1-वॉचमैन
बहुत देर तक मित्र से बातें, खाना-पीना, हँसी मज़ाक हो चुकने के बाद वह मित्र को विदा करने अपने गेट की ओर चल दिया। जाते-जाते मित्र की दृष्टि उसके घर के बाहर लॉन में पड़ी तो अनायास ही उसके मुँह से निकल पड़ा। “यार पिछली बार जब मैं आया था तो तुम्हारे यहाँ दो बड़े-बड़े कुत्ते वहाँ बंधे थे… शायद जर्मन शेफर्ड नस्ल के थे! कहाँ गए?” उसने अफसोस जताते हुए कहा, “क्या बताऊँ यार? दो साल पहले एक इन्फेक्शन के कारण दोनों की अचानक मौत हो गयी।”“ओह…वैरी सैड…तो फिर क्यों नहीं पाले? आखिर इतने बड़े घर की रखवाली करने और अनजान आदमी से सावधान करने के लिए कुत्ते का होना ज़रूरी है। कुत्ते न सही कोई वॉचमैन ही रख लो।” मित्र ने सुझाव देते हुए कहा। वह बोला, “नहीं यार अब हमें कुत्ते या किसी वॉचमैन की आवश्यकता नहीं रही।”“क्यों?” मित्र ने प्रश्न किया। “क्योंकि गाँव से पिताजी को बुला लिया है…” उसने लॉन में पड़ी चारपाई पर लेटे वृद्ध की ओर संकेत करते हुए कहा। मित्र ने एक दृष्टि वृद्ध की ओर और दूसरी उसकी ओर उठाई तथा चुपचाप गेट से बाहर निकल गया।
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2-स्मार्टसिटी
सभापति जी के आने में अभी विलम्ब था। उनके आते ही स्मार्टसिटी बनने वाले नगरों के नामों की घोषणा की जानी थी। समय बिताने के लिए सभी मेयर अपने-अपने महानगर की उपलब्धियों और वहाँ की विशेषताओं पर एक-दूसरे से चर्चा और टिप्पणी कर रहे थे। बीच-बीच में कोई किसी पर व्यंग्य भी कर देता तो सदन ठहाकों और तालियों से गूँज उठता। इसी क्रम में एक मेयर ने दूसरे से कहा, “आपका नगर सचमुच महानगर है। आए दिन सुर्खियों में रहता है। बड़े-बड़े मॉल, कालेज, चौड़ी सड़कें और भी न जाने क्या-क्या है आपके नगर में। रोज़ ही कोई न कोई खबर अखबार में पढ़ने को मिल ही जाती है कभी आपके नगर के विकास की तो कभी चोरी-डकैती-बलात्कार की। अभी कुछ दिन पहले ही तो अखवार में पढ़ा था कि आपके नगर के वृद्धाश्रम में भूख से एक वृद्धा की मौत हो गयी।“ एक पल की चुप्पी के बाद वेमाहौल को सामान्य बनाते हुए फिर बोले, “…वैसे साहब इस प्रकार की घटनाएँ होना भी जरूरी है। इसी से पता चलता है कि नगर अब महानगर में बदल चुका है।…और बड़े-बड़े नगरों में ऐसी घटनाएँ होना उसके लिए सोने पर सुहागा है। आपको बहुत-बहुत बधाई हो।” यह सुनकर सदन में ठहाका गूँजने लगा।
“हे…हे…हे…बहुत-बहुत धन्यवाद। क्या किया जाए साहब, इतना बड़ा शहर है…कहाँ तक ध्यान रखा जाए…और फिर यदि शहर में हलचल नहीं होगी तो फिर मज़ा ही क्या है?”सबने जोरदार ठहाका लगाया और दूसरे मेयर ने बात आगे बढ़ाई, “वैसे आपके महानगर की बात भी कुछ कम नहीं है। सुना है आपने अपने नगर के चारों अनाथालयों और तीनों वृद्धाश्रमों का काया पलट ही कर दिया। सभी को वातानुकूलित कर दिया।” सभी ने ताली बजाकर उनका अभिवादन किया। दोनों मेयर अपनी-अपनी प्रशंसा पर फूले नहीं समा रहे थे कि तभी किसी ने एक किनारे चुपचाप बैठे एक मेयर की ओर इशारा करते हुए कहा, “अरे, आप तो बहुत चुपचाप बैठे हैं। क्या हुआ? आप भी कुछ तो बताइए अपने नगर के बारे में। क्या आप अपने नगर को स्मार्टसिटी बनाना नहीं चाहते? आप भी अपने नगर की विशेषता बताइए।”
वह मुस्कुराते हुए उठा और बोला, “जी मेरे नगर की यही विशेषता है कि मेरे नगर में न कोई अनाथालय है और न कोई वृद्धाश्रम।” कहकर वह चुपचाप बैठ गया। सदन में सन्नाटा छा गया।
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3-जवाब
उसकी आयु 17 साल के आसपास होगी, इसका अन्दाज़ा उसके बहुत तंग कुर्ते से लग रहा था। शरीर के जिस अंग को छुपाने का नारी हर संभव प्रयास करती है, उसका कुर्ता उसमें पूरी तरह सफल नहीं था। इसलिए उसने अपने जर्जर दुपट्टे को भी इस काम में लगा रखा था। दुपट्टे का कसाव उसकी जर्जर अवस्था के अनुरूप ही था, न ज्यादा ढ़ीला और न ज्यादा कसा हुआ। उसके हर संभव प्रयास के बाद भी उसके अंग दिख ही रहे थे और लोगों की दृष्टि उन पर पड़ रही थी। कुछ लोग उससे नज़रें चुरा रहे थे तो कुछ लोग चोरी-चोरी आनन्द ले रहे थे। वह कर्कश वाणी में गाती हुई भीड़ से खचाखच भरे डिब्बे में अपने हाथ में टीन का डिब्बा थामे आगे बढ़ती आ रही थी। गैलरी में खड़े लोगों में से कुछ तो उसे आगे बढ़ने का मार्ग दे रहे थे किन्तु कुछ लोग टस से मस नहीं हो रहे थे। मजबूरी में उसे अपना शरीर उनसे सटाकर ही आगे बढ़ना पड़ रहा था।
मेरी सीट के पास आकर वह रुक गयी और अपने डिब्बे में पड़े सिक्के उछाल-उछालकर गीत गाने लगी। बीच-बीच में रुककर “इस गरीब बेसहारा की मदद करो साहब…आपका परिवार बना रहे…आपका घरबार बना रहे…नौकरी में तरक्की हो…” आदि-आदिभी कहती जा रही थी। आसपास बैठे कुछ लोगों ने अपने पर्स में से एक-दो-पाँच और दस रुपये निकाल कर उसके डिब्बे में डाल दिये। एक महाशय उसे टकटकी लगाकर देख रहे थे। उन्होंने अपने बटुए में से सौ रुपये का नोट निकाला और उस लड़की का हाथ सहलाते हुए पकड़ कर“इधर आओ…यह लो” कहते हुए वह नोट उसके हाथ में थमा दिया और अपना सिर गर्व से ऊँचा उठा लिया। लड़की ने एक झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया और सौ का नोट उनके हाथ में पकड़ाकर अपने दुपट्टे को अपने शरीर पर और कसा तथा वैसे ही गाते हुए आगे बढ़ गयी। महाशय का सौ का नोट उनके हाथ में ही था, उसे वापस बटुए या जेब में रखने की उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी। सिर भी अब पहले जैसा ऊँचा नहीं था। गाड़ी के चलने की आवाज़ के साथ अगले डिब्बे से उस लड़की के गाने की बुलंद आवाज़ अभी भी आ रही थी।
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4-परफेक्ट मैच
“तुम्हारे साथ पूरी जिंदगी रोते रोते ही गुजर गई। 45 सालों में ऐसा कोई दिन नहीं आया कि सुख के दो पल चैन से बीते हों,” कहते हुए मिसेजसिन्हा ने अपनी धोती के पल्लू से आंखों की नमी को साफ किया।
“तो मैंने कौन-सी चैन की बंसी बजाई है। आए दिन के कलह-क्लेश ने मेरी जिंदगी में जो कड़वाहट भरी उसे 45 सालों से मैं भी झेल रहा हूं,” सिन्हा साहब ने अजीब समूह बनाते हुए कहा।
“तुम कहना क्या चाहते हो? क्या मैं क्लेशी हूँ? मेरे कारण तुम्हारे घर में कलेश होता रहा है? हाँ-हाँ अब तुम्हारे मुँह से यही सुनना रह गया था। शादी के कई सालों तक तुम्हारी मां और बहनों के ताने सुने और अब तुम… ठीक है कह लो तुम भी। मैं ही पागल थी जो….” कहते हुए वो रोने लगी।
“बस शुरू हो गई। यह तुम्हारी पुरानी आदत है। ज़रा सी बात का खुद ही बतंगड़ बनाकर बहस करती हो और फिर टसुए बहाने लगती हो।”
“तुम बहुत जानते हो मेरी आदतें।” मिसेजसिन्हा ने भर्रायी आवाज में कहा।
“45 साल से तुम्हारे साथ हूँ, जानूँगा क्यों नहीं” सिन्हा साहब ने कहा।
इतना सुनते ही मिसेजसिन्हा ने सिन्हा साहब की तरफ देखा और नज़र मिलते ही दोनों ओर से हंसी का फव्वारा छूट पड़ा सारी कड़वाहट पल भर में छू हो गई।
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5-मौका
“हैलो भाई साहब ! नमस्कार बुरा न माने तो एक बात पूछूं?” प्रेमा ने पति के मित्र को फोन किया।
“जी बिल्कुल पूछिए”
“सुना है आपने गुप्ता जी के लड़के से पिंकी की शादी कैंसिल कर दी”
“जी ठीक सुना है”
“पर क्यों? कोई खास वजह?”
“क्या बताऊं भाभी! सब कुछ तय होने के बाद उन्होंने 5 लाख कैश की डिमांड रख दी। इससे पहले कि मैं कुछ जोड़-गांठ करता, पिंकी ने ही शादी को साफ मना कर दिया। अब मैं क्या करता मुझे बच्ची की बात सही लगी और मैंने शादी कैंसिल कर दी।”
“अच्छा किया ऐसे लालची लोगों के यहाँ रिश्ता न करना ही ठीक है, वेरी गुड, ओके भाई साहब नमस्कार।”
फोन रखकर वह लॉन में टहलते पति की ओर दौड़ी, “सुनिए अशोक भाई साहब ने पिंकी की शादी गुप्ता जी के लड़के से कैंसिल कर दी है। केवल पाँच लाख की डिमांड पर। आप अपनी स्वीटी के लिए गुप्ता जी से बात कीजिए और बोलिए कि हम छह लाख दे देंगे। ऐसा मौका हाथ से मत जाने दीजिए। अशोक भाई साहब तो बेवकूफ निकले। भला डाक्टर लड़का फ्री में मिलता है! स्वीटी की लाटरी लग जाएगी अगर रिश्ता हो गया।”
पतिदेव ने भी गुप्ता जी को फोन लगाकर अपनी बात कह दी। 2 मिनट प्रतीक्षा करने के बाद गुप्ता जी का फोन आया। पतिदेव ने प्रेमा के सामने ही स्पीकर ऑन करके झट फोन अटेंड किया, “हेलो गुप्ता जी! बताइए क्या तय हुआ?”
गुप्ता जी ने उत्तर दिया, “हमारे बेटे की शादी आगरा में तय हो गई है वे लोग 11 लाख दे रहे हैं।” फोन कट गया। उत्तर सुनकर श्रीमती जी के मुँह से निकला, “हुँह लालची लोग!”
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