जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: May 1, 2022

1-अपराजिता

आज पति को गुजरे तीन महीने होने को आए। कितना कुछ बदल गया न इन तीन महीनों में ! पति थे तो कितनी निश्चिंतता थी जीवन में! वे ही कारोबार का सारा हिसाब- किताब देखते, बेटा न होने का ताना मिलने पर, वे ही उमा और दोनों बेटियों की ढाल बन डटकर खड़े रहते । एक बेटी तो ब्याह गए, दूसरी भी बस ब्याहने लायक ही है।
“चलो शुक्र है, संयुक्त परिवार है, माँ बेटियाँ ढकी रहेंगी।”
पति की मृत्यु पर सभी की ज़ुबान पर  बस यही वाक्य था। उसने भी खुद को यही समझाया ।
दुनियादारी से अनजान उमा इन तीन महीनों में शतरंज का मोहरा बन गई थी। आज्ञाकारी बहू की तरह जेठ के इशारों पर नाचती, विरोध तो कभी करना सीखा ही न था पगली ने!
एक दिन जेठ ने मकान के पेपर उसके आगे रख दिए-“बहू इन पर हस्ताक्षर कर दो।”
उसने पहली बार नजर उठा जेठ की ओर देखा।
जेठ ने समझाने के लहजे में कहा-“ बन्नो अब ब्याहने लायक है, उसका ब्याह इतनी धूमधाम से करूँगा कि दुनिया देखेगी। तुम बस इन कागजों पर हस्ताक्षर कर दो, आज से तुम तीनों की पूरी पूरी जिम्मेदारी मेरी।”
उनकी कुटिल मुस्कान कमरे की मद्धिम रोशनी में भी उनके चेहरे पर दमक रही थी ।
उनका काइयाँपन और शतरंज की चालें समझ आने लगी थीं उमा को ।
“बड़ी और दामाद जी को ये कागज दिखा दूँ एक बार… !”
“उनका क्या लेना देना हमारे घर के मामले में?” पहली बार जेठ जी क्रोधित हो फुफकार उठे ।
“मेरे परिवार का हिस्सा हैं वे दोनों!”
“तुम्हारा सहारा हम लोग बनेंगे न कि वे दोनों!”
“अपना घर, कारोबार सब आपके नाम करके मैं आश्रित नहीं बनना चाहती जेठ जी… और हाँ मुझे ऐसे किसी सहारे की कोई आवश्यकता नहीं, जो मुझे ही बेसहारा बना दे।”
कहते हुए उमा ने वे कागज टुकड़े-टुकड़े कर डस्टबिन में डाल दिए और साँझ का दिया जलाने मंदिर की ओर बढ़ गई । दीपक की लौ फड़फड़ाने लगी तो उसने झट अँजुरी से ओट दे उसे सुरक्षित कर लिया ।
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2-खिड़की

होशियारपुर से शादी का बुलावा आया था । शान-ए-पंजाब से जाना तय हुआ । सर्दी हल्की हल्की दस्तक देने लगी थी, इसलिए सोचा- चलो इस बार एसी की बजाय जनरल कोच से सफ़र का आनन्द लिया जाए ।
पहले बीवी बच्चे जनरल से जाने पर कुछ नाराज हुए पर, फिर थोड़ी ना-नुकुर के बाद मान गए। दिल्ली से लगभग आठ घंटे का सफ़र। सीट बुक थी, तो ज्यादा परेशानी नहीं हुई। बच्चों ने झट खिड़की वाली सीट पर कब्जा कर लिया। सारा सामान सेट कर मैं और पत्नी बातों में मशगूल हो गए ।
“दीदी! जम्मू की शॉल ले लो! बहुत बढ़िया है!”
रंग बिरंगी शॉलों का भारी गट्ठर उठाए एक साँवली- सलोनी कजरारी आँखों वाली युवती पत्नी से इसरार करने लगी ।
“कितने की है?”
“अढाई सौ की!”
“इत्ती महँगी!”
“ज्यादा पीस लोगी, तो कम कर दूँगी!”
“मुझे दुकान खोलनी है क्या?”
“ले लो न ! दोनों दीदियों के लिए और अपनी भाभियों के लिए!”
मैंने पत्नी को इशारा किया, तो उसने आँखें तरेरकर मुझे चुप रहने का संकेत दिया ।
“अच्छा 5 पीस लूँ तो कितने के दोगी?”
“दो सौ रुपये पर पीस ले लेना दीदी!”
“न ! सौ रुपये पर पीस!”
“दीदी! सौ तो बहुत कम है!”-कहते हुए उसका गला  रुँध गया और उसकी कजरारी आँखें भर आईं।
“चल, न तेरी, न मेरी, डेढ़ सौ पर पीस!”
“अच्छा दीदी! ठीक है! लो, रंग पसंद कर लो!”
कुछ सोचते हुए उसने कहा और गट्ठर पत्नी के सामने सरका दिया ।
पत्नी ने पाँच शॉलें अलग कर लीं तथा मेरी ओर देख रुपये देने का इशारा किया ।
मैंने झट 750 रुपये निकालकर दे दिए ।
उसके जाने के बाद रास्ते भर पत्नी की सुई इसी बात पर अटकी रही-“वो एक बार में ही डेढ़ सौ में मान गई, गलती की थोड़ा तोल-मोल और करना था!”
और मेरी सुई… अतीत में जा अटकी थी ।
बेटी को गोद में बिठा रेलगाड़ी की खिड़की से झाँकता मैं सोच रहा था -मेरे पिता भी रेलगाड़ी में सामान बेच जब थके हारे घर आते, तो उनकी आँखों में भी वही नमी होती थी, जो आज उस लड़की की आँखों में थी ।
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3-खाली पलंग

“क्या हुआ बहू? उदास क्यों हो?”
“माँजी, थोड़ी देर पहले माँ का फोन आया था, वह बहुत परेशान लग रही थी ।”
“सब ठीक तो है न!”
“भैया भाभी की रोज रोज की… कलह क्लेश से… वह .. व्यथित रहती हैं ।” अटकते हुए बहू ने बताया।
“तुम अपने भाई भाभी को समझाती क्यों नहीं! रोज- रोज के क्लेश से घर परिवार बच्चों पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है।”
“मैंने कई बार भैया- भाभी को समझाया, दो चार दिन सब ठीक रहता है, उसके बाद वही सब! बूढ़ी माँ ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाती, इसलिए बहुत परेशान रहती हैं ।”
“तो तुम माँ को यहाँ लिवा लाओ!”
“यहाँ!”
“हाँ देखो न ! तुम्हारे ससुर जी के जाने के बाद ये खाली पलंग मुझे खाने को दौड़ता है, वह आ जाएँगी तो हम दोनों समधिन बहनों का साथ हो जाएगा और समय भी अच्छा कट जाएगा ।”
बहू ने सजल आँखों से सासू माँ की ओर देखा, उनकी आँखों में रिश्तों को जोड़ता सुकून का मजबूत पुल दिखलाई पड़ा ।

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4-खिलौना

यह पहला वार – उस दर्द के लिए जब बुढ़ापे की हवस पूरी करने के लिए तुम एक छह वर्षीय अल्हड़ बालिका के अंगो के साथ खेले ।
यह दूसरा वार- उस दर्द के लिए, जब तुम ट्यूशन पढ़ाते हुए कुछ समझाने के बहाने 12 वर्षीय बाला को यहाँ- वहाँ छू निर्लजता से मुस्कुरा देते।
यह तीसरा वार- उस दर्द के लिए जब टाइपिंग सिखाने के बहाने तुम जान बूझकर झुक-झुककर गुटके से भरी गलीच साँसें 18 वर्षीय तरुणी पर उडेल देते।
यह चौथा वार- उस दर्द के लिए जब कॉलेज की कैन्टीन में वासनामयी नजरों से कूपन देते हुए 19 वर्षीय नवयौवना का हाथ लगभग पकड़ ही लेते।
यह पाँचवा वार- उस दर्द के लिए जब बस की टिकट मांगने पर पान चबाते तुम 20 वर्षीय कामिनी को अपनी आँखों से पेट में निगल लेते ।
यह छटा वार – उस दर्द के लिए जब नौकरी के इन्टरव्यू के बहाने तुम बेझिझक सटकर गोल मोल प्रश्नों में 22 वर्षीय वनिता को उलझा देते ।
और यह सातवाँ और अन्तिम वार – उस दर्द के लिए कि तुमने ललना को इंसान समझने की बजाय सिर्फ एक चाबीवाला खिलौना समझा, तुम्हारे नियम कायदे- कानून बूढ़े शेर के नख-दंत की तरह भोथरे जो हैं ।
सच ही कहा है किसी ने-‘कौन बदन से आगे देखे औरत को’
सब की आंखें गिरवी हैं इस नगरी में ।

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5-पीर

“तुम लोग फिर आ धमके?”
“अरे हर वर्ष तो तुम बड़े प्रफुल्लित हो उठते थे, हमारे आने से! ये अचानक इस वर्ष क्या हो गया !”
“हाँ होता था प्रफुल्लित… करता था बेकरारी से इंतजार!  तुम्हारे आते ही वीरान वादियाँ जो गुलजार हो उठती थीं, उदास फिज़ाएँ जो महकने लगती थीं, पूरे बरस शून्य तकते निरुत्साहित दुकानदारों के चेहरे पर उत्साह की रंगीनियाँ जो छा जाती  थीं… ।”
“थी… माने?”
सीने पर एक घूँसा- सा पड़ा, उसके इन शब्दों ने पर्यटकों को स्तब्ध कर दिया, पर उनके प्रश्न पर ध्यान दिये बिना वह अपनी ही रौ में बोले चला जा रहा था
“…और इस इंतजार के बदले मुझे क्या मिला?
कूड़े के ढेर, प्लास्टिक की खाली बोतलें, चिप्स के रैपर और… और…!”
कहते कहते पर्वत की साँस उखड़ने लगीं और जुबान लड़खड़ाने लगी ।
“जाओ चले जाओ यहाँ से! स्वार्थी कहीं के! मैं बेवकूफ ! अशर्फियाँ लुटाकर कोयलों पर मोहर लगाता रहा! तुम खुद तो रोगी जीवन जीने के आदी हो और आज मुझे भी… मुझे भी रोगी बनाकर छोड़ा तुमने!”
एक पल को रुका और विरक्त स्वर में आक्रोश से भर बोला-“अब तुम्हारे आने से यहाँ रौनक नहीं मनहूसियत फैलने लगती है!”

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6-सौ बटा सौ

रामू बगिया में पिता के साथ पौधे रोपने और गुड़ाई करने में मदद कर रहा था ।
“क्यों रे रामू, पेपर मिल गए क्या!”-बड़ी मालकिन ने अचानक आकर पूछा, तो रामू सकपका गया।
“जी…जी… मिल गए!”-हकलाते हुए उसने जवाब दिया ।
“कितने नम्बर आए !”_रोबीली आवाज में पूछा गया ।
“35…”
“सिर्फ 35… कुछ शर्म हया है कि नहीं! देखता भी है कि सारा दिन तेरा बाप खटता है! क्या जरा भी दया नही तेरे मन में!”
जोरदार डाँट पड़ी और अभी जाने कितनी ही देर पड़ती रहती कि अचानक से बापू बीच में आ गए ।
“मालकिन! सारा दिन यह भी तो खटता है मेरे साथ! स्कूल से आते ही कपड़े बदल जल्दी-जल्दी खाना खा, मेरे लिए खाना लेकर आता है और फिर मेरे साथ ही काम पर जुट जाता है और फिर घर पहुँचकर देर रात तक पढ़ता भी है ।”
“पढ़ाई के बिना आजकल कुछ नहीं । इसके भले के लिए ही समझाती हूँ!”
बड़ी मालकिन ने समझाने के लहजे में कहा ।
“जो बच्चा अपने पिता के प्रति दया-भाव रखे, उससे बड़ी बात और क्या होगी मालकिन!”
“और नम्बर….!”
“भले ही इसके पढ़ाई में 35 नम्बर आए… पर मेरी तरफ से तो सौ बटा सौ ही हैं ।”

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7-बुलावा

ठक-ठक….!
“कौन ? दरवाजा खुला है आ जाओ ।”
“राम राम चन्दा!”
“राम राम बाबूजी! आप यहाँ!”
“क्यों मैं यहाँ नहीं आ सकता?”
“आ क्यों नही सकते ! पर यहाँ आता ही कौन है!”
“आया न आज ! ये कार्ड देने मेरे बेटे की शादी का !
“कार्ड ! बेटे की शादी का !”
“हाँ अगले महीने मेरे बेटे की शादी है तुम सब आना ।” 
“……!”
“…और ये मिठाई सबका मुँह मीठा करने के लिए !”
काँपते हाथों से मिठाई का डिब्बा पकड़ते हुए चंदा बोली-“हम तो जबरदस्ती पहुँच जाते है शादी ब्याह या बच्चा पैदा होने पर, तो लोग मुँह बना लेते हैं  और आप हमें बुलावा देकर…!”
आगे के शब्द चंदा के गले में ही अटक कर रह गए ।
“चन्दा, बरसों से तुम्हें देख रहा हूँ सबको दुआएँ बाँटते !”
“…..!”
“याद है जब मेरा बेटा हुआ था तो पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लिया था तुमने खुशी के मारे ।”
“हाँ! और आपने खुशी खुशी हमारा मनपसंद नेग भी दिया था !”
“तुम लोगों की नेक दुआओं से मेरा बेटा पढ़ लिखकर डॉक्टर बन गया है… और तुम सबको उसकी शादी में जरूर आना है !”
“क्यों नही आएँगें बाबूजी! जरूर आएँगें ! आपने इतनी इज्ज़त मान से बुलाया है, तो क्यों न आएँगें!”
कहते हुए चंदा की आँखे गंगा- जमुना-सी बह उठीं और उसका सिर बाबूजी के आगे सजदे में झुक गया । 
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