जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: November 1, 2020

1-सो तो था

“प्रोणाम जानाई काकी माँ!”

दुर्गा काकी घर के द्वार पर ही मिल गई थी ।

“अरे , बापी !….कोखोन एले ?….ऐसो भीतोरे बोसो !” ( कब आया ? आओ अन्दर बैठो )

“कल ही आया काकी माँ! …आपलोग कैसी हैं ?…सुना है रत्नादी की शादी हो गई । कैसी है वो ?”

“खूब भालो… एकदम बढ़िया !  …भोगवान ने बहुत बड़ा बोझ उतार दिया हमारा सिर से ।”

“अरे ऐसा नहीं कहते काकी माँ बेटियों के बारे में ।”

दुर्गा काकी खामोश रही ।

“खैर ,छोडिए  !  बताइए……घर सूना सूना लगता होगा आप लोगों को ,  है न काकी माँ?”

“ता तो आछे !”( सो तो है )

“दिन भर गुनगुनाती रहती थी रत्ना दी । बड़ा सुरीला कंठ पाया है उसने ।”

“ता तो छिलो ।”(सो तो था )

“अच्छा लिखती भी थी कविताएँ ,कहानियाँ  वैगरह ।”

“ता तो छिलो ।”

“अरे हाँ , उसकी बनाई पेंटिंग अभी भी मेरे पास है ।… रेखाओं और रंगों की कितनी अच्छी समझ थी ….”

“ता तो छिलो ।”

“कितना बढ़िया स्पीच देती थी । डिबेट में हमेशा फर्स्ट आती थी । है न काकी माँ।”

“अरे हाँ हाँ ….सोब जानि आमि ।” (हाँ, हाँ , सब जानती हूं )

काकी माँ के स्वर में झुंझलाहट थी ।

“स्पोर्स्ट्स में भी सबसे आगे रहती थी ।”

काकी माँ ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई ।

“तुमि बोसो बापी । तोमार जन्ये चा करे आनछि । चा खाबे तो ?( तुम बैठो । तुम्हारे लिए चाय बनाकर लाती हूं । चाय पिओगे तो ?)

दरअसल वह इन सब बातों पर विराम देना चाहती थी ।

चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बापी ने यों ही पूछ लिया , “शादी के बाद भी क्या वो सब जारी है काकी माँ?”

“अरे, काहे को जारी रखेगा ?” काकी माँ के स्वर में शुष्कता आ गई , “सुन्दोर वर मिला है । ख़ूब बड़ा बाड़ी है । दामी गाडी है । पूरा सोना-गोईना पाया है । दुई ठो प्यारा-प्यारा बाच्चा है ।… एबार गान-टान ,लेखा-लेखी , छवि आँका –टाँका करे आर कि होबे ?”(अब गाना –वाना , लिखा –लिखी ,चित्रकारी करके और क्या होगा ?”

वह काफी देर तक काकी माँ की आँखों में उस रत्नादी को ढूँढूंढ रहा था । लेकिन वह वहाँ नहीं थी ।

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2-ईश्वर की  आँखें

बढ़ती उम्र ने उसकी आंखें कमज़ोर कर दी थी । नेत्र विशेषज्ञ से अपनी आंखें जांच करवाने के बाद वह नया चश्मा लेने की ख़ातिर बगल में स्थित ऑप्टिकल शॉप में दाख़िल हुआ । उसके हाथ में चश्मे की पॉवर वाली पर्ची थी । दुकान के भीतर प्रवेश करने पर यह देखकर उसे बेहद हैरानी हुई कि वहाँ चश्मे के ग्लास और फ्रेम नहीं थे ,वरन अलग-अलग खानों में बने कांच के शो केश में बड़े करीने से कई-कई जोड़ियाँ आंखें रखी हुई थीं । हर खानों में तख्तियाँ लगी थी – नेता की आंखें  , अभिनेता की आंखें , कलाकार की आंखें , कवि की आंखें , इंजीनियर की आंखें ….बिक्री के लिए । वह अचंभित होकर शो केश के बाहर से ही आंखों  का मुआयना कर रहा था कि दुकानदार उसकी मनोदशा को तत्काल भांप गया , “ सर अब चश्मे की कोई ज़रूरत नहीं ।……हमारे यहाँ हर किस्म की आंखें हैं । अपनी पसंद और ज़रूरत के मुताबिक़ आंखें  चुनिए और फ़ौरन हमारी नई तकनीक की क्लीनिक में जाकर ट्रांसप्लांट करवा लीजिए ।….आपकी पुरानी आंखें  हमारे लैब में सुरक्षित रहेगी ।”

अचरज के भाव के साथ वह कुछ पल तक दुकानदार का मुंह ताकने  के बाद उससे मुख़ातिब हुआ , “ईश्वर की आंखें हैं आपके पास ?”

“जी सर ,है न ! ये देखिए ।” उसने अपने पीछे के शो केश की और इशारा किया ।

“ठीक है , मैं इसीको लगाऊँगा !”

“जैसी आपकी मर्ज़ी !…आइए सर !”

आधे घंटे के अन्दर ईश्वर की आंखें  ट्रांसप्लांट हो गया ।

डॉक्टर की हिदायत के मुताबिक़ उसने धीरे-धीरे आंखें खोली । आंखें खोलते ही वह बेहद घबरा गया । उसकी आंखों के सामने अज़ीबो-ग़रीब नज़ारे थे । एक नए लोक में ख़ुद को पाकर दहशतज़दा हो गया । वह एकबारगी चीख पड़ा, “ डॉक्टर यह क्या है ?…. मुझे सिर्फ अन्तरिक्ष जैसा कुछ दिख रहा है ….आप कहाँ हैं ?” फिर यह महसूस कर कि सारा शरीर पत्थर की तरह सख्त होता जा रहा है उसकी घबराहट पूर्वापेक्षा और बढ़ गई । कान भी सुन्न होते जा रहे थे  ….भावहीनता , गतिहीनता , संवेदनहीनता का भी शिकार होता जा रहा था  ।

स्थिति ऐसी बनी कि फ़ौरन उसने समूची  ताक़त लगाकर आंखें  मूंद ली और फिर एक बार चीखा , “डॉक्टर , प्लीज मेरी आंखें मुझे दे दो !… नहीं चाहिए मुझे ईश्वर की आंखें !” ***

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3-सैनेटरी पैड

टिफिन के वक़्त  सरकारी स्कूल के परिसर  में चहलक़दमी  करते हुए वह अचानक रुक गई । साथ चल रही उसकी क्लासमेट उसके हाव-भाव देखकर घबरा गई , “क्यों क्या हुआ ? तबियत तो  ठीक है न ?”

“लगता है हो गया !”

“क्या हो गया ?”

“पीरियड !”

‘कुछ’ नहीं लाई है ?”

“नहीं ।”

“चल, घर चलते है ।”

“पहले मैडम से पूछ लें !”

स्कूल की प्रिंसिपल मिसेज सुजाता स्टाफ रूम में शिक्षणकर्मियों के साथ किसी मामले पर विचार-विमर्श कर रही  थी । वहाँ  शिक्षिकाओं की तुलना में शिक्षकों की संख्या ज़्यादा  थी । स्टाफ रूम का दरवाजा खुला था ।

“मैडम , अन्दर  आऊँ  ?”

सबकी  नज़रें उस पर टिक गईं  ।

“हाँ  , आओ रजनी । क्या बात है ?”

“मैडम , पीरियड हो गया ।”

बगैर किसी भूमिका के उत्तर की निःसंकोचता पर तमाम आँखें चौड़ी हो गई  । कुछेक के मुंह  खुल गए । मर्दानी आंखें एक दूसरे से आदिम सवाल करने लगीं ।

“कोई बात नहीं बेटा !…. अभी मैं सैनेटरी पैड मंगवा देती हूं   । जाओ अपने क्लास रूम में बैठो ।….घर जाने की ज़रूरत नहीं ।”

फिर एक बार आंखें  चौड़ी होने का पल था ।

“नहीं मैडम हम खुद ले लेंगे । सामने ही तो मेडिकल स्टोर है ।” कहकर वह अपनी गोल-गोल बोल्ड आंखें   स्टाफ रूम की कई जोड़ी आंखों  से मिलाई  । वे आंखें  अपने आप झुक गईं  ।

स्कूल परिसर से निकलकर सामने के मेडिकल स्टोर के काउंटर पर वे दोनों खड़ी थीं ।

“दो बेटा प्रिस्किप्शन ….कौन सी दवा चाहिए ?”

“दवा नहीं अंकल , हमें सैनेटरी पैड चाहिए …व्हीस्पर ..”

अंकल की आंखें  एक विशेष अंदाज़ से उठीं और उसके चेहरे का मुआयना करती हुई उस पर टिक गईं  । बगलगीर ग्राहकों की आंखों  में फ़ौरन ‘कुछ’ समा गया । स्टोर के अन्य कर्मियों के हाथ रुक गए । कान भी खड़े हो गए ।

“दीजिए अंकल ! …क्या सोच रहें हैं ?”

“ हाँ  , हाँ   अभी देता हूं   ।” एक ही पल में कई तरह के सवालों से जूझने की स्थिति को झटका देकर उन्होंने व्हीस्पर थमा दिया।

“थैंक्स  अंकल ।” कहकर उसने वही गोल-गोल आंखें  चारों ओर घुमाई  । फिर एक बार सवालों वाली कई जोड़ी आंखें  करारा  ज़वाब पाकर ज़मीन की ओर झुक गईं  । ***

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 4-सोच

 घर में घुसते ही वह साइकिल एक कोने में पटक कर सोफे पर धंस गयी । उसकी सांसें धौकनी सी चल रही थी । भय और घबड़ाहट से वह थरथरा रही थी । सूखते कंठ को थूक निगल कर बार-बार तर कर रही थी ।

कमरे में सब्जी काटती हुई माँअपनी अठारह वर्षीय बेटी को ऐसी असामान्य स्थिति में देखकर खौफज़दा हो गयी ।

“क्या हुआ सीमा ?”

उसके मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे ।

“अरे कुछ बोलेगी भी ?…क्यों डरी हुयी  हो ? “

“माँ……वो गली में ….” उसकी ज़ुबान लड़खड़ा रही थी ।

“हाँ ….हाँ…गली में ?  ….आगे बोल !”

माथे पर चुहचुहा आए पसीने को अपनी ओढ़नी से पोंछते हुए थरथराते होंठों से आगे के शब्द निकाले , “ “ओढ़नी छीन ली ।”

ओ माई गॉड ……किसकी ओढ़नी ? उसकी  माँउसे पकड कर झिंझोड़ने लगी  ।

“ कंचन की ओढ़नी ।”

“फिर ?”  माँकी सांसें अटक गयी ।”

“……..उसके गाल पर …”

“ओह नो !”

आगे का घटनाक्रम सुनने से पहले ही उनकी  कंपकंपी छूट गयी ।  उन्हें लगा खूंखार भेड़िये अब उसकी बेटी पर हमला बोलने वाले हैं । बेहद खौफ़जदा दृश्य की कल्पना में डूबते –उतरते उन्होंने पूछा , “और तुम …..’

“मैं तब तक आगे निकल कर भाग गयी ।”

“ ओह , थैंक गॉड !” …. उन्होंने  अपना सर ऊपर कर , सीने पर हाथ रखकर राहत की एक लंबी साँस ली और निश्चिन्त होकर सब्जी काटने में व्यस्त हो गयी ।

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5-इमोशन का तड़का                

नम्बर वन एँटरटेनमेंट चैनल के एक रियलिटी शो “सुपर डांसर’ के लिए ऑडिशन हो रहा था। ऑडिशन सेंटर मेट्रोपोलिटीन सिटी के बीचोंबीच  होने के कारण हज़ारों की तादाद में नौजवान लड़के लडकियाँ एक बार ही सही छोटे पर्दे पर दिखने की ललक लिए आए हुए थे ।

    ऑडिशन हॉल में चयनकर्ता के रूप में संगीत और नृत्य के क्षेत्र की नामचीन हस्तियाँ मौजूद थीं । ऑडिशन स्टेज पर एक-एक कर प्रतिभागी आ रहे थे और विभिन्न किस्म के नृत्य की नुमाइश  कर रहे थे । बदनसीब प्रतिभागियों को अगली बार पूरी तैयारी के साथ आने की हिदायत देकर वापस कर दिया जा रहा था । खुशनसीबों को आगे की चुनौतियों का बखान करते हुए मुंबई आने का निमंत्रण दिया जा रहा था ।

स्टेज पर प्रतिभागियों के आने-जाने के क्रम में एक ऐसे प्रतिभागी का आगमन हुआ जिसे देखकर तीनों चयनकर्ता हैरत में पड़ गए। वह प्रतिभागी दिव्यांग था ।वह एक हाथ और एक पैर से वंचित था ।

   “क्या नाम है आपका ?” एक ने बेहद अदब से पूछा ।

“हिम्मती लाल !”

“वाह ! ….वाक़ई  तुम हिम्मत वाले हो । लेकिन तुम परफॉरमेंस करोगे कैसे ? तुम तो …”

“कर लूंगा सर ! ….यही तो मेरी ख़ासियत है ।”

तीनों ने तालियाँ बजाकर उसकी हौसला अफजाई की 

“ओके …देन स्टार्ट ! ….. बेस्ट ऑफ़ लक !”

बैकग्राउंड से मेलोडी गीत बजने लगा ।

वह अपने एक हाथ और एक पैर से ही नृत्य की विभिन्न मुद्राओं का प्रदर्शन करता रहा । लेकिन वह अपनी अदायगी में वो ‘बात’ नहीं दिखा पाया जो  अन्य चयनित प्रतिभागियों में देखने को मिली थी ।

  तीनों चयनकर्ता बेहद निराश हुए ।

बावजूद इसके उनमे से एक ने कहा , “ बहुत ख़ूब हिम्मती लाल ! …हम तीनों की ओर से हाँ  है । मुंबई में हम आपका स्वागत करेंगे ।

  प्रतिभागी उन्हें सौ-सौ सलाम कर स्टेज से प्रस्थान कर गया ।

“व्हाट इज दिस ? आपने उसे कैसे सेलेक्ट कर लिया ?” दोनों चयनकर्ता उसके इस फ़ैसले से बेहद हैरान थे और नाखुश भी , “आखिर क्या देख लिया आपने उसमे ?”

  “इमोशन का तड़का…. इसेंशियल थिग फॉर रियलिटी शो ।”

“ओह ग्रेट डियर ….करेक्ट डिसिजन !” और तीनों आपस में हथेलियों को टकराते हुए ठठाकर हँस पड़े ।

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