द्वार पर साइकिल आकर रुकी। वह दौड़कर अपने पापा के पास पहुँच गया। अपने कंधे से झोला उतारकर उन्होंने बेटे को थमाते हुए बड़े प्यार से कहा, ‘‘तेरे लिए संतरे लाया हूँ।’’
वे साइकिल एक किनारे खड़ी करके थके हुए कमरे में आकर बिस्तर पर पसर गए। उनका बेटा उनकी बगल में बैठता हुआ बोला, ‘‘आप रोज थक जाते हैं पापा! आप तो शॉर्टकट रास्ते, गुरुद्वारे के सामनेवाली गली से होते हुए, मस्जिद के पीछे की खली पड़ी सड़क पर आ जाया करें। चौराहा पार करते ही हमारा घर…।’’
‘‘इतना लंबा भीड़ भरा रास्ता क्यों तय करते हैं?’’दूसरे बेटे ने कहा।
“बेटे!” उन्होंने साँस भरकर कहा,”इधर से इसलिए नहीं आता कि आजकल मंदिर,मस्जिद या गुरूद्वारे के पास बारूद बिछी होती है, न जाने कब फट पड़े”
-0-