी । लेकिन वहाँ से मिलने वाली रसीद उसे नहीं मिल पा रही थी । न जानें कहाँ रखकर भूल गया था वह । जेब में रखे सारे कागज बाहर निकाल लिये उसने। एक-एक करके देखने लगा था उन्हें ।

          इस बार हाथ में आई कागज की एक कतरन देखकर वह चौंका । कतरन पर बेटी ने अपने हाथ से लिखा था – “पापा, मैं दो दिन से भूखी हूँ । जब तक आप भोजन नहीं करेंगे, मैं तब तक पानी नहीं पियूँगी!”

          दिल पर एक धक्का-सा लगा । वही धक्का बिजली के करंट की तरह सिर से पाँव तक सनसनाता हुआ निकल गया । बेटी का कुम्हलाया चेहरा तथा बीमारों जैसी उसकी चाल उसे याद हो आई । तनाव के कारण ही वह यह सब नोट नहीं कर पाया था । लेकिन यह स्लिप उसकी जेब में कब रखी उसने ? प्रश्न उसके दिमाग में अपना सिर उठा चुका था । उसे याद आया कि जब वह बेटी को स्कूल से लिवाने गया था ,तो वह मरियल सी चाल चलते हुए उसके समीप आई थी । मन ही मन उसकी धीमी चाल को देखकर वह चिढ़ भी गया था । पर डांट पिलाने से उसने स्वयं को किसी तरह रोक लिया था । बेटी ने पीछे बैठते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा था । उसका वह हाथ तब जेब तक भी गया था । तभी उसने यह स्लिप उसकी जेब में रखी होगी । उसकी प्यारी बेटी, उसकी वजह से दो दिन से भूखी ही नहीं प्यासी भी है, धिक्कार है उसको ! ऐसा सोचता हुआ वह दौड़ता-सा बेटी के पास आया ।

          बेटी किसी मुर्दे की तरह निश्चेष्ट बैड पर पड़ी थी । उसकी आँखें बंद थी । उसकी मम्मी उसके समीप बैठी सलाइयों पर अँगुलियाँ चला रही थी । उसने बेटी के माथे पर हाथ रखते हुए बड़े प्यार से कहा -“बेटी, मुझे माफ कर दे । मेरी वजह से तुम दो दिन से भूखी-प्यासी हो । उठो, तुम्हारे लिए बाजार से तुम्हारी मन पसंद खाने की चीज ले आऊँगा। दोनों साथ मिल कर खाएँगे ।’’

          बेटी उठ बैठी । पापा का हाथ अपने अपने दोनों हाथों के बीच में लेकर उसे प्यार से सहलाते हुए बोली- “पापा, साथ में मम्मी भी खाएँगी । इनके लिए भी कुछ ले आना ।’’

          “तुम्हारी मम्मी तो अपना पेट रोज भर रही है । किचन में बर्तनों की उठा पटक हर रोज होती है । इन्हें न तुम्हारी चिन्ता है और न ही मेरी ।’’ उसने कटु स्वर में उत्तर दिया ।

          “नहीं पापा, ऐसा नहीं है । जिस दिन आपने इनकी जिद तोड़ने के लिए भोजन न करने की बात कही थी, सिर्फ उसी दिन सुबह ही इन्होंने नाश्ता किया था । जब इनके कहने पर मैंने खाने-पीने से मना कर दिया तो इन्होंने भी कुछ न खाने का निश्चय कर लिया था और कहा था कि मैं भी तभी कुछ खाऊँगी जब तू खाएगी ।’’ बेटी ने बडी मासूमियत से मुस्कुराते हुए उत्तर दिया ।

          पत्नी बैड से नीचे उतर कर उसके सामने खड़ी थी । उसे लगा कि उसके और पत्नी के बीच लड़ाई-झगड़े की जो अंधियारी रात अमावस बन कर फैली हुई थी उसमें अचानक उनकी बेटी की मुस्कुराहट पूर्णिमा का चाँद बन।कर रोशनी बिखेर रही है ।

-0-

6-आखिरी इच्छा

माँ कई दिनों से बीमार चल रही थी। वैद्य-हकीमों की दवाइयाँ बेअसर सिद्ध हो रही थी। जिस भी चिकित्सक के पास जाने की सलाह दी जाती, मैं उन्हें वहीं ले जाता। उनके लिए मैंने पैसे की कभी परवाह नहीं की। धीरे-धीरे वे इतनी कमजोर हो गई कि उनका उठना-बैठना भी बंद हो गया। वे चारपाई पर ही रहने लगी।

          मैं उन्हें बीच-बीच में बैठा देता। वे मेरा सहारा लेकर बैठी रहती। चाय-पानी, दवाई, उन्हें इसी तरह दी जाती। सुबह शाम वे हाथ में माला थाम लेती। राम-नाम का जाप करती।

एक दिन राम-नाम के जाप के पश्चात वे सामने दीवार पर टँगे माता जानकी सहित भगवान राम के चित्र के सामने हाथ जोड़े कुछ बुदबुदाती रही। ऐसा बहुत देर तक चला।

मैंने वातावरण को हल्का करने के लिए माँ से मजाक के लहजे में कहा-‘‘ माँ आपने भगवान से मेरे लिए तो बहुत कुछ मांगा,वह मिला भी। अब आज अपने लिए भी कुछ माँग लो,कोई अच्छी सी चीज।’’

“बेटा रे, मैं तो आज भी तुम्हारे लिए ही कुछ माँग रही थी। तुम्हें जो मिला, आगे भी मिलेगा, वह सब मेरे लिए ही तो है रे। खुद अपने लिये तो मैंने कभी कुछ नहीं माँगा रे।’’ उन्होंने ऐसा कहते हुए अपना दायाँ हाथ मेरे सिर पर रख दिया था।

मैं चौंका। तुरन्त पूछ लिया। ‘‘अब मेरे लिये क्या माँग रही थी माँ आप? मेरे पास तो सब कुछ है।’’ मैंने अपने सिर पर रखा हाथ अपने हाथ में लेकर उसकी बूढ़ी अँगुलियों पर अपने होंठों को रखते हुए पूछा।

“बेटा, अब सावन (श्रावण) मास के आखिरी दिन चल रहे हैं ।मैं चाहती हूँ  कि मेरी मौत भादवे भाद्रपदमास(भाद्रपदमास) में हो…….।’’

“माँ ,जिस दिन तुम अपने प्राण त्यागोगी, वह मेरे लिए प्रलय का दिन होगा ऐसा बुरा मत बोल । माँ मैं जानता हूँ , मरना तो सभी को है। श्रावण में मरो या भादवे में मरो, कोई फर्क नहीं पड़ता माँ ।’’ ऐसा कहते कहते रो पड़ा था मैं

“फर्क पड़ता है, रे बेटा, पड़ता है फर्क।’’

“क्या फर्क पड़ता है, बताओ तो सही।’’

“भादवे के बाद आसुज अश्विन का महीना आता है रे। उसके बाद कार्तिक। आसुज कार्तिक में पानी ठंडा होने लगता है। मैं मरूँगी तो तुम्हें क्रिया-कर्म करवाने के लिए चौदह पन्द्रह दिनों तक ठंडे पानी में नहाना पड़ेगा । तू हठि है..जरूर ठंडे पानी में नहाएगा। इसलिए भगवान से प्रार्थना की है कि मुझे भादवे मास तक ही उठा ले। यही मेरी आखिरी इच्छा है रे बेटा……। ’’ माँ कहते -कहते हाँफने लगी थी।

——

माँ की मौत, सचमुच मे ही राधा अष्टमी के दिन भाद्रपद मास में हुई।

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine