जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: May 1, 2020

1-मधु जैन

स्नेह पथ

अंजू सामान समेटते हुए बड़बड़ाती जा रही ‘आज फिर देर हो गई।’ जैसे ही गाड़ी के पास पहुँची ‘‘ओफ् हो चाबी तो टेबिल पर ही छोड़ आई, देरी में और देरी’’ झुँझलाती हुई चाबी लेने ऊपर जाती है।

अब गाड़ी और मन दोनों ही चलायमान हो गए।

वह जल्दी से जल्दी घर पहुँचना चाहती थी। सास-ससुर कुछ ही दिनों के लिए ही तो उसके पास रहने आए हैं। वैसे तो सासू माँ मदद करती है ,पर मलेरिया बुखार आने की वजह से कमजोर हो गई है। सोचा था इन दिनों उनकी खूब सेवा करूँगी। सिग्लन पर बत्ती देखते ही चेहरा लाल हो गया।

फॉरेन डेलीगेशन आने के कारण तीन दिन से लगातार लेट हो रही हूँ। दो दिन से पतिदेव बाहर से ही खाना मँगवा रहे थे। अधिक तेल, मिर्च-मसाला के कारण उन्हें खाना पसंद नहीं आ रहा था। सोचा था आज घर पर ही उनके पसंद का बनाऊँगी। इस सिग्नल पर मन खुश हो गया। घर पहुँचते ही माँ को बिस्तर पर बैठे देख तसल्ली हुई।

‘‘मम्मी जी अब कैसी तबीयत है आपकी? काम इतना था कि फोन पर भी आपकी तबियत नहीं पूछ पाई।’’ चेहरे पर अपराध बोध झलक रहा था।

‘‘मैं अभी आपके लिए कुछ बढ़िया-सा बनाती हूँ।’’

‘‘अरे! इतनी हड़बड़ाई हुई क्यों है? पहले हाथ मुँह धोकर, कपड़े बदलकर तो आ।’’ सासू माँ ने उसकी ओर देखते हुए कहा।

फ्रेश होकर आने के बाद सबको डायनिंग टेबल पर बैठे देखा।

‘‘अरे! आपने आज फिर बाहर से खाना मँगवा लिया । मैं अभी बनानेही वाली थी।’’

‘‘आज तो पापा जी ने खाना बनाया है?’’ पतिदेव ने गर्व से कहा।

आश्चर्य से ‘‘आपने पापा जी? आपको खाना बनाना आता है।’’

‘‘आता तो नहीं, पर आज मैंने तुम्हारी सासू माँ के निर्देशन में राष्ट्रीय भोजन बनाया है।’’

          ‘‘खिचड़ी’’

          कुकर खोलते ही ‘‘वाह! क्या खुशबू है।’’ खुश होते हुए अंजू बोली।

          पहला निवाला मुँह में डालते ही अंजू की आँखों से आँसू निकलने लगे।

          ‘‘ओह! लगता है मैंने मिर्च ज्यादा डाल दी बहू।’’

          ‘‘नहीं पापा जी, मिर्च तो ज्यादा नहीं आपने प्यार ज्यादा डाल दिया।

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2-शगुन

          मालती कल ही अस्पताल से बहू को लेकर लौटी थी। और आज हिजड़ों की टोली उसके दरवाजे पर, बहू को लड़की जो हुई है। काफी बहस के बाद टोली लौट रही है, सीमा दरवाजे पर खड़ी देख रही हैं । उसने उन्हें रोका।

          ‘‘शब्बो इधर आना।’’

          ‘‘क्या बात है दीदी।’’

          ‘‘कितने पैसे लिए तूने मालती से।’’

          ‘‘2500 रुपये दीदी ,वो तो लड़की है; इसलिए मान गई । लड़का होता तो 5000 से कम न लेती।’’ हाथ नचाते हुए बोली।

          ‘‘उन्होंने तुझे 2500 रुपये दे दिए।’’

          ‘क्यों न देती ,हमारी बददुआओं से सभी डरते हैं।’’

          ‘‘एक बात कहना चाहती हूँ, बुरा न मानो तो।’’

          ‘‘अरे दीदी एक आप ही तो हो ,जो तीज  त्योहार में बिना माँगे जी खोलकर देती हो आपकी बात का बुरा कैसा।’

          ‘‘तुम तो बददुआ कर डर दिखाकर पैसा ले आईं;  लेकिन इन पैसों के साथ अपने लिए कितनी बद्दुआएँ लाई हो मालूम है।’’

          ‘‘मैं समझी नहीं दीदी।’’

          ‘‘मालती का बेटा दैनिक वेतन भोगी है, घर का खर्चा मुश्किल से चलता है, ऊपर से डिलेवरी ऑपरेशन से।’’

          ‘‘नार्मल डिलेवरी में डॉ. की कमाई नहीं होती दीदी।’’

          ‘‘कल मैं मालती से मिली थी उसने बताया था- डिलेवरी के बाद तीन हजार रुपए बचे हैं जिससे वह बहू की दवाइयाँ और कुछ मेवा लाने वाली है।’’

          शब्बो आपस में बात करने के बाद पुनः मालती के दरवाजे पर पहुँची।

          ‘‘अब क्यों आई हो और नहीं दे सकती।’’ बेबसी से।

          ‘‘अरे नहीं, लक्ष्मी को लेकर बधाई करनी है।’’

          वे सभी नवजात बच्ची को लेकर खूब नाचते गाने लगे और ढेरों आशीष देने लगे, साथ ही 3000 रुपये देते हुए,    ‘‘ये हमारी तरफ से बच्ची का शगुन।’’

          मालती का हाथ स्वतः ही उसके सिर पर पहुँच गया।

          शब्बो को तो पहली बार इतना बड़ा शगुन मिला।

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3-कोहरा

          ‘‘आज इतनी जल्दी जा रही हो रश्मि।’’

          ‘‘माँ देखो न! मेरा टमी। वाकिंग के साथ थोड़ी एक्सरसाइज भी करना है।’’

          ‘‘पर यह बैग।’’

          सकपकाते हुए, ‘‘वह मैं ऊपर रखने जा रही थी।’’

          ‘‘ला मुझे दे। मैं रख देती हूँ।’’

          रेलवे स्टेशन तीन किलोमीटर दूर है। कोहरा बहुत अधिक होने से सामने का भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। जल्दी -जल्दी कदम बढ़ाते हुए, ‘छह बजे तक स्टेशन पहुँचना है वरना ट्रेन निकल जाएगी।’’

          मन भारी था। बार-बार अपने मन से सवाल करती क्या वह सही कर रही है?

          वह शरद से प्यार करती है। शरद अभी शादी पर जोर दे रहा है।

          ‘‘रश्मि तुम गहने और रुपये लेकर स्टेशन पर आ जाना। मैं भी गहने और रुपये ले आऊँगा।’

          ‘‘लेकिन शरद क्या यह ठीक होगा….?’

          ‘‘कमाने लगूँगा ,तो ब्याज सहित लौटा दूँगा।’’

          ‘‘ओफ्! सवा छह बज गए । ट्रेन न निकल गई हो।’’

          स्टेशन में घुसते ही चैन की साँ ली।

          ‘‘चलो! अच्छा हुआ कोहरे की वजह से ट्रेन लेट हो गई।’’

          ट्रेकसूट  पहने होने के कारण और लोगों की सवालिया नजरों से बचने के लिए वेटिंग रूम में जाकर बैठ गई।

          वेटिंग रूम में लगे टीवी पर प्रवचन चले रहे थे।

          ‘‘ईश्वर ने हमें माता-पिता के रूप में एक अनमोल तोहफा दिया है, सभी रिश्ते  दौलत से खरीदे जा सकते हैं, पर माता पिता को पाने के लिए दूसरा जन्म लेना पड़ेंगा। इनका कभी भी दिल नहीं दुखाना। माता-पिता ही है, जो हमेशा निस्वार्थ प्रेम करते हैं।’’

          रश्मि उठकर बाहर आ गई, आवाज फिर भी सुनाई दे रही थी।

          ‘‘किसी भी नए कार्य की शुरूआत उनके आशीर्वाद से कीजिए आप कभी असफल नहीं होगे।’’

          ‘‘आज तक मम्मी- पापा ने मेरी किसी बात को मना नहीं किया, एक बार बात तो करनी ही चाहिए, अब मैं भी अपने नए जीवन की शुरूआत उनके आशीर्वाद के बिना नहीं करूँगी।’’ 

          कोहरा छँटने लगा था।

          वह घर जाने के लिए मुड़ती है कि ट्रेन  आती हुई दिख रही, ट्रेन  के रुकते ही शरद, रश्मि के पास आया और खाली हाथ देखकर बोला- ‘‘बैग कहाँ है?’’

          ‘‘नहीं ला पाई।’’

          गुस्से से, ‘‘अब हम शादी कैसे करेंगे।’’

          ‘‘तुम तो लाए हो न।’’

          धीमी आवाज में, ‘‘नहीं।’’

ट्रेन के चलने पर दौड़कर चढ़ते हुए, ‘‘अच्छा कल मिलते है। बैग लेकर आना।’’

          तभी माँ का फोन आया।

          ‘‘गलत रास्ता पकड़ लिया था माँ। थोड़ा भटक गई थी। बस आ रही हूँ।’’

          फोन बंद करते ही स्क्रीन पर शरद का नंबर चमका, उसने नं. डिली कर उसे ब्लॉग किया।

          कोहरा पूरी तरह छँट चुका था। बादलों की ओट से सूरज मुस्कुरा रहा था।

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4-अंतिम पंक्ति

          सुमनलता उम्र के उस दौर पर पहुँच गई थी। जहाँ लोगों को अकेला और खालीपन काट खाने को दौड़ता है। उसे पढ़ने का शौक तो था ही, फेसबुक मित्रों और लेखन से अपने खालीपन को भर लिया।

          उसने आज कए कहानी लिखी, जिसके अंत को लेकर असमंजस में है।

          ‘‘किसकी सलाह लें।’’ सोच ही रही थी कि सुकू बाई पर नजर पड़ी, ‘‘क्यों न आज इससे ही पूछ जाए?’’

          ‘‘नहीं!नहीं ये तो यही कहेगी शराबी पति ने मारपीट कर भगा दिया।’’

          ‘‘आभा से ही बात की है।’’ फोन उठाती हैं। फिर रख देती है।

          ‘‘नहीं! एक बार सुकू बाई से ही पूछती हूँ, आखिर लिखी भी तो उन्हीं लोगों पर हैं।’’

          ‘‘सुकू बाई दो कप चाय बनाना।’’

          ‘‘जी दीदी, इस कमरे में पोंछा लगा लूँ, फिर बनाती हूँ।’’

          ‘‘और हाँ पहले साबुन से हाथ धो लेना।’’

          ‘‘दीदी आपकी चाय।’’

          ‘‘तू भी अपनी यहीं ले आ।’’

          ‘‘कोई कहानी सुनाना है क्या दीदी?’’

          ‘‘नहीं रे, आज तुझसे कहानी पर सलाह लेना है।’’

          आश्चर्य से! ‘‘मुझसे।’’

          ‘‘तुम्हीं लोगों के ऊपर तो कहानी लिखी है।’’

          कहानी सुनाने के बाद ‘इसमें दो अंत है। अच्छा अब तू बता कौन सा सही लग रहा, पहला पति उसे चरित्रहीन कहकर घर से निकाल देता है और दूसरा वह स्वयं बच्चों को लेकर घर से निकल जाती है।’’

          ‘‘दीदी, मेरे हिसाब से तो दोनों ही सही नहीं है।’’

          ‘‘अच्छा, फिर तेरे हिसाब से सही क्या है?’’

          ‘‘पहली बात तो हम लोग इतने गिरे हुए नहीं है । घरों में हम पुरुषों की कैसी-कैसी नजरों का सामना करते हैं, क्या बताए?’’

          और दूसरी बात हम अनपढ़ जरूर है, पर इतना तो कमा ही लेते हैं कि अपने परिवार का पेट भर सके।’’

          ‘‘मान लो अगर उस जगह तुम होती तो क्या करती?’’

          ‘‘मैं होती! तो उस शराबी-कबाबी, हरामी को ही घर से निकाल देती।’’

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5-तीर्थ यात्रा

          मास्टर काशीनाथ की ट्रेन जैसे ही स्टेशन पर रुकी, गाँव के लोगों ने माला पहनाकर मास्टर और उनकी धर्मपत्नी का स्वागत किया, तथा गाजे बाजे के साथ गाँव में ले गए।

          ‘‘मास्टर साब आपके तो भाग्य खुल गए, मुख्यमंत्री की तीर्थयात्रा योजना से आप तो चारों धाम कर आए, हमारे भाग्य न जाने कब जागेगे।’’

          ‘‘जागेगे नत्थू भैया जागेगे।’’

          ‘‘अच्छा मास्साब कछु हमें भी बताओ, बद्रीनाथ पहुँचके केसो लगो।’’

          मास्साब की पत्नी बीच में ही बोल पड़ी ‘‘जे का बताहे हम तीर्थयात्रा पर गए ही नहीं, अस्पताल में पड़े रहे।’’

          ‘‘काय का भव कोनऊ की तबीयत खराब हो गई थी।’’

          ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है, सब बैठो हम बताते हैं।’ मास्साब बोले।

          ‘‘हमारे डिब्बा में एक नवयुवक जोड़ी भी बैठी थी हम यहाँ से दो तीन घंटे ही चले थे कि उस नवयुवक को हार्टअटैक आ गया वो।  तो हम भी हार्ट के मरीज हैं सो हमारे पास दवाइयाँ थी। हमने सर्विटाल आ गया वो तो हम भी हार्ट के मरीज़  हैं,सो हमारे पास दवाइयाँ थी हमने सर्विटाल जीभी के नीचे राख दी और जो कुछ मालूम था वो इलाज भी करने लगे, जब तक डॉक्टर भी आ गए, स्टेशन पर उनके साथ हम भी उतर गए, उन्हें अकेला कैसे छोड़ते इस हालत में, दान पुण्य के लाने जो पैसा ले गए थे। वो उसके इलाज में लगा दिया। अब वह स्वस्थ हैं और हमारी भी लोटन का समय हो गया था, सो हम आ गए।’’

          ‘‘वाह मास्साब आपने तो एकई बार में कई बार चारों धाम को पुन्न कमा लओ।’’

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