जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: October 1, 2020

चित्रा राणा राघव

1-दिशाभ्रम

चित्रा राणा राघव

“बहुत देर हो गई, शाम का समय है, अब मुझे अपने घर जाना चाहिए घर …पर घर है किधर?”

दिशाभ्रम से पीड़ित मानसिक रोगी रामअवतार सोचने लगा। पहले 4-5 बार भी यह सोच चुका था , पर उसे घर जाने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।

“भाई साहब, सुनिए भाई साहब!”

“हाँ जी।”

 “जी मुझे घर जाना है।”

“हाँ, तो जाइए मैं क्या रोक रहा हूँ, क्या फ़ालतूगिरी करने आ जाते हैं।” जवाब सुन  रामअवतार कुछ और आगे बढ़ गया। वह दिमाग पर दबाव बना रहा था कि कुछ याद आ जाए।

“बेटा जरा सुनो इधर, वह आ ….आ…. किधर पड़ता है

“आदर्शनगर, अंकल यही पिछली गली के बाद है।”

“आदर्श नगर नहीं।”

“अवनी कॉलोनी, थोड़ी दूर है रिक्शा कर लो।”

 “नहीं बेटा, मेरी बात तो सुनो, तुम अपने मन से क्यों जगह बताए जा रहे हो।”

“अरे अंकल आपके कोई जगह बोली तो है नहीं।”

“हां बेटा वो आ … आ..!”

“रहने दो अंकल किसी और से पूछ लो।” कह मज़ाक- सा बनाता निकल गया।

खीज, क्रोध, बेबसी का मिलना असहनीय था, तेज सर दर्द शुरु हो गया।

रामअवतार एक चाय की दुकान पर जा बैठा, चाय खरीदी और कुछेक सहज बात करके बोला “जी, मैं सुबह का घर से निकला हुआ हूँ, थोड़ा रास्ता भूल रहा हूँ।”

“चाय के पैसे ?“

“हाँ जी, हाँ जी” पैसे निकालते  जेब में रखे मोबाइल पर हाथ लगा। जैसे एकदम खुशी की लहर दौड़ गई उसने कहा,”आप इसमें ढूँढकर मेरे बेटे को फोन कर दीजिए।”

“हाँ भाई समाजसेवक हैं, लाइए!”

बेटे से बात हुई और फिर वह चाय वाला बोला ,” यार कुछ याद नहीं रहता, तो घर से निकलते क्यों हो ? यहाँ से 22 किलोमीटर है  अंबिकापुर। बेटा आ रहा है लेने, टाइम लगेगा और हाँ और ग्राहक आने वाले हैं सीट खाली कर दो।”

रामअवतार बेटे की प्रतीक्षा करता फिर यही यूँ ही कुछ दूर तक टहलने लगा।

अचानक उसे याद आया,”बहुत देर हो गई है, शाम का समय है अब मुझे घर जाना चाहिए, घर… पर किधर …?”

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2-मै केवल भारतीय हूँ

7 बजे शाम ।  छोटे से कल शाम ही तो बात हुई थी, तब तो बिल्कुल ठीक लग रहा था। अचानक ये हालात। मेरा चेतन उड़कर वहाँ पहुँच गया, अब बस मेरे शरीर को पहुँचना था। ऐसे में कम ही बोल रहा था, हर बात के होने पर बस कुछ जवाब कम से कम शब्दों में ही निकल रहे थे।
8:30 बजे शाम कैब आने में 20 मिनट दिखा रहा था, मैं सामान लिए सड़क पर था, ऑटो से जाना तय किया। हाइवे पहुँचते ही गाड़ियों की बड़ी भीड़ मिली। एक गाड़ी ऑटो से छू जैसे ही आगे निकली, ऑटो ड्राइवर उतरा और कार वाले का गिरेबान पकड़ लिया। दो तरह की भीड़ आई, एक सुलझाने, एक उकसाने। वह गालियाँ देता वापस आया और बोला,” लोकल नंबर की गाड़ी है, मैं बिल्कुल नहीं छोड़ता।  कल ही एक हत्थे चढ़ा था। भीड़ की वजह से छोड़ रहा हूँ। हमें बिहारी बोलते हैं साले।”
मुझे घर पर खड़ी अपनी गाड़ी और उसका नंबर याद आ रहा था।
***
9:15 बजे शाम मेट्रो में जो सीट मिली ,उस पर साथ एक वृद्ध महिला बैठी थी। एक कम उम्र की महिला सामने खड़ी थी। वृद्ध महिला उससे सवाल कर रही थी। वृद्धा  : ‘कहाँ काम करती हो?”
“ मीडिया”
वृद्ध :  “रोज़ बड़ी भागदौड़ हो जाती होगी न। आजकल दोनो का कमाना बहुत जरूरी है। ”
“ जी, बस सब हो जाता है, मैं पति से अलग रहती हूँ।”
“ अच्छा अच्छा। ओहो, बेचारी। ध्यान रखना, बड़ा मुश्किल है अकेले रहना।”

उससे बात रोक मुझसे बोलीं, “नार्थईस्ट की लग रही है । वहाँ की औरतों के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं। वो इतना पति को नहीं मानती।”
मुझे अपने सबसे करीबी मित्र की याद आ रही थी, जिसे वहाँ प्रेम हुआ और वह वहीं का हो गया। सुखी जीवन व्यतीत कर रहा है।

10:30 बजे शाम  रेल में आई भीड़ से सब परेशान थे। साथ बैठे व्यक्ति ने कहा, “कहाँ जाएँगे आप?”
“जी जोधपुर”
“ यहाँ कैसे किसी काम से?”
“जी जॉब करता हूँ, वहाँ परिवार है।
“ भाई, बस मजबूरी ही है। हमारी तो बनती नहीं यहाँ, बड़ा अंतर है। अब इन यूपी वालों ने तो वहाँ भी बुरा हाल कर रखा है।”

“जी” उसके आगे की बातें बस मेरे कानों तक पहुँच रही थीं पर मुझे सुनाई नहीं दे रही थी; क्योंकि मैं यूपी से विस्थापित अपने पिता के बारे में सोच रहा था। और सोचते हुए सो गया।

सुबह 6:00 बजे
अगला स्टेशन राई का बाग आना था, बड़े बड़े खेतों के बीच से रेल निकल रही थी।
पैरों की तरफ आकर बैठा व्यक्ति मुस्कुराया, तो मैं उठकर बैठ गया। उसे अच्छी तरह जगह मिल गई। दोनों ही खिड़की के बाहर देख रहे थे।
वह थोड़ा और सहज हो कर बोला, “ भाईसाहब हम तो यूपी से हैं । यहाँ मन नहीं लगता। वहाँ के खेत देखें हैं, क्या हरियाली है। यहाँ बस ये सूखा कीकर।”

मुझे अपने बचपन के रेत के ढेरों में खेले खेल याद आने लगे।
12:00  बजे अस्पताल पहुँच भाई को देख कुछ शांति हुई। पिछले कुछ घण्टों में कई चक्कर मेडिकल स्टोर के लगा दिए हैं। कभी कुछ, कभी कुछ मँगवाया जा रहा है। हर बार डॉक्टर के चक्कर पर नई लिस्ट। कम्पाउंडर आता वो अलग टेस्ट और जरूरत का सामान लिख जाता।
हेल्पर आता तो वो मेज साफ करने के बहाने बचा हुआ सारा सामान ले जाता और हाथ मे नई लिस्ट आ जाती।
इस बार डॉक्टर के आते ही मैनें सब डॉक्टर को बता दिया।  डॉक्टर के जाते ही कम्पाउंड बोला, “ आज सुबह ही आए हो, कहाँ काम करते हो?”
“ दिल्ली”
“हाँ, तभी डेढ़ सयाने हो!”
मुझे याद आ रहा था कि जन्म से 24 वर्ष तक मैं राजस्थान के बाहर नहीं निकला था।
राजस्थान के संस्कार, प्रथाएँ ही निभाते आ रहे थे।

मुझे लगा मैं कहीं का नहीं हूँ।

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3-बेटे -बेटियां उधार के

पहली किन्नर प्रिंसिपल बन्ने पर रानी को सम्मानित किया गया, अख़बार में फोटो भी छपा। लगा की आज इस समाज में अस्तित्व आखिर पा ही लिया उसने। उसके मन विचलित हो उठा उसे अपनी कचरी ताई माँ आज बहुत याद आ रही थी। एकदम विचार आया क्यूँ न मिल आयु, वो ही सबसे ज्यादा खुश हो जाएँगी ये सुनकर।

सरकारी बंगले से निकल जैसे वो उडी चली गयी अपनों से मिलने।

कुछ नहीं बदला था बस्ती में! कुछ बच्चों ने घेरा तो उसने चुप रहने का इशारा कर दिया, वो खुद जो चेहरा देखना चाहती थी कचरी ताई का।

कुछ सुन उसके कदम ताई के कमरे के बाहर ही ठिठक गए। अंदर कचरी ताई और शबनम लड़ रहे थे।

शबनम बोली, “हाँ, बना दे इन्हें भी अपनी और रानी की तरह मतलबी। आई वो तुझसे मिलने, एक फ़ोन भी किया तुझे। बड़ी बनी थी तू कांची बाई से कचरी ताई उसके लिए। अरे, उधार के बेटों से क्या कोई गोद भरी है।”

कचरी ताई की आवाज़ अब कुछ और बुढा गयी थी,” बड़ा पद है, बहुत काम होंगे उसे। इन सबको भी स्कूल जाने दे ये भी कुछ बन जाएँगी, तकदीर संवर जायेगी इनकी।”

“अरी, इनकी तकदीर की चिंता तो इनको जिंदगी देने वालो ने न की, रही सही कसर तू निकाल ले। तेरी उस बेटी के कारण अब नाचने पर पैसा देने से लोग मना करने लगे हैं। उसका उदाहरण देते हैं, अरे सब वो कैसे बन जाएँ। उस एक ने इनसब की रोटी छीन ली। अब शरीर बेचकर ही रोटी मिलनी है तो इन्हें अनपढ़ ही रहने दे और मुश्किल न बना इनका जीवन।, कह शबनम जिस तेजी से गयी उसकी नज़र रानी पर न पड़ी।

 अंदर आकर रानी के मुह से बस इतना ही निकला,”माँ, पालने को मुझे भी कुछ बेटे, बेटियां उधार दे दे।”

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4-डंप यार्ड

वैज्ञानिक विकास की सीमा पार कर मानव ने अपना ठिकाना दूसरी गैलेक्सी के ‘विकानो” गृह पर बना लिया।

सीमित कृत्रिम वातावरण, एकोइस्फेर बनाये गए।

उस समय के 2 बच्चे ईवा और रैम चुपके से गैलेक्सी के बाहर घुमने निकल गए। रैम हमेशा ही अपने अस्तित्व के इतिहास रुचि रखता था।

वह जानबूझ कर प्रतिबंधित मिल्की-वे गैलेक्सी घुसा। वह पृथ्वी के कुछ पास पहुँचा ही था, घातक रेडियो एक्टिव रेडिएशन का इंडिकेशन आया।

छोटी( पर समझदार )ईवा जो अभी यान की स्थिति से अनजान थी, ने प्रश्न किया,”रेडियो एक्टिव…यहाँ?.. पर जीवन तो सिर्फ विकानो पर ही है ना? तो ये?”

“यस,यस, यस, पहली बार इतनी पास से निकला हूँ। यह पृथ्वी है, जहाँ विकानो से पहले हम सब, यानी कि ह्यूमन रेस रहते थे। न्यूक्लिर वेस्ट आदि से इस ग्रह का ये हाल हो गया है कि अब जीवन यहाँ संभव नहीं”

मासूम इवा बोली, “ओह, हाँ। मैंने भी पढ़ा था, कितने मूर्ख थे न हमारे पूर्वज वर्ना अपने घर को ही डंप यार्ड कौन बनाता है।”

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5-शिक्षा – एक युद्ध

पिटते- पिटते मेरे मस्तिष्क ज्वालामुखी में लगातार मानसिक विस्फोट हो रहे थे। लावा रोम रोम से पसीना बन बह रहा था। कान लाल पड़, जल रहे थे।

स्कूल के पिछले तीन दिन से मुझे सबके सामने ज़लील किया जा रहा था, पर आज पिता जी को बुला लिया गया था। पिताजी ने सब सुना , तो वे आपा खो बैठे। वो लगातार मुझे पीट रहे हैं, बाकी कई शिक्षक हमारे आसपास खड़े आग में घी डालने का काम भी कर रहे थे।

असल में  जो चल रहा था, वह सत्ता की घोषणा का जंगल वाला तरीका था। उन्हें  मुझे तोड़ना था और मुझे बस तने रहना था।

‘क्यों आँखे झुकाऊँ, साँस फूलने तक पीट लें। कत्ल तो कर नहीं सकते।

 चुनौती भी तो उस गणित के बुढऊ ने दी थी, ‘परीक्षा में पास होके दिखा’ से ‘बाप का बेटा हो तो चाहे पर्ची ला कर दिखा।’ रोज लाया रोज़ पकड़ा गया।

और वो 8पीएम भी तो कुछ नहीं बोलता , वैसे तो रोज़ शाम को पापा के पास बैठा 8 बजाता है।’

पीछे खड़े शिक्षक राजू की ओर अपनी जलती आँखें घुमाई।

तभी श्वेता मैम, स्कूल की सबसे नई टीचर, पापा को रोकते रोते हुए मेरे पास आई और बोलीं, “क्यों हो तुम ऐसे? तुम्हारे भविष्य के लिए कहते है, भले के लिए कह रहे है हम सब। कुछ पढ़ लोगे कुछ बन जाओगे।”

“मैडम, आप कौन-से कुछ बने, यहाँ पढ़ाते हैं, पर ट्यूशन के ग्रेस से घर चलते हैं ।” अहम पर लात का जवाब भी मुझे कमर पर पड़ी आखिरी लात से मिला और मैं थोड़ी दूर जा गिरा।

“बदतमीज़, यू शुड बी अशमेड ऑफ योरसेल्फ़!” कह वो भी चली गईं।

सबने मुझे वहीं गिरा ही रहने दिया।

क्यों हूँ मैं ऐसा? ये सवाल मुझसे था या उनका खुद से।

तीसरी में बता दिया गया कि मैं पढ़ने में फिसड्डी समूह में हूँ, पाँचवी तक वो समूह और मेरी उसमे सदस्यता को जैसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिल गई हो। उसके बाद भी स्कूल भेजा जाता रहा ,पर सबके लिए अदृश्य रहा।

और दसवीं में माँ के डाँटने, समझने, रोने पर पढ़ा भी, फिर भी जो ‘पास’ लिखी मार्कशीट आई, उसपर माता पिता रिश्तेदारो ने जीवन में ‘असफल’ होने की मोहर लगा दी थी।

ग्यारहवीं में मैंने जो रास्ता चुना, खुद को वापस खोज लाने का, तुम्हारी दिक्कत उससे है, मैं कभी खोया भी था उससे नहीं।

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