जून 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा के सामाजिक सरोकार-3     Posted: April 1, 2023

 सामाजिक जीवन और व्यवस्था

सामाजिक जीवन में व्यवस्था का बहुत महत्त्व है। घर-परिवार  से लेकर दफ़्तर तक, सामाजिक व्यवहार से लेकर राजनीति तक, रोज़मर्रा के सामाजिक जीवन तक, देश से लेकर देशान्तर तक। व्यक्ति के संस्कार, परिवार का परिवेश, पारस्परिक सम्बन्ध और उनकी समझ तथा तादात्म्य, सहिष्णुता एवं आत्मीय व्यवहार जीवन को बहुत दूर तक प्रभावित करते हैं। जो व्यक्ति घर-परिवार में सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकता, वह समाज को भी कुछ नहीं दे सकता। जो केवल परिवार को ही सर्वोपरि समझ लेता है, संकीर्णता और स्वार्थ के कारण वह अपने से जुड़े समाज का हित नहीं कर सकता । परिवार को राष्ट्र से ऊपर समझ लेना और भी घातक तथा अलोकतान्त्रिक है।

देश और समाज का अपने स्वार्थ के लिए दोहन और शोषण करने की  पाशविक प्रवृत्ति स्वातन्त्र्योत्तर समाज में विषाणु की तरह फैली है। जनहित के लिए प्रतिबद्ध, निर्धन और वंचित वर्ग के हितैषी के रूप में समर्पित होने के झूठे आत्म-प्रचार के प्रभामण्डल से जन सामान्य को गुमराह करके कभी समाप्त न होने वाली शोषण की लम्बी कालरात्रि समाज के बहुसंख्यक वर्ग को छलती रही है। मनमोहक नारे और घोषणाएँ मृगतृष्णा ही सिद्ध हुए। लुटा-पिटा सामान्यजन धूर्त्त लोगों का केवल वोट बैंक बनकर रह गया। सरकारें बदलें तो बदलें, नीतियाँ बदलें; लेकिन दफ़्तरों की जंग खाई शोषण प्रणाली में कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं आया। अंग्रेज़ चले गए; लेकिन उनकी परम्परा काले अंग्रेज़ निभा रहे हैं। प्रशासनिक भूल-भुलैया से लेकर सरपरस्त भ्रष्ट नेताओं का कलुषित गठजोड़ टूटता नज़र नहीं आता, फिर भी व्यवस्था में कुछ समर्पित व्यक्तियों के कारण उम्मीद की किरण बची है। हालाँकि यह कटु सत्य है कि सुधार चाहने वाले और करने वाले ऐसे लोग सबकी आँखों में खटकते हैं।

  धनार्जन की पिपासा व्यक्ति को कितना पागल कर देती है, इसे सुकेश साहनी की ‘काला घोड़ा’ लघुकथा में महसूस किया जा सकता। मिस्टर आनंद की टाँगों से लिपटने के लिए आतुर ठुमकता हुआ दो वर्षीय शानू हो, दर्द से बेहाल माँ हो, या फौरन घर पहुँचने की सलाह देने वाले डॉक्टर विरमानी हों; कोई भी उसकी संवेदना को जाग्रत नहीं कर पाते। मिस्टर आनन्द घुड़दौड़ का एक घोड़ा क्यो बनकर रह गया? कारण है धनोपार्जन की कभी न खत्म होने वाली  दौड़। मिस्टर आनन्द का यह कथन देखिए- ‘हमें इस फर्म के जरिए अधिक से अधिक व्हाइट जेनरेट करना है। हमारी दूसरी फ़र्में जो ब्लैक उगल रही हैं, उसे यहाँ एडजस्ट कीजिए।’’ अगर  लगभग 35 साल पहले लिखी इस लघुकथा के कथ्य पर विचार किया जाए, तो आज यह डरावना सत्य हमारे सामने है कि मिस्टर आनन्द एक व्यक्ति न होकर हमारे समाज की घातक प्रवृत्ति बन गए हैं, जिनके लिए, ठुमकता बच्चा , दारुण पीड़ा से छटपटाती माँ का महत्त्व नहीं, महत्त्व है तो केवल पैसे का।  पूँजीपति तो बदनाम थे ही, अब भारतीय राजनीति में आज़ादी  के बाद गाज़र घास की तरह उगे इन जनसेवकों को देखिए कि गिरिधर कवि की उक्ति – ‘दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम’ को ही पलटकर- ‘दोनों हाथों लूटिए, यही सयानो काम।’ में बदलकर रख दिया है। घर से उपजी इस घोर स्वार्थ-सिंचित कुसंस्कारी संस्कृति ने हमारे समाज को खोखला कर दिया है। दिन-रात खुलते अरबों के घोटाले राजनीति और प्रशासन के घृणित गठजोड़ का ही दुष्परिणाम है। इन वंचकों पर शिकंजा कसने वाले  संस्थान इनकी लूट की छूट को बाधित करके जेल तक पहुँचा रहे हैं, जिसे ये राजनैतिक विद्वेष का नाम देकर अपनी आज़ादी के हनन का नाम दे रहे हैं। कौन -सी आज़ादी है इनकी? लूट की छूट की आज़ादी, किसी को भी कोसने और गरियाने की  आज़ादी!

  साहनी जी की एक और लघुकथा है –‘फ़ॉल्ट’। इस लघुकथा की छोटी-सी घटना  से समझ सकते हैं कि किस प्रकार एक छोटी -सी बात घर से दफ़्तर तक को प्रभावित करती है।  छोटी-सी चिंगारी विध्वंस का कारण बन जाती है। पत्नी  के साथ छोटी -सी नोंक झोंक  के कारण  विनय अपने अधिकारी के साथ रूखा  और अभद्र व्यवहार कर बैठता है। घर लौटने पर भी वही तनाव बना रहता है। शान्त मन से सोचने पर  विनय महसूस करता है कि अगर उसने खाना नहीं खाया, तो पत्नी ने भी नहीं खाया होगा। उसे ही मनाने की पहल करनी चाहिए। इस पहल की प्रक्रिया में-जैसे ही विनय ने पत्नी के कंधे पर हाथ रखा, तो वह फफककर रो पड़ी, बोली, “तुम मुझसे झगड़ा मत किया करो। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।

पत्नी का इतना -सा कथन दोनों के बीच की बर्फ़ को पिंघला गया। रेस्टोरेण्ट से खाना मँगवाने के लिए फोन उठाया, तो पता चला कि दो दिन से खराब पड़ा फोन ठीक हो गया।

 पत्नी ने बताया, “अपने ही सैट में फॉल्ट था। लाइनमैन बता रहा था कि अपने इंस्ट्रयूमेंट में गड़बड़ी की वजह से कई लाइनें हैल्ड अप थीं।”

इस वाक्य से परोक्ष रूप में यही बताया गया है कि हमारा छोटा-सा फ़ॉल्ट बहुत सारी समस्याओं की जड़ बन जाता है। साहनी जी ने ‘फ़ॉल्ट’ लघुकथा के माध्यम से हमारे पारिवारिक और सामाजिक रूप से प्रभावित होने वाले परिवेश के मनोविज्ञान को उद्घाटित किया है।

            घर-परिवार के लिए एक पक्ष है कि स्त्री कुछ नहीं करती, तो दूसरी ओर समर्पित पुरुष भी है, जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। बलराम अग्रवाल ने  ‘बिना नाल का घोड़ा’ लघुकथा में इस अनुभूत सत्य को पूरी सफलता और गहरी संवेदना से सिंचित किया है।  इस लघुकथा में दफ़्तरों में काम के बोझ से लदे, कभी आराम न करन वाले कर्मचारी की दुरवस्था का सजीव चित्रण किया है। घिसीपिटी शैली से हटकर घोड़े के प्रतीक रूप में प्रस्तुत यह लघुकथा पाठक के मन में करुणा जगाती है। अन्तिम पंक्तियाँ देखिए-

‘‘बाजार में बहुत लोग नाल बेचते हैं’’- माँ आगे बोली, ‘‘लेकिन, उनकी असलियत का कुछ भरोसा नहीं है। बैल-भैंसा किसी के भी पैर की हो सकती हैं।….मैं यह कहने को आई थी कि दो-चार जान-पहचानवालों को बोलकर काला घोड़ा तलाश करो, ताकि असली नाल मिल सके।’’

‘‘नाल पर अब कौन पैसे खर्च करता है माँ!’’ माँ की बात पर वह कातर स्वर में बुदबुदाया, ‘‘हण्टरों और चाबुकों के बल पर अब तो मालिक लोग बिना नाल ठोंके ही घोड़ों को घिसे जा रहे हैं……।’’

यह कहते हुए अपने दोनों पैर चादर से निकालकर उसने माँ के आगे फैला दिए, ‘‘लो देख लो!’’

 परिवार के दायित्व का निर्वहन करने में घर का अकेला कमाऊ व्यक्ति कभी अपने लिए  न सोचकर पूरे परिवार के लिए खटता रहता है। सन्तान के भविष्य को सँवारने के फेर में  वह जब कुछ करता है , तो उसका क्रम कभी आता ही नहीं। कुमार सम्भव जोशी की लघुकथा ‘छेदवाली बनियान’ इसका सशक्त उदाहरण है। पिता जिस ढंग से रहते हैं, बच्चे उससे खुद को लज्जित अनुभव करते हैं। कथा का आरम्भ देखिए-

जब भी दरवाजे पर दस्तक होती, हम चारों भाई-बहन में से कोई न कोई भीतरी कमरे की खूँटी से पिताजी की कमीज लाने दौड़ पड़ता। हमारी सारी फुर्ती के बावजूद अक्सर पिताजी के कमीज पहनने से पहले मेहमान बैठक में पहुँच जाता और आधा दर्जन छेद वाली पिताजी की बनियान हमें शर्मिंदा कर देती।

पिताजी को तो पता नहीं क्यों शर्म आती ही नहीं थी, फटी बनियान- अँगूठा निकली जुराब मानो उनकी पसंदीदा पोशाक हो। मगर हम सभी धरती फटने और उसमें समा जाने वाली स्थिति में पहुँच जाते।

  यही शर्मिन्दा होनेवाला पुत्र जब पिता की भूमिका में पहुँचता है , तो वह भी अपने बारे में कहाँ सोच पाता है!  एक दिन शीशे के सामने खड़े जब वे शर्ट पहन रहे थे , तो पुत्री  क्लास के साथ शैक्षिक भ्रमण पर जाने के लिए हज़ार रुपये की माँग करती है-

पापा!….  पापा!”- बिटिया की आवाज़ से आईने के सामने शर्ट पहनते मेरी तन्द्रा टूटी।

“हूँ!”- मैंने जवाब दिया।

“पापा! हमारी सारी क्लास शैक्षिक भ्रमण पर जा रही है। हज़ार रुपये जमा करवाने हैं। प्लीऽऽज़।” बिटिया ने मेरा हाथ पकड़कर फुदकते हुए चिरौरी की।

“ठीक है”- मैंने ज़रा सोचकर कहा।

“मेरे पापा सबसे अच्छे”- वो खुश होती चली गई।

 अन्तिम वाक्य पिता के ज़ेहन में घर कर गया। वे मना नहीं कर सके। आज पच्चीस तारीख थी और पर्स में केवल बारह सौ साठ रुपये ही बचे थे। इस पर वे इतना ही सोच पाते हैं -“देखा जाएगा। बच्चों के लिए ही तो कमा रहे हैं।”

शर्ट के बटन बंद करते समय जब आईने की ओर नज़र गई, तो बनियान में तीन छेद झाँक रहे थे। उसे कोई शर्म नहीं आई। बस मन में यही आया-“अगली बार ले लेंगे।”

उसे  लगा तस्वीर में पिताजी मंद-मंद मुस्कुरा रहे हों।

 पारिवारिक दायित्वबोध की यह कथा प्रत्येक पिता की नियति है। जो व्यक्ति सबके लिए जीता है, उसका ध्यान कभी अपने सुखों पर नहीं जाता।

अंजू खरबन्दा की दो लघुकथाएँ अच्छे नागरिक के मानवीय व्यवहार और आत्मीयता को दर्शाती हैं। थर्ड ज़ेन्डर के प्रति समाज में उपेक्षा और उपहास का भाव है। इस उपेक्षा का कोई तार्किक कारण नहीं, बल्कि चली आ रही गलत धारणा मात्र है। अंजू की लघुकथा ‘बुलावा’ के ये संवाद देखिए-

“राम राम बाबूजी! आप यहाँ!”

“क्यों मैं यहाँ नहीं आ सकता?”

“आ क्यों नहीं सकते! पर यहाँ आता ही कौन है!”

“आया न आज! ये कार्ड देने मेरे बेटे की शादी का!

“कार्ड! बेटे की शादी का!”

“हाँ अगले महीने मेरे बेटे की शादी है तुम सब आना ।”

“……!”

“…और ये मिठाई सबका मुँह मीठा करने के लिए!”

काँपते हाथों से मिठाई का डिब्बा पकड़ते हुए चंदा बोली-“हम तो जबरदस्ती पहुँच जाते है शादी ब्याह या बच्चा पैदा होने पर, तो लोग मुँह बना लेते हैं  और आप हमें बुलावा देकर…!”

 लेखिका कोई उपदेश देने के लिए कथा के बीच में नहीं आई। कसी हुई संवाद -शैली में कथा आगे बढ़ती है। बाबू जी चन्दा को याद दिलाते हैं-

“याद है जब मेरा बेटा हुआ था तो पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लिया था तुमने खुशी के मारे।”

            इस लघुकथा के माध्यम से अंजू खरबन्दा ने समाज के वंचित वर्ग को जोड़ने का काम किया है।

 अंजू खरबन्दा की एक अन्य लघुकथा है ‘कर्ज़’। प्रशासनिक व्यवस्था में प्राय: यान्त्रिक रूप को ही महत्त्व दिया जाता है। कर्मचारियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की कमी दिखाई देती है। अधिकतर सम्बन्ध औपचारिक या लाभ-हानि के आधार पर बनते- बिगड़ते हैं। इस लघुकथा में रामचन्द्र चपरासी जब अकाउण्टेण्ट महेश से अग्रिम माँगता है, तो डाँट खाता है ;क्योंकि तीन हजार एडवांस पहले ही ले लिये। अब  बारह हज़ार एडवांस माँग रहा है।

अपने केबिन के शीशे से  बड़े साहब ने नज़ारा देखकर अकाउंटेंट को टेलीफोन पर कहा-“महेश! रामचंद्र को मेरे केबिन में भेज दो।”

साहब ने जब रौबीली आवाज़ में पूछा, तो रामचन्द्र घबराया हुआ था। उसने कहा कि बेटी की पढ़ने में उसकी बहुत रुचि है । बड़ी अफसर बनना चाहती है!

दराज खोलकर बड़े साहब ने रुपयों का लिफ़ाफ़ा रामचंद्र की ओर बढ़ा दिया।

“तुम्हारी बेटी की पढ़ाई का खर्चा! अब तुम्हें किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं!”

“पर …..!”

इस “पर …..!” संवाद पर शंका उभर आई, जो सांकेतिक रूप से दफ़्तरी शोषण की घृणित व्यवस्था  आभास कराती है। रामचन्द्र  द्वन्द्व-ग्रस्त होता है , तो साहब का यह कहना-“चिंता मत करो! तुम्हें नहीं चुकाना ये कर्ज !” उसे और उद्वेलित कर देता है। वह बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता। तभी साहब उसकी तन्द्र तोड़ते हैं और उसकी शंका का निवारण कर देते हैं-

“….बस अपनी बिटिया को मेरी तरफ से इतना कहना, जब पढ़ लिखकर काबिल बन जाए, तो ऐसे ही किसी जरूरतमंद की मदद कर दे! तब हो जाएगा तुम्हारा कर्ज चुकता!”

इस लघुकथा में लेखिका आश्वस्त  करती है कि मानवता विलुप्त नहीं हुई है।

प्रद्युम्न भल्ला की लघुकथा बड़े साहब का वाटर मैन, हरिया पैसे निकलवाने के लिए भागदौड़ करता। मंजूरी न मिलने पर  बड़े बाबू की शरण में जाता था। वहाँ कुछ देकर ही रुपए निकलते थे। इस कुछ में बड़े साहब का भी हिस्सा था, ऐसा बड़े बाबू कहते थे। ‘किसी भी काम के लिए सीधे बड़े साहब से मिलें’ की तख्ती पढ़कर उसका हौंसला थोड़ा और बढ़ गया। वह साहब के कक्ष में गया और निवेदन किया-साहब, यह मेरा छोटे से लोन का बिल था, आपके साइन हो जाते तो…. फुर्ती से हरिया ने बिल आगे किया।

साहब ने साइन किए। वह लौटने लगा। 

सुनो, साहब ने कहा ।

जी, हरिया ठिठक गया। उसे लगा अब साहब उससे पैसे भी माँग सकते हैं अथवा बिल भी लटका सकते हैं। इधर आओ, साहब ने जोर देकर कहा तो हरिया डरते- डरते उनके बिल्कुल पास जाकर खड़ा हो गया। 

अच्छी पगार है तुम्हारी, कपड़े साफ-सुथरे पहना करो, धोते नहीं क्या इन्हें? यह लो, इस से साबुन खरीद लेना, दोबारा आओ तो कपड़े धुले होने चाहिए? कहकर साहब ने सौ का नोट उसे थमा दिया। 

हरिया को कुछ नहीं सूझा वह साहब के पांव पकड़कर बोला, “साहब, आप के नाम पर बड़े बाबू हर वर्ष मुझसे पैसे ऐंठते रहे, आप तो देवता आदमी हैं, कहते हुए उसकी आँख भर आई।  साहब की चिन्ता थी कि हरिया जैसे न जाने कितने लोग  रोज़ इस लूट का शिकार बनते हैं।

“काश यह हरिया और हरिया जैसे ना जाने कितने सीधे उन तक पहुँच पाते? 

   ठीक इसके विपरीत दफ़्तर में एक और वर्ग है, जो पूरी व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहा है। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘दीमक’ दफ़्तरी व्यवस्था के इसी कुरूप चेहरे को अनावृत्त करती है। शासन सत्ता के बदलने पर कहीं फ़ाइलें जलाई जाती हैं, कहीं अन्य प्रकार से नष्ट की जाती हैं या चुराई जाती हैं। सत्ता की मशीनरी में बहुत से चोर दरवाज़े हैं, जिनका इस्तेमाल बाबू से मन्त्री तक सभी करते हैं। इस लघुकथा में साहब किसन को घूरते हुए पूछते हैं –

 “तुम मेरे कक्ष से क्या चुराकर ले जा रहे थे?”

“नहीं—नहीं साहब! आप मुझे गलत समझ रहे हैं—” किसन गिड़गिड़ाया, “मैं आपको सब कुछ सच-सच बताता हूँ—मेरे घर के पास सड़क विभाग के बड़े बाबू रहते हैं, उनको दीमक की जरूरत थी, आपके कक्ष में बहुत बड़े हिस्से में दीमक लगी हुई है । बस—उसी से थोड़ी-सी दीमक मैं बड़े बाबू के लिए ले गया था। इकलौते बेटे की कसम !—मैं सच कह रहा हूँ ।”

“बड़े बाबू को दीमक की क्या जरूरत पड़ गई!” बड़े साहब हैरान थे।

साहब रहस्य समझ जाते हैं। वे छोटे साहब मिस्टर रमन को कहते हैं-आप अपने कक्ष का भी निरीक्षण कीजिए, वहाँ भी दीमक ज़रूर लगी होगी, यदि न लगी हो तो आप मुझे बताइए, मैं यहाँ से आपके केबिन में ट्रांसफर करा दूँगा।XXX

आवश्यकता से अधिक हो जाए तो काँच की बोतलों में इकट्ठा कीजिए, जब कभी हम ट्रांसफर होकर दूसरे दफ्तरों में जाएँगे, वहाँ भी इसकी जरूरत पड़ेगी।”

“ठीक है, सर! ऐसा ही होगा—” छोटे साहब बोले। “देखिए—” बड़े साहब का स्वर धीमा हो गया-“हमारे पीरियड के जितने भी नंबर दो के वर्क-आर्डर हैं, उनसे सम्बंधित सारे कागज़ात रिकार्ड रूम में रखवाकर वहाँ दीमक का छिड़काव करवा दीजिए—न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।”

 सार रूप में कहें, तो काइयाँ अफ़सर और कर्मचारी  देश की पूरी व्यवस्था को दीमक बनकर जर्जर कर रहे हैं।

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( अगले अंक में जारी)

सन्दर्भ:

काला घोड़ा,फ़ॉल्ट, दीमक (सुकेश साहनी: गद्यकोश)

बिना नाल का घोड़ा (बलराम अग्रवाल: गद्यकोश)

छेदवाली बनिया (कुमार सम्भव जोशी : लघुकथा डॉट कॉम)

बुलावा, कर्ज़ (अंजू खरबन्दा: गद्यकोश)

बड़े साहब (प्रद्युम्न भल्ला :पुष्पांजलि जून 2022)

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