वह भाग रही थी जी –जान लगाकर । भाग रही थी पूरे दम-ख़म के साथ ….लंबी-लंबी छलांगें लगाकर । आगे ज़िदगी थी । पीछे मौत । ……..एक ही क़दम का फ़ासला रह गया था बस । मौत बनकर दो खूँखार भेड़िये पीछे थे । भेड़िये अज़ीब- सा कोलाहल करते दौड़ रहे थे उसके पीछे । ….वह भाग रही थी अपनी नन्ही जान लेकर । …अभी-अभी तो ज़िन्दगी शुरू हुई थी ….इतनी ज़ल्दी इसे खोना नहीं चाहती थी । …वह आगे- आगे …भेड़िये पीछे-पीछे । ……. ‘एनिमल प्लेनेट’ चैनल के इस खौफ़नाक मंज़र में वह बुरी तरह समा गई थी । शरीर की समस्त इन्द्रियाँ इकट्ठी होकर टी.वी. के स्क्रीन पर केन्द्रित थीं । जवान होती हिरणी ……ज़िदगी और मौत से ज़द्दोज़हद करती दहशतज़दा हिरणी । उसे अपना निवाला बनाने को आतुर पीछा करते खूँखार भेड़िये …….उसके पीछे दौड़ती हाँफती अपनी बच्ची को बचाने की गुहार लगाती माँ । …….स्क्रीन पर अब हिरणी नहीं थी …..पींकू भाग रही थी । माँ की आर्तनाद ‘जंगल’ में गूंज रही थी …….भेड़ियों के नोकदार पंजे लंबे होते जा रहे थे …….और लंबे ……वह भी दौड़ रही थी …….भेड़ियों से अपनी बच्ची की जान की भीख माँगते ……उसका आर्त्तनाद पत्थरों से टकरा कर वापस आ गया। ……अंततोगत्वा हिरणी की बच्ची भेड़ियों के कब्ज़े में …..नोकदार पंजे उसे नोचते –खसोटते रहे ……ज़िन्दगी तार- तार हो गई …….मौत का तांडव नर्तन अपने चरम पर पहुँच गया …..!
“नहीं ssssssss!” एकबारगी वह चीख पड़ी बेक़ाबू धडकनों के साथ पसीने से तर-बतर होकर । …..दीवार पर तँगी पींकू की तस्वीर से आँखें मिलाना मुश्किल था । “माफ़ करना मेरी बच्ची !” कातर स्वर से पूरा घर भीग गया ।
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