1-होली
होली का दिन था।रंग-गुलाल का त्यौहार।उसे पति की याद आ रही थी।अचानक सीमा पर आतंकवादी
गतिविधियां बढ़ गयी थीं।इसलिए सबकी छुट्टियाँ कैंसिल कर दी गई थीं। पहली होली पर पति
के न आ पाने से उसका मन आज बहुत उदास था। होली बेरंग हो गयी थी।
पति के दोस्त और पास-पड़ोस के बच्चे होली के बहाने मोहल्ले की नयी भाभी को देखने बड़े उत्साह से आ-जा रहे थे। वे परिवार के बुजुर्गों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेते हुए उसके पास आते। ” भाभी ! भाभी ! ” करते हुए उसके गालों पर गुलाल लगाते।प्लेट में रखे काजू-किशमिश-मखाने उठाते और खाते हुए निकल जाते। देवर सिद्धू कोने में खड़ा यह सब देखता-मुस्कुराता रहता। उसे सिद्धू की मुस्कुराहट में कुटिल शरारत नजर आ रही थी।उसकी ओर देखते हुए कहा -” आओ, तुम भी भाभी को गुलाल लगा लो। “
” नहीं। ” सिद्धू ने सिर और हाथ हिलाते हुए कहा -” सबको लगा लेने दीजिए भाभी।अंत में, जहाँ जगह बचेगी, वहाँ मैं गुलाल लगा लूँगा। “
सिद्धू का जवाब सुन वह ऊपर से नीचे तक सिहर गयी।किशोरों-युवकों द्वारा
होली के बहाने की जाने वाली अभद्रता और बदतमीजियों की बहुत-सी कहानियाँ पढ़ीं और सुन
रखी थीं उसने। उनकी उद्दंडता से वह वाकिफ थी। अनजाने भय से वह काँप उठी। पर्व-त्यौहार
का दिन था। परिवार में किसी से कुछ कह भी नहीं सकती थी।
देर शाम तक लोगों का आना-जाना लगा रहा। जब खाने
का समय हुआ, तो उसे ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे सिद्धू से कहना जरूरी लगा -” देवर जी, आप गुलाल नहीं लगवाएँगे ?
“
” नहीं भाभी, आपको तो हम लगाएँगे । ” शरारत भरे अंदाज़ में कहते हुए सिद्धू अपनी जगह से उठा।
उसके मन में समाया हुआ डर अब विशालकाय हो चुका था।मगर वह क्या करती ? औपचारिकता तो निभानी ही थी। मन-ही-मन सहमी हुई वह सिद्धू को देखने लगी।टेबुल पर रखी प्लेट से अबीर लेकर, सिद्धू जब उसकी ओर बढ़ा, तो उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।
स्पर्श के एहसास से सहसा उसने आँँखें खोलीं, तो देखा सिद्धू उसके चरणों में झुका हुआ था – ” भाभी, आशीर्वाद दीजिए। ”
सुनकर उसका रोम-रोम स्पंदित हो उठा था और आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। वह अभिभूत हो गयी थी। दोनों हाथों से उसका चेहरा हाथ में लेकर उसने कदमों में झुके देवर को उठाया और अपनी आँखों में छलक आए आँसुओं को आँचल की कोर से पोंछने लगी।
फागुनी बयार ने उसकी आत्मा तक को छू लिया था।
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2-कड़वाहट
आम के पेड़ पर सारे बंदर आज गुमसुम बैठे थे। जेठ की तपती धूप और गर्म लू के थपेड़े तन को झुलसा देने को उतारू थे।
बंदरों को चुपचाप देख, पेड़ से रहा नहीं गया, तो वह बोल पड़ा – ” आजकल तुमलोग मुझसे बात नहीं करते हो भाई ? क्या बात है ? “
” कुछ नहीं ।बस, यूँ ही…। ” – एक बंदर ने बड़ी बेरूखी से कहा और इधर-उधर देखने लगा।
” कोई तकलीफ है, तो मुझे बताओ। ” – पेड़ ने अपनी पत्तियों से उन्हें सहलाते हुए बड़ी आत्मीयता से पूछा।
दूसरे बंदर ने रूआंसे स्वर में कहा – ” क्या बताएँ….! कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है। बहुत दु:खी हैं हम। पेड़ों से न तो अब हमें आश्रय मिलता है, न ही फल-फूल।मजबूरन, हम गाँव-शहर में जाते हैं। वहाँ से भी हमें बेरहमी से मारकर भगा दिया जाता है।आखिर हम जाएँ तो कहाँ जाएँ ? हमारा तो जीना मुश्किल हो गया है। ”
” तुम हमारे पास ही रहो। हम तुम्हारी रक्षा करेंगे। ” – पेड़ ने द्रवित होते हुए बड़े-बुजुर्ग की अपनी भूमिका का निर्वाह किया।
” तुम क्या हमें आश्रय दोगे, पेड़ भाई ? ” – तीसरे बंदर ने रोनी हँसी हँसते हुए कहा – ” ….तुम्हारे अस्तित्व पर तो खुद ही संकट है। “
” हम्म्…। हमें मिटाकर इन मनुष्यों ने कंक्रीट के जंगल उगा लिए हैं। ” – सामने दूर-दूर तक फैली गगनचुंबी अट्टालिकाओं को देख ठंडी आहें भरते हुए पेड़ ने कहा।
” पेड़ भाई, अब तो तुम्हारे फल भी मीठे नहीं रहे। कड़वे हो गये हैं।” – चौथे बंदर ने उलाहना दिया।
” हम क्या करें भाई ? जब इस हवा-पानी-मिट्टी में ही घृणा, नफरत, ईर्ष्या, द्वेष का जहर घुल रहा है, तो फिर हमारे फल इससे अछूते कैसे रहेंगे ? ” – पेड़ ने चिंंतित होते हुए निरीह भाव से कहा।
धूप और तीक्ष्ण हो गयी थी, जो धरती को झुलसाने लगी थी। पेड़ पर फिर से सन्नाटा पसर गया था। बस, तेज गर्म हवा से पत्तों के थरथराने की आवाज सुनाई पड़ रही थी।
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3- नुमाइश
” आपलोग सूट में देखना चाहेंगे या साड़ी में ? ” लड़की के पिता ने निरीह भाव से लड़के के पिता से पूछा। लड़के वाले आज शगुन को देखने आए हुए थे।
शगुन ऊब गयी थी अपनी बार-बार की इस नुमाईश से।वह सोचती थी, पढ़-लिख लेगी तो कम-से-कम इस त्रासद प्रक्रिया से तो बार-बार नहीं गुजरना पड़ेगा उसे। वह सुंदर नहीं है तो क्या हुआ ?
कितनी कठिनाइयों से तो माँ-बाबूजी ने उसे यूनिवर्सिटी भेजा था। लड़के वालों के इंकार कर देने पर माँ-बाबूजी की आँखों में उतर आए निराशा के भावों को कितनी बार तो पढ़ा है उसने ! क्या मतलब है ऐसी पढ़ाई का, जो हम लड़कियों को समाज में नुमाईश की वस्तु बनने से नहीं रोक सकती ?
सोचते-सोचते उसका ध्यान भंग होता है ड्राइंग रूम से आती लड़के के पिता की आवाज़ से – ” देखिए भाई साहब, हमारी कोई च्वाइस नहीं है।न ही हमारा कोई दबाव है। लड़की जिस ड्रेस में ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करती हो, वही पहने। “
सुनकर शगुन की आँखों में आत्मसंतोष और आत्मविश्वास की चमक उभर आई थी। उसे सब कुछ अच्छा लगने लगा था।
आज उसे पहली बार लगा कि वह नुमाईश की वस्तु नहीं है, और…वह बड़े उत्साह से तैयार होने चली गयी।
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4-अपाहिज
” ऐ लंगड़े।”
” हाँ। बोलो।”
” कैसे हो तुम ? “
” ठीक हूँ। तुम कैसे हो अपाहिज ? “
” क्या कहा ? “
” अपाहिज। “
” क्यों ? क्या मैं अपाहिज हूँ ? “
” हाँ। बिलकुल। तुम अपाहिज हो। “
” तुम ऐसा कैसे कह सकते हो लंगड़े…. मेरा मतलब, ललन ? ” उसने बुरी तरह चिढ़कर, तिलमिलाकर कहा।
” तुम मानसिक रूप से अपाहिज हो। ” ललन ने कहना शुरू किया – “….क्योंकि तुम्हारे अंदर संवेदना नहीं है।अरे, मैं भी तुम्हारी ही तरह हाथ-पैर से दुरूस्त था। एक्सीडेंट में मेरा पैर क्या टूटा, तुम लोगों ने तो मेरा नाम ही लंगड़ा रख दिया ! ” ललन की आँखों में आँसू भर आए थे। दिल में दबा-थमा गुबार आज मानो फूट पड़ा था – ” मैं लंगड़ा हूँ न ? ठीक से चल नहीं पाता।मगर फिर भी मैंने तुम्हारी तरह कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली। तुम्हारे अंग-प्रत्यंग तो सलामत हैं, मगर सोच..? तुम जिस नजर से गाँव की लड़कियों को देखते हो और जैसे-जैसे कमेंट करते हो, उससे तुम्हारी नीयत और मानसिकता का पता चल जाता है।धर्म और जाति के नाम पर जिस तरह की बहस करते हो, उस पर तो घिन आती है।राजनीति के कचरा घर की सड़ांध फैलाकर तुम जैसों ने घर-परिवार-समाज तक को विषाक्त बना रखा है। दारू-शराब-कमीशनखोरी-गोली-बंदूक-हिंसा की खूब बातें करते हो, और कहते हो कि तुम स्वस्थ हो ? अरे, तुम्हें पता ही नहीं है कि तुम अपाहिज हो चुके हो….मानसिक रूप से अपाहिज ! भई, मैं तो लंगड़ा ही भला। ”
लंगड़े ने प्रबल आत्मविश्वास से उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा और गाँव की ओर मुड़ गया।
अचानक वहाँ खामोशी छा गयी थी।बस, दूर जाती बैशाखी की आवाज़ सुनाई दे रही थी। पुलिया पर बैठे गाँव के सारे लड़के अवाक्, विस्फारित नेत्रों से लंगड़े को जाते देख रहे थे। उनकी बुद्धि, चेतना, तर्कशक्ति ….सब कुंद पड़ गई थी। बैशाखी की ” ठक-ठक ” की आवाज़ उनके दिलो-दिमाग पर हथौड़े की मानिंद चोट कर रही थी। सब एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे या मुँह चुरा रहे थे, पता नहीं चल रहा था।
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5- लाल डिब्बा !
” दादा जी।दादाजी। मुझे लेटर लिखना सिखा दीजिए।” – स्कूल से आते ही पिंकी बस्ता टेबुल पर रख, दादा जी के पास आ गयी थी ।
” क्यों बेटा ?आज स्कूल में होमवर्क मिला है क्या ? ” – दादा जी ने गोद में आ बैठी पोती को पुचकारते हुए पूछा।
” हाँ, दादा जी।” – पिंकी ने उनकी ओर देखते हुए कहा।
” ठीक है, बेटा। पहले फ्रेश तो हो लो।कुछ खा-पी लो।अभी स्कूल से आई हो न ? फिर आराम से बैठते हैं। ” दादा जी ने उसे आश्वस्त किया और अपने कमरे में चले गये।
पिंकी दादाजी की गोद से उतरी और किचन के दरवाजे पर खड़ी माँ की बाहों में समा गयी।
शाम की चाय के बाद दादा जी अपने कमरे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे, तो पिंकी हाथों में कापी-कलम लिए ” दादा जी – दादा जी ” करती उनके पास आ गयी।
” हाँ बेटा, आओ। ” – दादाजी ने अखबार टेबुल पर रखते हुए प्यार से उसे अपने पास बिठाया।
पिंकी ने पूछा- ” दादाजी, ये लेटर क्या होता है ? “
” बेटा, ये लेटर…। ” – दादा जी उस छोटी बच्ची को चिट्ठी का मतलब समझाने के लिए सरल शब्द ढूँढ़ने लगे – “….जब परिवार के लोग दूर-दूर होते थे, तो एक-दूसरे से लेटर के द्वारा ही बातें किया करते थे। तब ये मोबाइल का ज़माना नहीं था न ? ” – दादाजी ने पिंकी को बताना शुरू किया।
” दादाजी, लेटर में वे क्या लिखते थे ? ” – पिंकी ने उत्सुकतावश पूछा।
” अपना हालचाल बताते थे। उनका हालचाल पूछते थे।सुख-दु:ख शेयर करते थे। कोई संदेश या सूचना भिजवानी होती थी, तो भिजवाते थे।”
” मगर, ये लेटर उन तक पहुँचता कैसे था ? ”
” डाक से।डाकखाने से। डाकिया पहुँचाता था।जैसे आज कुरियर वाला लेटर लेकर आता है। या फिर एमेजान, फ्लिपकार्ट वाले पैकेट लेकर घर पर आते हैं न, उसी तरह। ” – दादाजी ने आज के अनुरूप उदाहरण देकर पिंकी को समझाने की कोशिश की।
” अच्छा ! हाँ दादा जी। मैं समझ गयी।” – पिंकी को कुछ याद आया और दादा जी की बात उसे समझ में आने लगी। वह खुश हो गयी थी।
” अच्छा बेटा, ये बताओ ,तुम डाकखाना…मेरा मतलब पोस्ट आफिस के बारे में जानती हो ? ” – दादाजी भी खुश हो गये थे कि चलो, उनकी बातें बच्ची को समझ में तो आ रही हैं।
” हाँ, वही न दादाजी, जहाँ पर लाल रंग का बड़ा-सा वो…डिब्बा रखा होता है और उस पर ” लेटर बाक्स ” लिखा होता है ? ” – दादाजी की ओर देखते हुए पिंकी ने हाथ हिलाकर इशारे से कहा – ” मम्मी मुझे बस स्टॉप पर छोड़ने जाती है न, वहाँ मैंने ऐसा ही एक डिब्बा देखा है। ” – पिंकी ने चहकते हुए जवाब दिया।
” हाँ। बिलकुल सही देखा है तुमने।अपने अनुभव, अपनी भावनाएँ, अपने मन की बात और अपना प्रेम कलम-स्याही से कागज पर लिखकर, लिफाफे में डालकर, पता लिखकर उसे उस डिब्बे में डाल दिया करते थे, बेटा। ” – ठंडी हवा का एक झोंका खिड़कियों से होकर अंदर आया और यादों के झरोखों पर माँ-बाबूजी, पत्नी, दोस्तों की अनगिनत चिट्ठियों के पन्ने आ-आकर दादा जी की आँखों के सामने खुलने लगे थे और एक-एक अक्षर मानो बोलने लगे थे।
” मगर दादाजी, अब तो उस डिब्बे में कोई लेटर डालता ही नहीं है ? मैंने तो कभी नहीं देखा। ” – पिंकी ने जब दादा जी की गीली हो आई आँखों में झाँकते हुए कहा, तो दादा जी उदास हो गये।
” हाँ बेटा, अब लेटर लिखता ही कौन है, इस मोबाईल-इंटरनेट के जमाने में ?अब तो एहसास, भावनाएँ और संवेदनाएँ भी शायद मशीनी हो गयी हैं ! ” – बोलते-बोलते शब्द जैसे उनके गले में अटकने लगे थे।
ठंडी साँसें भरते हुए, पिंकी को बताते-बताते वे खुद से बातें करने लगे थे, और चश्मा उतार कर अपनी आँखों के कोरों से ढुलक आए आँसुओं को पोंछने लगे थे….।
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6- श्रमेव जयते
गाँव में आज जश्न का माहौल था। बरसाती नदी पर गाँव को शहर से जोड़ने वाले पुल का सीएम द्वारा उद्घाटन होने वाला था। बाहर वाले मैदान में एक बड़ा-सा पंडाल लगा था। खूब रंग-बिरंगी सजावट थी और मेले-सा उत्सवी माहौल।
पानी कम रहने पर तो लोग पैदल ही नदी पार कर शहर चले जाते थे, मगर बरसात में नदी जब रौद्र रूप धारण करती थी, तो पूरा गाँव चारों ओर से पानी से घिर जाता था। दूर, दूसरे गाँव से होकर एक सड़क जाती थी, उससे आठ-दस किलोमीटर का लंबा रास्ता तय कर शहर जा पाते थे लोग। नाव से नदी पार करने में न जाने कितने लोगों को इस बरसाती नदी ने अब तक लील लिया था ! गाँव वालों के युगों-युगों से संचित सपने आज पूरे हो रहे थे। सभी बहुत खुश थे। तभी तो मेला लगा था वहाँ पर !
हरिया, रमुआ, इरफान, हैदर, उस्मान, शंकर, बैजू, गोपाल….सभी नये-नये कपड़े पहनकर आए थे।इन मजदूरों ने पुल बनाने में जो श्रम लगाया था, वह आज सार्थक और फलीभूत होने जा रहा था।उनके चेहरे आनंद और संतुष्टि से चमक रहे थे।
” ढम..ढम..ढम..ढम ” बजते ढोल-नगाड़ों के बीच सीएम महोदय ने मंच से जैसे ही रिमोट का बटन दबाया, बड़े से शिलापट्ट से रेशमी परदा सरकने लगा और उस पर लिखे बड़े-बड़े अक्षर झिलमिलाने लगे।
शिलापट्ट पर ढेर सारे नाम अंकित थे। सबकी नजरें एक-एक कर उन नामों पर गई और भीड़ सहसा हर्षातिरेक से झूम उठी !
उस शिलापट्ट पर किसी उद्घाटनकर्त्ता का नाम नहीं था, बल्कि सुनहरे अक्षरों में हरिया, रमुआ, हैदर, उस्मान, शंकर, बैजू, गोपाल आदि उन सभी मजदूरों के नाम अंकित थे, जिन्होंने उस पुल के निर्माण में अपना श्रम, रक्त और पसीना बहाया था..!
-0– विजयानंद विजय,आनंद निकेत,बाजार समिति रोड,पो. – गजाधर गंज,बक्सर ( बिहार ) – 02103
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