जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: November 1, 2020

1-कैमिस्ट्री

“कल मेरी कमर में बहुत दर्द था।” -मोहनदास पटरी पर बैठे, रामदीन मोची से अपना जूता ठीक करवाते हुए उससे बोले।

 “चमड़ा कितना महँगा हो गया है” रामदीन ने जूता सिलते हुए कहा। 

 “सुबह मुझे दफ़्तर जाना है पैंशन लेने । लाइन बहुत लम्बी होगी । रामदीन इतने दर्द में मैं कैसे खड़ा रह पाऊँगा?” मोहनदास बाबू ने अपनी व्यथा सुनाई।

 “ये जूते अब और ज्यादा ठीक नही हो सकते। तला बिल्कुल घिस चुका है” रामदीन सपाट स्वर में बोला।

 “मेरी तो पिंडलियाँ भी सूज जाती है बहुत देर खड़े रहने से। तुझे पता है बैठने को भी कुछ नही होता है वहाँ ।”

 “अबकी तो जैसे-तैसे ठीक कर दिए हैं । पर अब नए ले लो ।”

 “हम्मम..” पैसे पकड़ाकर मोहनदास घर की तरफ चल दिए।

 घर का गेट मोची की दुकान से साफ दिखता था। बाहर खड़ी बहू ने उन्हें घूर कर देखा और मुँह बनाकर भीतर चली गई । वो वहीं बरामदे में अखबार लेकर बैठ गए ।

  “आप मना क्यों नही करते बाबू जी को। रोज़ किसी न किसी फ़िजूल कारण से रामदीन मोची की दुकान पर जा बैठते हैं । शोभा देता है क्या इस उम्र में यूँ रात-दिन छोटे लोगों में संगत करना।” 

 “सीमा बेकार हंगामा न करो। बाबूजी रिटायर हो चुके हैं, तो काम तो कुछ वैसे भी नही है । माँ के जाने के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गए हैं । अब तुम और मैं तो दफ़्तर चले जाते हैं ,तो समय काटने उसी से बतिया आते है ।”

 “समय काटने को ये मोची ही रह गया । पार्क भी तो जा सकते है ।” वो तमातमाकर बोली ।

 “हाँ जा तो सकते है, पर इस उम्र में अब आदत तो छूटने से रही।”

 “आदत? मतलब? मोची से बात करने की ! “

“अरे मोची से नहीं, माँ से । माँ तुम्हारे आने से पहले चल बसी, तो तुमने माँ -बाबूजी की कैमिस्ट्री नहीं देखी । पापा अपना सारे दिन का लेखा-जोखा रोज़ दफ़्तर से आकर माँ को सुनाते थे और माँ अपनी धुन में घर के दुखड़े सुनाती रहती। दोनों की बातों में कोई ताल-मेल न होता। फिर भी अनवरत लगे रहते दोनों अपनी-अपनी समस्याएँ सुनाने में । सो वही सुकून अब बाबू जी को रामदीन के पास मिलता है। दुनिया में कहीं कुछ हो रहा हो । वो अपनी जूतों की दुनिया में मस्त रहता है।”

सीमा ने एक नज़र बरामदे में बैठे बाबू जी को देखा फिर गेट से दिखते रामदीन पर नज़र गई ।

 बैठक में लगी अपनी सास की बड़ी- सी तस्वीर की तरफ देख मुस्कुराकर बुदबुदाई-“कैमिस्ट्री हो तो ऐसी।”

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2-पूरी तरह तैयार

 लड़का पूरी तरह तैयार होकर आया था… सूट, टाई और पॉलिश से चमकते जूते…

“कहाँ जाना है? ” रोबीली आवाज़ ने पूछा। 

 “ऊपर जाना है ।”

 “क्यों जाना है ऊपर… अभी तुम उसके लिए तैयार नहीं दिखते ।”

 “मैं पूरी तरह तैयार होकर आया हूँ… मेरे पास सारी डिग्रियाँ हैं ।”

 “वो काफ़ी नहीं ।” आवाज़ ने हिकारत से कहा। 

 “डिग्रियाँ काफ़ी नहीं तो फिर और क्या चाहिए ?” लड़का कन्फ़्यूज़ दिखने लगा।

 “ऊपर जाने के लिए तुझे अपने कुछ हिस्से देने होंगे।” सपाट और ठण्डा जवाब आया।

 “हिस्से…!  मतलब?” लड़के की आँखें कुछ ज़्यादा ही फैल गईं ।

 “अच्छा, ज़रा उचककर दफ्तर के अंदर दाईं तरफ देखो और बताओ क्या हो रहा है?” उसने आदेश दिया।

 लड़के ने पंजों पर सारा भार डाला और ध्यान से सुनने लगा। ” अरे हाँ, वो दफ्तर का बाबू उस दूसरे आदमी से फ़ाइल आगे सरकाने के पैसे माँग रहा है ।”

 आवाज़ आग बबूला हो चिल्लाई- “कान निकाल दोनों और रख यहाँ दहलीज़ पर । ये अंदर के माहौल के लायक नहीं हैं ।”

लड़के ने सहम कर कान निकाल कर रख दिए ।

 आवाज़ एक बार फिर गूँजी…”अब बाईं तरफ़ देख कर बता कि वहाँ क्या हो रहा है ?”

 उसने भरसक प्रयत्न किया… जो कुछ देखा उसे अवाक् करने के लिये काफ़ी था।

 “बोल न, क्या देखा ?”

 “वो बड़े साहब किसी आधी उम्र की युवती के साथ अश्लील …”

 “चुप ,चुप ,चुप जाहिल । तू तो बिल्कुल लायक नहीं अंदर जाने के । निकाल, अभी की अभी निकाल, ये आँखें और रख यहाँ पायदान के नीचे। अंदर बस बटन एलाउड हैं ।”

 “जी “

 उसने मिमयाते हुए कहा और आँखें निकाल कर दे दीं । अंधेरे को टटोलते हुए पूछा “अब जाऊँ ?”

 “अभी कैसे । ये पैर भी काट कर रख । “

 “फिर मैं चलूँगा कैसे?” अब वह लगभग बदहवास हो चला था।

 “अंदर बैसाखियाँ दे दी जाएँगी। रैड-टेपीज़म ब्रांड की । चल-चल जल्दी कर और भी हैं लाइन में वरना ।”

 लड़के ने पैर भी काट कर दे दिए।

  गरीबी  मुस्कुराते हुए दफ्तर के द्वार से हट गई और बोली “जा अब तू पूरी तरह तैयार है ।”

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3-मोहपाश

“आ गया लगता है । जा दरवाज़ा खोल दे।”

 “नहीं जी , कोई नहीं आया।” 

 “अरे खिड़की पर लाइट चमकी अभी गाड़ी की। देख ध्यान से वही होगा। कार साइड लगा रहा होगा।”

 “ओहो!! कह तो रही हूँ कोई नहीं है, तुम तो फिजूल की रट ही लगा लेते हो ।” 

 “तू रहने दे, मैं देखता हूँ । बूढ़ी हो गई है कतई जो यूँ ही सारा दिन खाट तोड़ती है।”

 “हाँ  नही , तुम बड़े जवान हो न, जाओ खुद ही देख लो।”

“बाहर तो कोई नहीं है पर लाइट तो हमारे गेट पर ही चमकी थी ।”वह बेहद निराश हो बोला

 “मैं तो पहले ही कह रही थी कोई नहीं है। क्या पता कोई रैम्प पर से गाड़ी बैक कर रहा हो ।”

 “हम्ममम..”

 “चलो अब सो जाओ। जब आना होगा आ जाएगा । बहू खोल देगी अपने आप। यूँ ही बेटे के मोह में रात काली करते हो।”

 “क्या करूँ ,नींद ही नहीं आती वह जब तक घर नहीं आता। “

 “पापा जी ..”

 “हाँ बहू”

 “आप सोए नहीं अब तक? तबीयत तो ठीक है ?”

 “हाँ बस ऐसे ही । बुढ़ापे में नींद कम ही आती है ।

 तू कैसे नहीं सोई बेटी ?” वह बहुत प्यार से बोला।

 “वो ऊपर जग में पानी खत्म हो गया था, वही लेने आई थी नीचे रसोई में। और अब सो जाइए आप दोनों भी। कल इनकी बरसी है । आने जाने वालों का ताँता लगा रहेगा फिर आराम नहीं मिलेगा आप दोनों को।”

 लाइट फिर चमकी खिड़की पर , और बुढ़ा फिर सजग हो गया कि शायद अब की ……..।

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4-फ्रॉक 

“माँ ,कल से मैं बाहर नल पर पानी भरने नही जाऊँगी ।” 

तेरह साल की लाली रोते हुए बोली ।

“क्यों री, क्या हुआ ?”

“माँ, वो ढाबे वाले बिशन चाचा है न, रोज रास्ता रोक लेते है । कहते है अंदर ढाबे में चल बढ़िया-बढ़िया खाना खिलाऊँगा । अजीब ढंग से हाथ लगाते है ,मुझे बहुत गंदा- सा लगता है ।”

“करमजला, हरामखोर , उसकी इतनी हिम्मत । याद नही उसे तू हरि सिंह ट्रक डाइवर की बेटी है। अब के फेरा पूरा करके आएगा जब अमृतसर से , सारी करतूत बताऊँगी जन्मजले की । तेरे बाप ने चीर के रख देना है ।”

“पर माँ बिशन चाचा से तो सब डरते है । उनके भाई तो वो सफेद जीप वाले नेता के काम करते हैं न । और उनके भाई के पास हमेशा बंदूक भी तो रहती है वो बड़ी- सी। ” 

बिल्लो का चेहरा फक्क पड़ गया। आँख के आगे सुखिया  की लाश घूम गई , जिसकी घरवाली का हाथ पकड़  लिया था बिशन ने और खूब लठ्ठ बजे थे दोनों में । फिर एक दिन अचानक सुखिया गायब हो गया। पाँच दिन बाद नदी में मछलियों खाई लाश मिली उसकी। सबको पता है क्या हुआ और किसने किया पर मजाल किसी की हिम्मत हो जाए बोलने की।

“सुन लाली । कल से तू पानी लेने नही जाएगी और स्कूल छोड़ने लेने भी मैं आऊँगी । अब से ये फ़्रॉक्र पहनना बिल्कुल बंद । कल से सूट पाईं और दुपट्टा ले के सिर ढक के जाईं।”

“पर माँ …”

“पर-वर कुछ नही । ऊँट- सी हो गई , ओढ़ने पहनने की जरा अक्ल नही । किसी और की क्या गलती। और खबरदार कुछ पापा को बोली तो।”

लाली हैरानी से अपने घुटनों से लम्बी फ़्रॉक्र देखने लगी।

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5-वर्तमान का दंश

“और हीरो ! क्या चल रहा है  लाइफ में ?” कईं सालों बाद मुम्बई से दिल्ली अपने छोटे भाई के घर आए रमानाथ जी ने अपने सत्रह साल के भतीजे से पूछा।

 “कुछ खास नही ताऊजी , बस आई-आई-टी की तैयारी कर रहा हूँ ।”

 “अरे पढ़ाई वढ़ाई तो चलती रहती है। तू तो ये बता तेरी गर्लफ्रैंड्स कितनी है ?” उन्होंने हँसते हुए पूछा_

 “अरे क्या ताऊजी , आप भी न। मैं नही पड़ता इन चक्करों में ।”

 “हट!! जिंदगी खराब है तेरी फिर । अबे जवानी में ये सब नही करेगा, तो बुढ़ापे में करेगा क्या । पूछ अपने बाप से स्कूल कॉलेज मे कैसे लड़कियों की लाइन लगती थी मेरे पीछे। साले घर की इज्जत का तो ख्याल रख।” रमानाथ जी ज़ोर से हँसते हुए बोले।

 “मुझे है न ख्याल घर की इज्जत का ताऊजी ।”बाहर से आती मिताली बोली।

 “क्या मतलब?”.

 “मतलब ये,  मेरे ्हैं न खूब सारे बॉय फ्रैंड्स । आप चिंता मत करो। मैं हूँ न खानदान की परम्परा निभाने को।” मिताली दाँत दिखाती हुई चहकी।

  रमानाथ जी की हँसी में ब्रेक लग गया और चेहरा गुस्से से तमतमाने लगा ।

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6 -ज़िंदा का बोझ 

वह शराब के नशे में धुत जब भी घर आता ज़ोर  से चिल्लाता -“अरी कहाँ मर गई ?”

भागती-सी गुलाबो जाती और कमरे का दरवाज़ा बंद हो जाता। 

बहुत बड़ा नाम था पीर साहब का पूरे इलाके में । लोग ने अल्लाह का दर्ज़ा तक दे डाला था और गुलाबो को पीर रानी का। पीर साहब वैसे तो डेरे पर ही रहते थे;  पर महीने में दो चार बार घर भी आ जाते। जिस रात वह घर आते , बच्चियों को रात भर , रह-रहके कमरे से माँ की दर्दनाक चीखें सुनाई देती। अगले दिन माँ के शरीर पर ज़ख्म दिखते, तो बच्चियाँ अपनी उम्र के हिसाब से सवाल पूछती और गुलाबो उनकी उम्र के हिसाब से ही जवाब देकर उन्हें समझा भी देती। 

 आज गुलाबो को सुबह से ही तेज़ बुखार था । रात गए फिर पीर साहब की गरज सुनाई दी-गुलाबो……”

 तेरह साल की जूही भागकर गई 

 “जी बाबा”

 पीर साहब ने उस पर ऊपर से नीचे तक भरपूर नज़र डाली फिर बेहद प्यार से बोले- “अरे तू इतनी बड़ी कब हो गई ? आ …अंदर आ.. बैठ मेरे पास। “

दरवाजा फिर बंद होने ही वाला था कि गुलाबो दौड़ती हाँफती पहुँची। पलभर मे सब समझ गई , खींचकर जूही को कमरे से बाहर कर दिया और ख़ुद अंदर होकर दरवाजा बंद कर लिया । पीर साहब का चिल्लाना और माँ की दर्दनाक चीखें बाहर तक सुनाई देने लगी । अचानक चीखों का स्वर बदल गया।

            अब दालान में ज़माने भर का मजमा लगा है । पीर साहब नहीं रहे । पीर रानी की सबसे विश्वस्त नौकरानी ने सबको खबर पँहुचाई , कोई लूट के इरादे से घर में घुसा और हाथापाई में पीर साहब का गला रेत गया। 

लोगों ने ख़ूब कोसा उस अनजान लुटेरे को। दोज़ख रसीद करने की बद्दुआएँ दे डाली। औरतों के झुंड के झुंड आ रहे थे। खूब  प्रलाप हो रहा था ।

 छाती-पीटती  अम्मा बोली-“हाय गुलाबो!! कैसे उठाएगी तू बेवा होने का बोझ?!” 

 गुलाबो मन ही मन बुदबुदाई….”इसके तो जिंदा का बोझ ज़्यादा था अम्मा । इसकी लाश में बोझ कहाँ … “

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