कल शाम थका-हारा जैसे ही घर पहुँचा तो सुकेश साहनी कृत ‘लघुकथाः सृजन और रचना-कौशल‘ को देखकर मन प्रसन्न हो गया और सारी थकान छूमंतर हो गई। शाम से ज्यों किताब पढ़नी शुरू की ,तो वह रात दो बजे हाथ से छूटी। लघुकथा के मौन साधक सुकेश साहनी कई दशकों से सृजन कार्य में लगे हुए हैं। आत्मप्रशंसा और आत्म विज्ञापन से कोसों दूर रहने वाले साहनी जी हिन्दी लघुकथा उन चंद गिने-चुने विद्वानों में से हैं ,जिन्हें अभिमान छू तक नहीं गया है। लघुकथाकार व आलोचक के रूप में इनका अग्रणी स्थान है। लघुकथा के क्रमगत विकास का जो युग आपने देखा है और जिसके निर्माण में इनका कुछ कम हाथ नहीं कहा जा सकता, कई दृष्टि में नितान्त महत्त्वपूर्ण है। इनकी विद्वत्ता, गंभीर अध्ययनशीलता और विवेचन -कुशलता का परिचय 150 पृष्ठों में फैली इस कृति से भली भांति मिल जाएगा। इस पुस्तक में 19 महत्त्वपूर्ण आलेख है , जिनके अध्ययन से कोई भी लेखक भली -भाँति सीख सकता है कि लेखक को अपने हृदय की अनुभूतियों और मस्तिष्क-जन्य विचारों को शब्दों का आवरण किस प्रकार पहनाना चाहिए और प्रकाशित करने से पूर्व उन्हें किस प्रकार सजाना चाहिए कि वह हृदयग्राही बनकर पाठक को आकर्षित कर सकें। इन आलेखों में ‘कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता’ में निर्णायक की टिप्पणी के तौर पर रचनाओं के गुण-दोषों पर गहन विश्लेषण है, जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। रामेश्वर काम्बोज जी के शब्दों ‘जो लेखक लघुकथा को अपने लेखन की प्रिय और समर्थ विधा बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक दैनन्दिन स्वाध्याय का ग्रन्थ बन सकती है।’ से पूर्ण सहमत होते हुए खासतौर पर लघुकथा के नवीन अध्येताओं /अभ्यसियों से यह गुजारिश है कि उन्हें यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली, दूरभाषः 9818988613 से मात्र 300 रुपये में उपलब्ध है।
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