जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: August 1, 2020

1-निष्ठुर 

ट्रेन में समय गुजारने के लिए बगल में बैठे अधेड़ से बात करना शुरू किया नीति ने ” आप कहाँ तक जाएँगे अंकल। “

 ” इलाहाबाद तक। “

 उसने ठिठोली की ” कुंभ लगने में तो अभी बहुत टाइम है। “

 ” वहीं तट पर इंतजार करेंगे, कुंभ का बेटी ब्याह लिए , अब तो जीवन में कुंभ नहाना ही रह गया है। “

 ” अच्छा परिवार में कौन कौन है। “

” कोई नहीं बस बेटी थी पिछले हफ्ते उसका ब्याह कर दिया। “

” अच्छा ! दामाद क्या करता है। “

” उ हमरे बेटी से पियार करता है। ” कहते हुए उसने आँखें पंखे पर टिका दीं।

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद जब नीति ने उसके कंधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा ” दुख बाँटने से कम होता है अंकल ” तो मानों भाखडा बाँध के चौबीसों गेट एक साथ खुल गए। थोडा संयत होने के बाद उसने बताया ” बेटी ने कहा अगर उससे शादी नहीं हुई, तो ज़हर खा लेगी। बिन माँ की बच्ची थी उसकी खुशी के लिए सब कुछ जानते हुए भी मैंने हाँ कह दी  और पूरे धूमधाम से शादी की व्यवस्था में जुट गया। जो कुछ मेरे पास था, सब गहने जेवर आवभगत की तैयारियों में लगा दिया। तभी ऐन शादी के एक दिन पहले समधी पधारे और दहेज की माँग रख दी। जब मैंने असमर्थता जताई, तो बेटी ने कहा –आपके बाद तो सब मेरा ही है तो क्यों नहीं अभी दे देते। तो हमने घर और ज़मीन बेचकर नगद की व्यवस्था कर दी। “

” सब कुछ तो उसका ही था बेबकूफ लड़की का, आपको मना करना था। कह देते आपके मरने के बाद सब बेचकर ले जाए ”  नीति ने सीट पर जोर से घूँसा मारा।

अधेड़ मुस्कुरा उठा नीति के इस तर्क पर ” कोई बाप अपने सुख के लिए बेटी के गृहस्थी में क्लेश नहीं चाहता बेटा। “

” हद है, मतलब उस लडकी के दिल में आपके लिए ज़रा भी प्यार नहीं। “

” नहीं ऐसा नहीं है , विदाई के वक्त बहुत रोई थी। “

“और आप “

 उसने एक फीकी मुस्कान बिखेरी ” हम तो निष्ठुर आदमी हैं।  सुधा जब उसको हमरी गोद में छोडकर अर्थी पर लेटी थी, तब भी हम रोने के बदले चूल्हे के पास बैठकर बेटी के लिए दूध गरम कर रहे थे। “

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2-गंध

अनिल इस महीने लेबर इंचार्ज हो गया। पहले ही दिन दो मजदूरों की आधी हाजिरी लगाने के एवज में ठेकेदार ने एक डियो उपहार में दिया ।

ड्यूटी के पश्चात् जब घर पहुँचा, तो घर में घुसने से पहले बदन पर डियो छिड़क लिया। रोज दिनभर के पसीने से भीगी शर्ट साइकिल चलाकर लौटते वक्त हवा से सूख तो जाती थी; लेकिन गंध रह जाती थी। पत्नी के लिए कुछ खास न कर पाने का गम तो था ही उपर से ये गंध सुँघाने का पाप और करना पड़ता था। ये उसका प्रेम ही तो था कि उस गुमसाइन गंध के बावजूद वो दौड़कर गले लग जाती।

आज उसे पसीने की बदबू सुँघाने का पाप नहीं करना पड़ेगा , मन ही मन मुस्कुराते हुए पत्नी की तरफ देखा। वो दौड़ती हुई पास आकर रुक गई और नाक पर हाथ रखते हुए बोली ” ये कैसी बास आ रही है। “

वो हँसा ” बावली ये ये डियो की सुगंध है। अब तुझे पसीने की बदबू नहीं  सूँघनी पड़ेगी। “

पत्नी ने प्रश्नवाचक आँखे उसके चेहरे पर टाँग दी ” डियो तो मँहगा आता है। ऐसे उड़ाने के लिए पैसे कहाँ से आए। “

” अरे खरीदा थोड़े है। आज दो मजदूर दस मिनट लेट आए, तो हाजिरी आधी लगाई उनकी , बस ठेकेदार खुश हो गया, उसी ने दी है। “

वो पलटकर अंदर की तरफ बढ़ गई- “ऐसे गंध सूँघने का शौक होता तो ठेकेदार से ब्याह करती, तुमसे नहीं। “

पता नहीं क्यों ,डियो की महक उसे भी बदबू करने लगी।

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3-हिसाब

“दुई किलो आटा और सौ ग्राम दाल दै दो। “

” हम तो देने के लिए बैठे हैं धनिया; लेकिन बदले में हमें भी तो कुछ मिले। “

खूब समझती थी बनिये का मतलब; लेकिन ज़ब्त कर गई- ” एमकी दशहरा पर सारा अगला पिछला चुकता कर देंगे , सरितिया के बाउ बोले हैं फोन पर चिंता मति करो। “

 बनिये ने खींसें निपोरी- ” पैसे तो देर सवेर आ ही जाएँगे  भागे थोड़े जा रहे हो गाँव छोड़।कर और अब तो बिटिया भी कॉलेज जाने लगी होगी , तू क्यों हाड़ तोड़ती है,उसी को भेज दिया कर सामान लेने फुर्र से ले आया करेगी साइकिल से। ”  सामान देते हुए बनिए ने हाथ पकड़ने की असफल कोशिश की, लेकिन उसने तेजी से हाथ खींचते हुए कहा-” उसके पास कहाँ टैम है कॉलेज के बाद उ का कहते हैं भौकसिंग सीखने जाती है। कह रही थी- मेरीकोम बनेगी। “

 बनिए पर मानों किसी ने गर्म तेल डाल दिया हो उसने दाँत भींचते हुए कहा ” उसके बाप से कहना अब तक का हिसाब पाँच हजार सात सौ हो गया है। “

धनिया मुस्कुराते हुए सोच रही थी चलो पैसे का छोड़कर सब हिसाब अब बराबर हो गया।

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4-कमाई

छुटपुट अँधेरा फैलने लगा था। दलन ने बाहर साइकिल खड़ी की और आकर अम्मा के पैर छुए “कार्ड छप गया भौजी, भगवान के बाद सबसे पहला आपको अर्पण करने आया हूँ।”

“जय हो , बाल बच्चा सुखी रहे। अरे हाँ बिटिया ने झुमके के लिए कहा था। बनवा लाए हैं, ले जाओ दिखा देना। एकदम वही डिजाइन है, जैसा रमेश की बहू के लिए बनवाया था। “

अम्मा कार्ड को निहारती हर्ष ने भर गई “अरे बहू आलमारी में जेवरवाला बटुआ होगा नया सा, वो लाकर देना जरा। “

दलन वही जमीन पर पालथी मार के बैठ गया।

अम्मा की बतकही शुरू हो गई- “और बता दूध देने क्यों नहीं आ रहा आजकल , लगन के बाद कब से आ रहा है,वापस दूध देने। पैकेट वाले दूध में तो एकदम स्वाद नहीं आता। एक दिन मैं जरा मायके क्या गई, तूने दूध देना ही बंद कर दिया।”

दलन के चेहरे पर उदासी के बादल छा गए- ” बस अम्मा वो काम छोड़ दिया। जस नहीं है उसमें। “

“अरे यही दूध बेचके इतना धन संपदा बनाये हो, जस कैसे नहीं है। ” 

वह कोई सफाई देता ,उससे पहले बहू जेवर का डब्बा लेकर आ गई। उसने मुँह फेर लिया जब तक बहू  सामने रही उसकी नजरें झुकी ही रहीं।

अम्मा की अनुभवी नज़रों में बात छुप न सकी। बहू के अंदर जाते ही दलन के माथे पर हाथ रख दिया “अम्मा को न बताएगा क्या हुआ ?”

फफक के रो पड़ा दलन- ” बिटिया ने बहूरानी जैसे झुमका की बनवाने की बात की थी,सो हमने पूछ लिया झुमका कहाँ से बनवाया बहुत सुंदर है।”

अम्मा उलझ गई “तो ?”

“तो बहूरानी हमें बोली- दूध देने आते हो, भगोने में दूध डालो और चलते बनो, ज्यादा नजर दौड़ाए तो अंखिये फोड़ देंगे। बताइए रमेश बबुआ को इहे साइकिल पर केतना घुमाया। ओकी बहू हमको ऐसे बोली। घर -घर के चूल्हे तक पहुँच रही है; लेकिन हमेशा लंगोट इतना कस के बाँधें है कि गर्दन पर ओतना कस दें तो आदमी का रामनाम सत् हो जाए।”

अम्मा ने लीपापोती करनी चाही- “अरे नहीं आजकल जुग जमाना खराब है। उसी तरह तुमको भी समझ ली। नई आई है, उसको पता नहीं तुम कितने साल से दूध देते हो यहाँ। “

दलन आँखें पोंछे “उनतीस साल हो जाएँगे अगहन में ,तब हाफपैंट में आते थे अब तो देखिए बेटी का ब्याह लग गया है।”

अम्मा अतीत में पहुँच गई “हाँ याद है सब , सच सच बता रामकृष्ण की बेटी को भगाने में तुम्हारा भी हाथ था न? तूही चिट्ठी पहुँचाता था उसको। “

उसने कान पकड़े ” बेटी किरिया अम्मा, हम सिर्फ एक बार पहुँचाए थे, दूटकिया के लालच में और वापस में जब छौरी जबाव भेजी थी तब्बे मना कर दिए थे । उपर से रामकृष्ण चाचा को बता भी दिए थे। लेकिन प्रेम तो पानी के तरह होता है न ,रास्ता ढूँढिए लेता है। “

अम्मा से प्यार से धकेला “चल झूठ्ठा , तू बड़ा शरीफ़। जा रात होने लगी है। सुबह टाइम से दूध पहुँचा देना।”

खड़े होते दलन के दाँत भींच गए ” न अम्मा कहा न, छोड़ दिया वह काम। अभी देखा न, आपने भी कह ही दी रामकृष्ण के बेटी वाली बात।”

साइकिल पर चढ़ते दलन को रोकने के लिए अम्मा ने बह्मास्त्र फेंका “अच्छा महीने का हिसाब लेने तो आएगा कि नहीं।”

दलन बिना पीठ घुमाए साइकिल बढ़ा दिए ” रहने दो अम्मा जहाँ जिंदगी भर की पूँजी डूब गई , वहाँ महीने का हिसाब क्या करना। “

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5-दो बोल

चार साल बाद फिर से उसी शहर जाना हुआ पुराने कार्यालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना था। उतरा तो देखा एक किशोर कई सारे चित्रों को रस्सियों के सहारे लटका रहा था। नजर दौड़ाने पर झोले में चित्रकारी के अन्य सामान भी दिख गये।    

नजर पड़ते ही उसने आकर चरण छू लिये “नमस्कार गुरूजी “। थोड़ी हैरानी हुई ” मैं तुम्हारा गुरु कैसे “।

लड़का संकोच से भर उठा ” आपने ही तो मेरे अंदर के कलाकार को सबसे पहले पहचाना था। “

हैरानी में डूबे हुए मैं उसके बनाए सुघड़ चित्रों को निहारने लगा। उसने बताया जूते पॉलिश का काम छोड़ दिया है  अब दो साल से वह यहीं बस पड़ाव पर आनेजानेवाले पर्यटकों का चित्र बनाकर रोजी कमाता है। बढ़िया कमाई होती है विदेशी लोग चित्र लेने के साथ साथ फोटू भी खिंचवाते हैं उसके साथ।

चाय पीकर जाने की जिद की उसने तो रुक गया। मुझे वहीं मोढ़ेपर बिठाकर वह चाय लेने गया, तो मैंने दिमाग पर जोर देकर उससे हुई मुलाकात को याद किया।

कार्यालय में लापरवाही के कारण दंडस्वरूप स्थानांतरित होकर शहर छोड़ रहा था। जेठ की दुपहरी में यहीं खंभे की छाँव में सिगरेट के साथ अपना गुस्सा फूँक रहा था ।

एक फटी हुई छतरी में ये बालक जूते पॉलिश की दुकान लगाये बैठा था। मैंने जूते इसकी तरफ बढ़ाए, तो ये ब्रश के घुमाव के साथ तरह तरह से मुँह बनाते हुए पॉलिश करने लगा था। फिर जब चमकाने के लिए क्रीम लगाई, तो पहले इसने क्रीम से जूतों पर स्माइली बनाई और फिर ब्रश लेकर अपना खेल शुरू कर दिया था। तनाव में भी मुस्कुरा उठा था मैं उसे देखकर। जूते पहनते हुए पाँच के बदले दस रुपये का नोट देकर हँसते हुए कहा था ” तू कलाकार आदमी है, रख ले मेरी तरफ से इनाम समझकर। “

वह चाय लेकर आ गया था। उसे एकलव्य की उपमा देने की इच्छा हुई फिर ये खुद को महिमामंडित करने जैसा लगा।  

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6-झूठ के पाँव

हरिया को दो दिन के लिए रिश्तेदारी में जाना था। खेत में फसल लगभग पकने को थी , यही दो बीघे उसकी रोजी रोटी का साधन थे।

ऐसे में उसने फसल की सुरक्षा के लिए एक डंडे में घड़ा लगाकर उसपर खडि़या से आँख नाक बनाए और डंडे को अपना पुराना कुरता पहना कर एक बिजूका बना खड़ा कर दिया।

अब दूर से देखने वाले को लगता कि हरिया खेत में खड़ा है।

हरिया तो चला गया निश्चिंत होकर;  लेकिन  बिजूका सोच में पड़ गया। अब हरिया के फसल की जिम्मेदारी उस पर थी वो बेजान कैसे निभाएगा इस जिम्मेदारी को।

दिन भर तो पक्षियों ने बिजूका को इतना तंग किया कि उसका मन किया रोने को , लेकिन शाम को जैसे ही फुलवा की बकरी मेड़ पर से उसको देखकर मुड़ गई उसका आत्म विश्वास बढ़ गया। वह मुस्तैदी से तनकर खड़ा हो गया। फिर धीरे धीरे रात हो गई। ठण्डी बयार बहने लगी और चाँदनी चारों ओर फैल गई। पशु पक्षी सहित लगभग सारा गाँव सो गया। अल सुबह जाने कहाँ से नीलगायों का झुंड आया, जो पूरी फसल को रौंदता हुआ चला आ रहा था। बिजूका की आत्मा रो पड़ी। उसका बहुत मन किया की रोक ले , लेकिन उसके तो पैर ही नहीं थे। हरिया ने सिर्फ चेहरा बनाया था। वह वहीं अंदर ही अंदर चीख रहा था- रुक जाओ तुम्हारा तो शगल हो जाएगा; लेकिन किसी की महीनों की रोजी मारी जाएगी।

लेकिन झुंड पूरे वेग से खेत की तरफ बढ़े जा रहा था। एक जो झुंड का नेतृत्व कर रहा था। शायद तेजी से आगे बढ़ा। जैसे ही वो करीब आया बिजूका किसी आत्मघाती हमलावर की तरह उससे टकरा गया। वह बिदक कर दूसरे खेत की तरफ भागा और झुंड की दिशा बदल गई।

बिजूका कुरता फट चुका था और घड़ा कई टुकडों में बँटकर जमीन पर फैल चुका था।

हरिया जब खेत पर आया तो रौंदी हुई फसल और शहीद हुए बिजूके को देख हैरत में पड़ गया। घडे़ के टुकडे पर खडि़ये से बनी आँखें ओस से भींगी मिट्टी से लिपटकर मानों रो सी रही थी। कुरते की दोनों बाहें झुककर नीचे की तरफ इशारा कर रही थी मानों कह रही हो ” झूठ के पाँव नहीं होते वरना इस सच को रोक लेते। “

-0-कुमार गौरव, शाहपुर उण्डी (पटोरी),समस्तीपुर , बिहार -848504,फोन :-7488631138

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