जून 2026

अध्ययन -कक्षराष्ट्रीयता और लघुकथा     Posted: August 1, 2020

परिभाषा

राष्ट्रीयता के शब्दिक अर्थ पर दृष्टिपात करें तो- ‘एक खास राज्य या क्षेत्र में रहने वाले लोगों का एक बड़ा समूह जो समान संस्कृति, भाषा और इतिहास साझा करता है, उसे राष्ट्र कहते हैं व अपने राष्ट्र से जुड़ी हुई पहचान और उसके हितों का समर्थन करने को राष्ट्रीयता कहा जाता है।

आ. मृदुला सिन्हा जी के शब्दों में राष्ट्रीयता की भावना राख में छिपी चिंगारी की तरह होती है, जब राष्ट्र पर कोई विपत्ति आती है तो वह चिंगारी भड़क कर आग बन जाती है। राष्ट्रीयता राष्ट्र शब्द से बनी हुई भाववाचक संग्या है। राष्ट्र के प्रति हम जो भावना रखते हैं वही राष्ट्रीयता है।

हेंस कोहन नामक विद्वान् ने लिखा है कि राष्ट्रीयता मस्तिष्क की वह स्थिति विशेष है , जिसमें व्यक्ति की उच्चतम निष्ठा राष्ट्र के प्रति हो।

राष्ट्रीयता के दायरे

यह बात तो स्पष्ट है कि राष्ट्रीयता की भावना नागरिकों में राष्ट्र के प्रति अपार भक्ति, आज्ञा-पालन, आत्म-त्याग, कर्तव्यपरायणता तथा अनुशासन आदि गुणों को विकसित करके सभी प्रकार के भेद-भावों को भुलाकर एकता के सूत्र में बाँध देती है। इससे राष्ट्र की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आदि सभी प्रकार की उन्नति होती रहती है। अपने धर्म, जाति, आपसी भेदभावों से ऊपर उठकर इंसानियत के मानदंड स्थापित करना, राष्ट्रहित के बारे में सोचना व उसी के अनुसार कार्य करना ही राष्ट्रीयता है।

व्यापक अर्थों में अपनी संस्कृति व संस्कार, अपनी विरासत, सामाजिक मूल्य, भाईचारा, सांप्रदायिक सौहार्द की रक्षा हेतु किए कार्य, आर्थिक स्थिति की बेहतरी में योगदान, देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा, देश की एकता व अखंडता, आतंक के विरुद्ध जंग, राजनैतिक व संवैधानिक धरोहर की रक्षा, उच्च धार्मिक विचारों की रक्षा हेतु उठाया गया कदम एवं और भी अनेक कार्य राष्ट्रीयता की श्रेणी में आते हैं।

इतिहासकार विंसेंट स्मिथ के शब्दों में- ‘इसमें कोई शक नहीं कि भारत में भौगोलिक विविधता और राजनीतिक विशिष्टता से कहीं अधिक गहरी उसके अंदर की बुनियादी एकता है। यह एकता खून, रंग, भाषा, वेश-भूषा, मत और संप्रदायों की विविधता से कहीं आगे हैं।’

इतिहासकारों के अनुसार राष्ट्रीयता की भावना का विकास फ्रांस की क्रांति से हुआ माना जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन से पूर्व भारत भी अनेक रियासतों में बंटा हुआ था। अनेक राजा थे। प्रजा भी अपने-अपने क्षेत्र के प्रति वफादार थी।

राष्ट्रीयता की भावना को केवल सीमा पर रक्षा तक सीमित नहीं किया जा सकता। किसी भी क्षेत्र में देशहित के लिए किए जाने वाले कार्य को राष्ट्रीयता से प्रेरित कहा जाता है। जिसमें अपने देश की उन्नति की कामना समाहित होती है। प्रजा या जनता में राष्ट्रीयता को समझने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन पर एक नज़र डालनी आवश्यक है। इस आंदोलन में जनता का बिलाशर्त योगदान राष्ट्रीयता के जज़्बे के कारण ही था। एक आवाज़ पर परिणामों की परवाह किए बिना आंदोलन में कूद पड़ना, विदेशी कपड़ों की होली जला देना हम सबमें से कुछ ने देखा भी है या अपने पुरखों से सुना है। आंदोलन के लिए धन की कमी दूर करने के लिए जितना हो सका सबने जाति, धर्म, कटुता या विवाद भुलाकर आर्थिक योगदान दिया। महिलाओं ने अपने गहने तक दान कर दिए।

आज़ादी के बाद भी जब-जब भी ऐसी परिस्थितियां आईं जनता ने राष्ट्रीयता का की भावना का परिचय दिया।

बाढ़, युद्ध या अकाल जैसे दुर्दांत समय में जनता दिल खोलकर पीड़ितों की मदद करने को आतुर रहती है, कारगिल के युद्ध में शायद ही कोई घर बचा हो जिसने अपनी सामर्थ्यानुसार कुछ न कुछ योगदान न दिया होगा। इसके पीछे भी राष्ट्रीयता की भावना ही है जो गाहे-बगाहे सामूहिक रूप से उमड़ती देखने को मिल जाती है।

आज़ादी के बाद आचार्य विनोबा भावे द्वारा गरीबों को भूमि दिलाने के लिए किया गया ‘भूदान यग्य’ इसी भावना से प्रेरित था और ज़मींदारों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। चीन से युद्ध के समय अनाज की कमी को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री द्वारा सप्ताह में एक दिन एक समय भोजन करने का आह्वान और जनता का उस पर अमल कैसे भुलाया जा सकता है।

व्यक्तिगत रूप से किया गया कार्य भी जो कि देशहित में हो वह भी राष्ट्रीयता की श्रेणी में आता है।

राष्ट्रीयता व साहित्य

विद्वानों के अनुसार राष्ट्रीयता मात्र विचार नहीं है, वह संवेदना व आचरण भी है। साहित्य जीवन की अभिव्यक्ति है। राष्ट्रीय होकर ही कोई साहित्य सार्थक हो सकता है। राष्ट्रीय और जातीय चेतना के विशिष्ट स्वरूप को मूर्त किए बिना साहित्य अपने अस्तित्व को अक्षुण्ण नहीं रख सकता और न ही सार्वभौम ही बन सकता है।

भक्तिकाल में साहित्य में राष्ट्रीयता का अधिक उल्लेखनीय योगदान देखने में नहीं आता किंतु रीतिकाल में अनेक विद्वानों जैसे कि कवि भूषण लाल, गुरु गोविंद सिंह, चंद्रशेखर, गोए लाल आदि ने अपनी रचनाओं से राष्ट्रीय आदर्शों की स्थापना का प्रयास किया।

आधुनिक युग में राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत भरपूर साहित्य रचा गया। भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, प्रसाद युग,  छायावादी काव्य रचनाओं में तथा बाद में प्रगतिवादी युग में काव्य, निबंध इत्यादि के माध्यम से राष्ट्रीयता को उभारती रचनाएँ  लिखी गईं। उस काल में कथा साहित्य का अधिक विकास न होने के कारण इस विधा का अधिक योगदान देखने में नहीं आता। किंतु आज कथा साहित्य विकास की दृष्टि से अपने चरम पर है। राष्ट्रीयता की भावना को व्यक्त करने में कथा साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

कथा साहित्य के अंतर्गत लघुकथा विधा की बात करें तो पिछली अर्धशती से उत्तरोत्तर विकास की यात्रा कर रही इस विधा ने अनेक ऐसी रचनाएँ  दी हैं जिनमें राष्ट्रीयता की भावना अंतर्निहित है।

आज का समय लघुकथा का समय है। कम समय में व हर प्लेट्फॉर्म पर समा सकने वाली विधा पाठकों की पहली पसंद बन गई है। आज स्वार्थ के गह्वर में गिरते समाज में राष्ट्रीयता की भावना जगाना बहुत आवश्यक हो गया है।

 जनमानस में राष्ट्रीयता की भावना जगाने में लघुकथा का उल्लेखनीय योगदान है। वसुधैव कुटुंबकं व सर्वे सन्तु निरामया का दार्शनिक भाव हमारी राष्ट्रीयता की पहचान है।

लघुकथा में राष्ट्रीयता

राष्ट्रीयता को कथ्य बनाकर लिखी गई लघुकथाएँ  मानव की सुप्त पड़ी संवेदना को झिंझोड़ने व राष्ट्र के लिए कुछ कर गुज़रने का जज़्बा जगाती हैं। उसे उद्वेलित करती हैं , मन पर गहरी छाप छोड़ती हैं।

आज समाज छोटी-छोटी बातों से विचलित हो जाता है। लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं इसलिए उन्हें सही मार्ग दिखाने का कार्य लघुकथा विधा बखूबी कर सकती है व कर भी रही है। राजनीतिक स्तर पर भी राष्ट्रीयता को बढ़ावा देने का आह्वान प्रतिदिन किया जाता है।

लघुकथा अधिकतर घटनाप्रधान व वास्तविकता के करीब होती है। लघुकथा में सीधे-सीधे बात रखने से आदर्शवादी अथवा उपदेशात्मक रचना होने की मुहर भी लग सकती है अतः पात्रों के स्वभाव व कथन का सहारा लेकर मूल्यों की स्थापना हो पाती है। लघुकथा विसंगतियों की ओर इंगित करती है परंतु यह हौले से विसंगति को दूर करने के उपाय भी सुझा जाती है अथवा सोचने को मजबूर करती है।

लघुकथा साहित्य में अब तक हज़ारों रचनाएँ  लिखी गई हैं। सांप्रदायिक दंगों व सौहार्द की स्थापना के मद्देनज़र लघुकथाकार कमल चोपड़ा ने अनुमानतः सबसे अधिक रचनाएँ  लिखी हैं। उनकी लघुकथा ‘धर्म के अनुसार’ में राजीव नामक पात्र हिंदू होते हुए भी अपने धर्म की, मानवता की शिक्षा का हवाला देते हुए एक मुसलमान की जान बचाता है। यह धार्मिक उन्माद से रक्षा करने का एक उदाहरण है। राजीव के कथन के अनुसार अपने ही मोहल्ले या धर्म के लोगों के बीच व्यक्ति को सहायता करने वाले अनेक मिल जाते हैं पर दूसरे धर्म या जाति के लोगों के बीच फंसे व्यक्ति को बचाना अधिक ज़रूरी है। ज़्यादा खतरा उसी की जान पर होता है। अतः राजीव ने उस दूसरे व्यक्ति की जान बचाने को प्राथमिकता दी।

डॉ. कमल चोपड़ा की ही लघुकथा ‘बताया गया रास्ता’ में रिक्शावाला दूसरे धर्म की बच्ची को दंगों से बचाकर स्कूल से घर पहुंचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं करता। बच्ची के मासूमियत से रिक्शेवाले को चाचा कहने पर आपसी विश्वास की कड़ी को बल मिलता है जो एक मजबूत राष्ट्र के लिए अतिआवश्यक है। उन्हीं की कथा ‘अन्न का मज़हब’ व ‘गहरा विश्वास’ दो मज़हबों के बीच की नफरत की दीवार को गिराकर सौहार्द स्थापित करने का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। अन्न का मज़हब में जातीय दीवार व भेदभाव को दरकिनार कर पात्र दूसरे मज़्हब वाले के घर का अन्न खा कर सुकून महसूस करता है जो अब तक उसे वर्जित समझता आया था। उसे लगता था कि वह उनके घर भोजन करेगा तो अपवित्र हो जाएगा, उसे उल्टी हो जाएगी परंतु भोजन करने के बाद उसे ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि आत्मिक व शारीरिक तृप्ति का आभास हुआ। गहरा विश्वास में दंगों के दौरान हिंदू अपनी बेटी मुसलमान दोस्त के व मुसलमान अपनी बेटी हिंदू दोस्त के घर हिफाज़त के लिए छोड़ जाता है जो आपसी विश्वास व सौहार्द के मूल्यों को स्थापित करती रचना है।

कथाकार प्रताप सिंह सोढ़ी की लघुकथा ‘फरिश्ते’ -में भी पात्र कर्फ्यू के दौरान आपसी सहयोग द्वारा एक-दूसरे का दिल जीत लेते हैं। सलीम की प्रसव से पीड़ित बेटे की पत्नी को पड़ोसी किशोरीलाल का इंस्पैक्टर पुत्र पुलिस की वैन में अस्पताल पहुंचाता है। ऐसे मौकों पर ज़रा सी मदद भी आपसी विश्वास कायम करने में बहुत बड़ी मदद करती है क्योंकि यह विश्वास फिर मनों में सदा के लिए पैठ बना लेता है जो देशहित व देश में शांति बनाए रखने के लिए अतिआवश्यक है।

डॉ. लता अग्रवाल की कथा ‘कही-अनकही’ में सीमा पर तैनात पति के साथ कार्यरत उसके मित्र को पति को बताने के लिए घर की परेशानियां बताती है पर अगले ही पल पति के देशसेवा के कार्य में बाधा न पड़े यह सोचकर उसे कुछ भी बताने से मना कर देती है। यहां सीमारक्षक सैनिक के साथ-साथ उसका परिवार भी उसी राष्ट्रीयता की भावना से आप्लावित है व परोक्ष रूप से उसे बिना किसी तनाव के कर्तव्यपालन का माहौल देने में अपना योगदान देता है ।

         कथाकार बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘बीती सदी के चोंचले’ भीड़ की मानसिकता को बदलने में इमाम साहब के सफल प्रयास को दर्शाती है। मस्जिद की सीढ़ियों पर सूअर काटकर फेंके जाने से आक्रोशित आठ-दस लोगों की भीड़ सुबह-सुबह नमाज़ के वक्त इमामसाहब को उठाती है और वाकये से अवगत कराते हुए बदले में मार-काट मचा देने व सबक सिखाने पर उतारू हो जाती है। इमाम साहब ऐसे वाकये को पिछली सदी की सोच व चोंचले बताकर खारिज कर देते हैं व भीड़ को सलाह देते हैं कि  जिसने भी यह किया है उसे उसके मकसद में कामयाब न होने दें। चलकर सीढ़ियों को धोकर साफ कर दें। वे खुद भी इस कार्य का हिस्सा बनते हैं। यह राष्ट्र में उकसाकर दंगे कराने वाली मानसिकता पर लगाम लगाने का अच्छा उदाहरण है। कथा द्वारा सांप्रदायिक सौहार्द बचाकर राष्ट्रीयता का भाव जगाने का संदेश मिलता है। उन्हीं की एक अन्य कथा है-’न समझने की ज़िद’। इस कथा में काश्मीर में एक फौजी, बाढ़ के दौरान बचाव के लिए नाव से उतरते समय गिरकर पैर में मोच आ जाने पर एक लड़की को गोद में उठाकर कैंप की ओर ले जाता है। लड़की इस मदद के बदले भी कहती है-’यह न समझ लेना कि तुम्हारे लिए मेरे मन में जगह बन जाएगी, मैं आगे भी तुमसे पहले जितनी नफरत करती रहूंगी।’ इसके जवाब में फौजी भी राष्ट्रीयता के जज़्बे से ओतप्रोत उत्तर देता है-’ मैं अपनी ड्यूटी निभा रहा हूं बीबी। ड्यूटी से जुड़ा कोई भी काम मेरे लिए न किसी पर ज़ुल्म है न अहसान।’ और वो उसे कैंप में पहुंचाकर किसी दूसरे की मदद के लिए निकल पड़ता है।

हमारे संस्कार हमारे देश की ताकत हैं। संस्कारों को बचाए रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य भी है। वहीं गिरते सामाजिक मूल्यों की रक्षा करने का जज़्बा पैदा करने में अपनी रचनाओं के माध्यम से योगदान देना एक लेखक का भी कर्तव्य है।

कथाकार सुकेश साहनी की लघुकथा ‘संस्कार’ राष्ट्र की संस्कार रूपी धरोहर को बचाए रखने की सीख देती है। जिस प्रकार समाज में वृद्ध जनों को दुत्कारने की प्रवृत्ति बढ़ गई है, उनकी सेवा तो दूर उन्हें घर से बेघर कर दिया जाता है। ऐसे वक्त में यह लघुकथा माता-पिता की सेवा करने का संदेश देती है जो हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अपने देश की संस्कृति को बचाए रखने के लिए उठाया गया कदम या मानक स्थापित करना भी राष्ट्रीयता है। अधिक नहीं तो कुछ लोग तो अवश्य ही इससे प्रेरणा लेकर जीवन में अपनाएँ गे।

कथाकार रूप देवगुण की लघुकथा ‘जगमगाहट’ हमारे समाज में महिलाओं की इज्ज़त करने के भाव को उद्घाटित करती है। हमारे देश में रिश्तों का व महिलाओं का सम्मान करना हमारे संस्कारों में शामिल है। समय के साथ धीरे-धीरे महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं। महिलाएँ  स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगी हैं। यह समाज में अराजकता जैसी स्थिति की ओर इंगित करता है। इस लघुकथा के माध्यम से लेखक ने महिला के मन में पुरुष के लिए विश्वास जगाने की कोशिश की है। कथा के अनुसार लाईट चले जाने पर स्टोर रूम में बॉस के साथ अकेली रह गई महिला बॉस की ओर से किसी गलत हरकत करने की आशंका से सहम जाती है। किंतु वही बॉस उसके मन में विश्वास जगाकर उसकी डर की आशंका को निर्मूल साबित कर देता है। क्या ही अच्छा हो इस लघुकथा के बॉस की तरह हमारे समाज के सभी पुरुषों की दृष्टि पवित्र हो जाए। गलत हरकतों के कारण देश का नाम भी बदनाम होता है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ के संस्कारों की रक्षा करने का संदेश इस लघुकथा के माध्यम से मिलता है।

गुमराह व अपराध की दुनिया में कदम रख चुके बच्चों को सही राह पर लाने के लिए प्रयत्न करना भी अपने समाज व देश की भलाई के लिए उठाया गया प्रशंसनीय कदम होता है। यहां भी उन अच्चों को सही मार्ग दिखाकर राष्ट्रीयता का परिचय ही मिलता है। इसी भावना के मद्देनज़र कथाकार विरेंद्र वीर मेहता की लघुकथा है ‘काबिलियत’। इस कथा का पात्र जसमीत, बाल सुधार गृह से निकलने पर बच्चों को गोद लेना चाहते हैं ताकि उन्हें काम व सही माहौल देकर उनका भविष्य सुधार सकें। इस प्रकार देश के लिए अच्छे नागरिक देकर राष्ट्रीयता का धर्म निभाने में जसप्रीत की भूमिका सराहनीय कही जा सकती है।

आज आतंकवाद से हमारे देश सहित पूरी दुनिया जूझ रही है। हमारी फौजें आतंकवादियों का सफाया करने में दिन-रात लगी हैं। केवल उन्हें मारने ही नहीं बल्कि आतंकवाद के रास्ते पर जा रहे कुछ गुमराह जवान बच्चों को वापस मुख्य धारा में लाने के लिए भी प्रयत्नशील हैं। फौजियों के मन में भरी राष्ट्रीयता की भावना व उनके कृत्य में दिखाई पड़ती देशभक्ति का ही प्रभाव है कि आज शेष देश चैन की नींद सो रहा है। कथाकार योगराज प्रभाकर की लघुकथा ‘गांधी अभी ज़िन्दा है’ में फौजी अफसर आतंकवाद की ओर उन्मुख बालक को सुधरने के लिए एक मौका देता है। उसके प्रति भी फौजी के मन में स्नेह उमड़ पड़ता है।

अपने देशवासियों की मदद करने की शपथ लेकर उसका सच्चे दिल से पालन करना भी देशसेवा है। राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन है। इस तथ्य को प्रमाणित करती है कथाकार मधुदीप की लघुकथा ‘मुर्दाघर’। कथा के अनुसार अपनी मांगों को लेकर डॉक्टर्स हड़ताल पर बैठे हैं। उधर मरीज़ परेशान हैं। डॉक्टर राघव एक बीमार बच्ची की मां की गुहार सुनकर हड़ताल छोड़कर उसका इलाज करने लगता है। तभी अन्य हड़ताली साथी उसे बायकॉट का डर दिखाते हैं किंतु वह यह कहकर कि ‘ कोई बायकॉट उस शपथ से बढ़कर नहीं है फ्रैंड्स जो हमने डॉक्टर बनने पर सबसे पहले ली थी।’ इस प्रकार मानवीय मूल्यों की रक्षा करना व अपने काम को ईमानदारी करना भी राष्ट्रीयता की पहचान है।

फौज में शामिल होकर देशसेवा के जज़्बे के पीछे राष्ट्रीयता की भावना होती है। कथाकार शोभा रस्तोगी की लघुकथा ‘पुनः भगत सिंह’ इसी बात की ओर इंगित करती है। एक फौजी के रूप में सीमा पर अपने पति को खो देने वाली स्त्री अपने बेटे को फौज में नहीं जाने देना चाहती। पर बेटा अपने तर्कों से उसे चुप करा देता है। बेटा कहता है –’मां सब मांएँ  यही कहेंगीं तो भारत मां किसे पुकारेगी? उसके तार-तार होते मान को देख सकोगी आप?’ और फिर उसे फौज में जाने की अनुमति मिल जाती है अपनी मां से। यह वार्तालाप अन्य लोगों के लिए भी सीख समान है। हमने देखा भी है कि अपने एक पूत को गंवाने के बाद भी माता-पिता दूसरे बेटे को भी देश के लिए सहर्ष प्रस्तुत करने में नहीं हिचकिचाते। यही है राष्ट्रीयता।

युद्ध में अंग कट जाने पर भी सैनिकों के मन में राष्ट्रीयता का भाव अपनी तकलीफ से भी ऊपर होता है। कथाकार नरेंद्र गौड़ की लघुकथा ‘टाँगों का दुःख’ में बम्ब ब्लास्ट में घायल हवलदार रामसिंह की दोनों टांगें काटनी पड़ीं। नर्स ने उससे पूछा कि आपको अपनी टांगों के कटने का बहुत दुख हो रहा होगा। जवाब में रामसिंह ने जो कहा वह उसकी राष्ट्रीयता के जज़्बे को सलाम करने को मजबूर कर देता है। रामसिंह ने कहा -कल तक तो दुख हो रहा था पर आज सुबह ही मुझे सूचना मिली है कि जिस पहाड़ की चोटी पर हम लड़ रहे थे वह हमने दुश्मन के कब्जे से छुड़ा ली है। अब उस चोटी पर हमारा प्यारा तिरंगा फहरा रहा है। नर्स भी उसकी बात सुनकर नतमस्तक हो गई।

हमारे रोज़मर्रा के मुद्दे व क्रियाकलाप भी यदि सोच-समझकर किए जाएँ  तो राष्ट्र की तरक्की में बहुत सहायता होती है। कथाकार पंकज शर्मा की लघुकथा ‘नल बंद कर दिया करो’ लापरवाही से पानी बहाने जैसी गंदी आदत को लेकर है। किसी व्यक्ति द्वारा नल खुला छोड़ देने पर पात्र रोहित उसे टोक देता है। क्या यह जगह उसकी है पूछने पर वह उस जगह, शहर, देश व संपूर्ण संसार को अपना घर बताता है। वह आने वाली पीढ़ियों के लिए जल, ज़मीन, जंगल या अन्य प्राकृतिक व गैर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए प्रेरित करने पर ज़ोर देता है ताकि पृथ्वी का अस्तित्व बचा रहे। धरती पर जीवन बचा रहे। इस कथा के माध्यम से देश सहित संपूर्ण विश्व को बचाने की भावना का संचार होता है। व्यापक स्तर पर देशहित में कार्य राष्ट्रीयता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

ये तो केवल कुछ ही उदाहरण हैं, ऐसी और भी ढेरों कथाएँ हैं। लघुकथाओं के माध्यम से कथाकारों ने राष्ट्रीयता को विषय बनाकर इसी प्रकार की अनेक कथाएँ  दी हैं जो समाज को प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम हैं। आज ऐसी रचनाओं की बहुत दरकार है।

डॉ. नीरज सुधांशु, आर्य नगर, नई बस्ती, बिजनौर-246701

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