अजब था वह। गजब थे उसके खयाल। उसकी चले तो पूरी दुनिया को खेत बना दे। खेतों में केवल गेहूँ लहलहाएँ। गुलाबों की परवाह नहीं ,बल्कि उनकी कोई दरकार नहीं थी उसे। गेहूँ से केवल रोटियाँ बनाई जाएँ। इन रोटियों से पेट भरा जाए।
लोगों की नासमझी पर उसे तरस आता। इमारतें सड़कें, फैक्ट्रियाँ…क्या क्या लोग बनाते रहते हैं? क्यों नहीं सभी लोग केवल रोटियाँ बनाते रहते हैं? कभी-कभी उसे सपने आते। सपनों की तन्दूर में वह रोटियाँ सेंकता रहता ओर लोगों को पकड़-पकड़ कर खिलाता रहता। अघाए लोगों पर अपने चिमटे को बन्दूक की तरह तान देता वह, ‘‘और खाओ। इतना खाओ कि फिर खाने की जरूरत ही न रहे।’’ सपने में ही वह मुस्कुराते हुए करवट बदल लेता और इसके साथ-साथ सपने भी बदल जाते।
बदल गए सपने में माँ नजर आती, वह गाँव नजर आता ,जिसे छोड़ आए उसे सालों बीत गए। माँ उसकी बलैयाँ लेती और थाली में रोटी परोसती जाती। सपने में भी उसके दिल में एक टीस उभरती। माँ से किए गए वादे को पूरा न करने की मरोड़ पेट तक लहर-लहर जाती। ‘‘जाने दे माँ मुझे। अपनी रोटी भी कमाऊँगा, तेरे लिए भी लाऊँगा। लोग पैसे कमाने परदेस जाते हैं, मैं रोटी कमाने जाऊँगा।’’ कुनमुनाते हुए उसने फिर करवट बदल ली।
कभी-कभी उसे पूरी दुनिया तवा नजर आती, जिस पर ऐसी रोटी पकाई जा रही होती जिसका न ओर नजर आता न ही छोर। उसका कोई सपना आज तक सच नहीं हुआ। चाहे आधी रात में दिखे या पहली भोर में।
यूँ भी पहली भोर तक वह कब सोया था उसे याद नहीं। आधी रात में न उठे, तो कूड़ाघर पर दूसरे का कब्जा हो जाता है। हड़बड़ाया भागा-भागा वह अपने मुकाम पर पहुँचा। किसी को नहीं देखकर उसका रोम-रोम खिल उठा। कूड़े के ढेर में वह मशगूल हो गया। खाने की चीजों को सीधा गड़प लेता था, दूसरी चीजों को तो बाद में भी बीन लेगा।
‘‘क्यों बे तेरा नाम क्या है?’’ हड़बड़ाया -सा वह खड़ा रह गया। सामने की सड़क पर जिप्सी खड़ी थी जिसमें से एक आदमी सर बाहर निकाले उसी से मुखातिब था। दूसरे ने कहा, ‘‘स्साला बांग्लादेशी लगता है, पकड़ ले….ले चल।’’
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