जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: December 1, 2020

1 – चुनौती  

जूनागढ़ रियासत में जबसे वार्षिक गायन प्रतियोगिता की घोषणा हुई थी संगीत प्रेमियों में हलचल मच गई थी। उस्ताद ज़ाकिर खान और पंडित ललित शास्त्री दोनों ही बेजोड़ गायक थे। परन्तु उनमे गहरी प्रतिद्वन्दिता थी। रास्ट्रीय संगीत आयोजन के लिए दोनों पूरे दम खम के साथ रियाज़ में जुट गए , वे दोनों ही अपने हुनर की धाक जमाने को बेकरार थे। अक्सर दोनो के चेले चपाटों के बीच सिर फुटव्वल की नौबत आ जाती। खान साहब के शागिर्द अपने उस्ताद को बेहतर बताते तो शास्त्री जी के चेले अपने गुरु को।

खान साहब जब अलाप लेते, तो लोग सुध-बुध खोकर उन्हें सुनते रहते, उधर शास्त्री जी के एक एक आरोह-अवरोह के प्रवाह में लोग साँस रोककर उन्हें सुनते रह जाते। दोनों का रियाज़ देखकर निर्णय लेना मुश्किल हो जाता कि प्रतियोगिता का विजेता होने का गौरव किसे मिलेगा। बड़ी-बड़ी शर्ते लग रही थीं कि उनमें से विजेता कौन होगा।

शास्त्री जी की अँगुलियाँ सितार पर थिरक रही थीं, वे अपनी तान में मगन होकर सुर लहरियाँ बिखेर रहे थे। पशु पक्षी तक जैसे उन्हें सुनकर सब कुछ भूल गए थे, तभी एक चेला भागा हुआ चला आया

” गुरुजी, अब आपको कोई भी, कभी चुनौती नही दे पाएगा, आप संगीत की दुनिया के सम्राट बने रहेंगे  ”

” क्यों क्या हो गया ?”

” गुरु जी अभी खबर मिली है कि आज रियाज़ करते हुए खान साहब का इंतकाल हो गया ” -शिष्य ने बहुत उत्तेजना में भरकर बताया।

सुनकर शास्त्री जी का मुँह पलभर को आश्चर्य से खुला रह गया, फिर आँखों में अश्रु तैर गए। उन्होंने सितार उठाकर उसके नियत स्थान पर रखकर आवरण से ढका और माँ सरस्वती को प्रणाम किया। फिर सूनी नज़रों से आसमान ताकते हुए भर्राए स्वर में कहा-” आज मेरा हौसला चला गया…अब मैं जीवन में कभी गा नहीं सकूँगा।”

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2-रोबोट

         बड़े ट्रंक का सामान निकालते हुए शिखा ने बड़े ममत्व से अपने पुत्र राहुल के छुटपन के वस्त्र और खिलौनों को छुआ। छोटे-छोटे झबले,स्वेटर, झुनझुने, न जाने कितनी ही चीजें उसने बड़े यत्न से अब तक सम्हालकर रखी थीं।

अरे रोबोट ! वह चिहुँक उठी। जब दो वर्ष का था बेटा, तो अमेरिका से आये बड़े भैया ने उसे ये लाकर दिया था। कई तरह के करतब दिखाता रोबोट पाकर राहुल तो निहाल हो उठा। उसमे प्राण बसने लगे थे उसके। पर शरारत का ये आलम कि कोई खिलौना बचने ही न देता था। ऐसे में इतना महँगा रोबोट बर्बाद होने देने का मन नही हुआ शिखा का । जब भी वह रोबोट से खेलता, उस समय शिखा बहुत सख्त हो उठती बेटे के साथ । आसानी से वह राहुल को खिलौना देती ही नहीं। लाखों मनुहार करने पर ही कुछ समय को वह खिलौना मिल पाता । फिर उसकी पहुँच से दूर रखने को न जाने क्या-क्या जुगत लगानी पड़ती उसे ।

शिखा के यत्नों का ही परिणाम था कि वह रोबोट अब तक सही सलामत था। राहुल तो उसे भूल भी चुका था। फिर अब तो बड़ा भी हो गया था, पूरे बारह वर्ष का। अपनी वस्तुओं को माँ के मन मुताबिक सम्हालकर भी रखने लगा था।

” अब राहुल समझदार हो गया है, आज मै उसे ये दे दूँगी। बहुत खुश हो जाएगा , उसका अब तक का सबसे प्रिय खिलौना । ” स्वगत भाषण करते हुए उसकी ऑंखें ख़ुशी से चमक रही थीं।

तभी राहुल ने कक्ष में प्रवेश किया।

” देख बेटा,मेरे पास क्या है ?” उसने राजदाराना अंदाज में कहा।

” क्या है माँ ?”

” ये रोबोट, अब तुम इसे अपने पास रख सकते हो । अब तो मेरा बेटा बहुत समझदार हो गया है।”

” अब इसका क्या करूँगा माँ ?” क्षण मात्र को राहुल के चेहरे पर पीड़ा के भाव उभरे, फिर मुँह फेरते हुए सख्त लहजे में बोला ” मैं कोई लिटिल बेबी थोड़े ही हूँ जो रोबोट से खेलूँगा। ”            -0-

 3-  मिठाई       

रात को सोने से पहले परेश ने घर के दरवाजो का निरीक्षण किया। आश्वस्त होकर अपने शयनकक्ष की ओर बढ़ा ही था कि तभी सदा के नास्तिक बाबूजी को उसने चुपके से पूजाघर से निकलते देखा।

“बाबूजी, इतनी रात को… ?”

उसकी उत्सुकता जाग गई,और उसका पुलिसिया मन शंकित हो उठा। वह चुपके से उनके पीछे चल पड़ा। वे दबे पाँव अपने कमरे में चले गए, फिर उन्होंने अपना छिपाया हुआ हाथ माँ के आगे कर दिया

” लो तुम्हारे लिए लड्डू लाया हूँ, खा लो। ”

” ये कहाँ से लाए आप ?”

” पूजाघर से।” उन्होंने निगाह चुराते हुए कहा।

” पर इस तरह … ”

” क्या करूँ, जानता नही क्या कि तुम्हे बेसन के लड्डू कितने पसन्द हैं। परेश छोटा था, तो हमेशा तुम अपने हिस्से का लड्डू उसे खिला दिया करती थीं। आज घर मे मिठाइयाँ भरी पड़ी हैं; पर बेटे को ख्याल तक नही आया कि माँ को उसकी पसन्द की मिठाई खिला दे। ”

” ऐसे मत सोचिए, उस पर जिम्मेदारियों का बोझ है, भूल गया होगा । ” माँ ने उसका पक्ष लेते हुए कहा।

” तुम तो बस उसकी कमियाँ ही ढकती रहो, लो अब खा लो। ”

” आप भी लीजिए न ”

” नहीं, तुम खाओ, जीवनभर अपने हिस्से का दूसरों को ही देती आईं। तुम्हे इस तरह तरसते नही देख सकता मैं ।” कहते हुए बाबूजी ने जबरन लड्डू उन्हें खिला दिया।

उसकी आँखें भर आयीं अपनी लापरवाही पर। माता पिता की भरपूर सेवा  करने का उसका गुरूर  चकनाचूर हो गया। घर में सौगात में आए मिठाई के डिब्बों का ढेर मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था। उसने लड्डू का डिब्बा उठाया और नम आँखें लिये माँ बाबूजी के कमरे की ओर चल दिया।

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4- कब तक ? 

उसकी सूनी नज़रें कोने में लगे जाले पर टिकी हुई थीं । तभी एक कीट उस जाले की ओर बढ़ता नज़र आया। वह ध्यान से उसे घूरे जा रही थी।

” अरे ! यहाँ बैठी क्या कर रही हो ? हॉस्पिटल नही जाना क्या ?” पति ने टोका तो जैसे वह जाग पड़ी।

” सुनिए , मेरा जी चाहता है की नौकरी छोड़ दूँ । बचपन से काम कर-करके थक गई हूँ  । शरीर टूट चला है । साथी डॉक्टरों की फ्लर्ट करने की कोशिश , मरीज और उनके तीमारदारों की भूखी निगाह , तो कभी हेय दृष्टि , अब बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया है । ” आशिमा ने याचना भरी दृष्टि से पति को ताका।

” पागल हो गई हो क्या ? बढ़ते बच्चो के पढ़ाई के खर्चे, फ्लैट और गाड़ी की किस्तें । ये सब कैसे पूरे होंगे? ”

” मुझे बहुत बुरा लगता है जब डबल मीनिंग वाले मजाक करते हैं ये लोग। इन सबकी भूखी नज़रें जब अपने शरीर पर जमी देखती हूँ तो घिन आती है । ”

” हद है आशिमा, अच्छी-भली सरकारी नौकरी है। जिला अस्पताल में स्टाफ नर्स हो। अभी कितने साल बाकी हैं नौकरी को। तुम्हारे दिमाग में ये फ़ितूर आया कहाँ से ? थोडा बर्दाश्त करना भी सीखो।  ” झिड़कते स्वर में पति ने जवाब दिया।

” चलो उठो,आज मैं तुम्हे ड्रॉप करके आता हूँ ” उन्होंने गाड़ी की चाभी उठाते हुए कहा। आशिमा की निगाह जाले की ओर गई, तो देखा वह कीट जाले में फँसा फड़फड़ा रहा है और ताक जमाए एक मकड़ी उसकी ओर बढ़ रही है।

” नहीं ” वह हौले से बुदबुदाई, फिर उसने आहिस्ता से जाला साफ करने वाला उठाया और उस जाले का अस्तित्व समाप्त कर दिया।

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5- बुज़दिल

” क्या बात है श्रवण, बहुत परेशान दिख रहे हो? सब ठीक तो है न ?” उसे भोजन को बस अनिच्छा से कुतरता देखकर अनु ने प्रश्न किया।

” हाँ अनु, सब ठीक है।”

” मुझे लगा था कि बेशक हम जीवनसाथी न बन पाए; पर अच्छे मित्र तो हमेशा रहेंगे।” उसने शिकायत की।

” इसमे कोई शक ही नही अनु, हम अब भी अच्छे मित्र हैं। ” श्रवण ने उनका मनुहार किया।

” तो फिर बताओ न कि इतने उखड़े हुए क्यों नज़र आ रहे हो ?”

” तुम ये तो जानती ही हो कि मेरे विवाह को कई वर्ष बीत गए ”

” हाँ तो ?”

” पर अब भी हम निसन्तान हैं। इस बात को लेकर माँ और दादी जब देखो तब मानसी को ताने देती रहती हैं।”

” किसी डॉक्टर से मिले तुम?”

” सारे चेकअप करवा लिये, कुछ भी समस्या नही निकली। घर का माहौल बहुत खराब हो गया है। हर वक़्त के ताने, मानसी का रोना… मन बहुत खराब हो जाता है मेरा।”

” क्या तुम यह सोचते हो कि इसमें मानसी की कोई गलती है?”

” नहीं, ऐसा तो नहीं ”

” तो माँ और दादी से कहते क्यों नहीं कि औरत भी एक इंसान है, कोई बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं। जो एक मशीन ने ठीक काम न किया तो दूसरी खरीद लाए । ”

” अब तो दादी मेरी दूसरी शादी की बात भी करने लगी हैं। जी चाहता है घर छोड़कर कहीं चला जाऊँ।” उसकी बात का जवाब न देकर श्रवण ने आगे कहा।

” तो बच्चा गोद ले लो।”

” पर वह अपना खून तो नहीं होगा।”

” क्यों, तुम्हारे खून में ऐसी कौन सी बात है, जिसका चलना इतना ज़रूरी है ?”

” अरे ! क्या बात कर रही हो ?”

” नहीं बताओ न, तुम्हारे खून में स्पेशल क्या है? कौन से महाराणा प्रताप या शिवाजी तुम्हारे यहाँ पैदा हुए हैं?’

” बेकार की बात मत करो। ” अब वह झुँझला गया था।

” तुम्हारे वंश का चलना इतना ज़रूरी क्यों है? एक ऐसा बुज़दिल, जो बेहिसाब मोहब्बत के बावजूद भी घरवालों की मर्जी के खिलाफ अपनी पसंद की लड़की से शादी की हिम्मत नही जुटा पाया,जो अपनी बेगुनाह बीवी के साथ नही खड़ा हो पा रहा। ”

वह खामोश रह गया।

” अरे आई वी एफ तकनीक है, और भी कई रास्ते हैं। अगर इस बार तुमने अपनी पत्नी का साथ नहीं दिया तो ईश्वर भी तुम्हे माफ़ नही करेगा।”

कुछ देर वह सर झुकाए सोचता रहा। अनु भी खामोश रही। फिर वह उठ खड़ा हुआ

” चलता हूँ, कोशिश करूँगा की गलत हालात को सही कर सकूँ।”

” ऑल द बेस्ट ” अनु सन्तोष के साथ मुस्कुरा दी।

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